इंदिरा से राहुल तक कितनी बदल गई कांग्रेस

इंदिरा गांधी से राहुल गांधी तक कांग्रेस के बदलते राजनीतिक सफर को दर्शाती तस्वीर

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का इतिहास केवल एक राजनीतिक दल की यात्रा नहीं, बल्कि आधुनिक भारत के निर्माण और उसकी लोकतांत्रिक चेतना का जीवंत दस्तावेज है। 1885 में अपनी स्थापना से लेकर स्वतंत्रता संग्राम का नेतृत्व करने तक, कांग्रेस देश की राजनीति की धुरी बनी रही। आजादी के बाद के शुरुआती दशकों को यदि कांग्रेस का स्वर्णिम कालखंड कहा जाए, तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। यह वह दौर था, जब पार्टी ने एक राष्ट्र-निर्माता की भूमिका निभाई और विभिन्न विचारधाराओं, क्षेत्रीय आकांक्षाओं व सामाजिक वर्गों को एक मंच पर लाने का अभूतपूर्व कार्य किया। नेहरूवादी युग में स्थापित लोकतांत्रिक संस्थाओं और मिश्रित अर्थव्यवस्था की नींव ने देश को एक सुदृढ़ आधार प्रदान किया।

समय के चक्र के साथ पार्टी के भीतर रणनीतिक और ढाँचागत बदलाव आने स्वाभाविक थे। 1960 के दशक के उत्तरार्ध में इंदिरा गांधी के उदय के साथ कांग्रेस ने एक नए युग में प्रवेश किया। इस दौर में पार्टी का झुकाव समाजवाद और लोक-लुभावन नीतियों जैसे कि गरीबी हटाओ की ओर बढ़ा। हालाँकि, इसी कालखंड में पार्टी के भीतर सत्ता का केंद्रीकरण भी देखा गया, जिसने कांग्रेस के पारंपरिक आंतरिक लोकतंत्र को प्रभावित किया। 1975 के आपातकाल को भारतीय लोकतंत्र और स्वयं कांग्रेस के इतिहास में एक कठिन परीक्षा के रूप में देखा जाता है। इसके बावजूद, जनता के साथ गहरे जुड़ाव के कारण पार्टी ने 1980 में शानदार वापसी की। इसके बाद, राजीव गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने आधुनिक भारत की रूपरेखा तैयार की, जिसमें सूचना प्रौद्योगिकी, दूरसंचार क्राँति और युवाओं की भागीदारी को प्राथमिकता दी गई।

1990 का दशक भारतीय राजनीति में भारी उथल-पुथल का दौर था। राजीव गांधी के आकस्मिक निधन के बाद, प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिंह राव और डॉ. मनमोहन सिंह की जोड़ी ने देश को आर्थिक उदारीकरण के मार्ग पर अग्रसर किया। इस ऐतिहासिक कदम ने भारत के लिए वैश्विक बाजार के द्वार खोले और आर्थिक प्रगति की एक नई इबारत लिखी। लेकिन, इस दौर में क्षेत्रीय दलों के उभार और गठबंधन की राजनीति ने कांग्रेस के समक्ष नई चुनौतियाँ खड़ी कर दीं। 1998 में सोनिया गांधी ने संगठन की कमान संभाली और राजनीतिक कुशलता का परिचय देते हुए  यूनाइटेड प्रोग्रेसिव एलायंस (यूपीए) की नींव रखी। 2004 से 2014 के बीच डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व में यूपीए सरकार ने आरटीआई, मनरेगा और शिक्षा का अधिकार जैसे दूरगामी सामाजिक-आर्थिक सुधार लागू किए, जिसने समावेशी विकास को बढ़ावा दिया।

हर बड़े राजनीतिक दल के जीवन में उतार-चढ़ाव आते हैं। लगातार दो कार्यकालों के बाद, सत्ता विरोधी लहर, नीतिगत शिथिलता के आरोपों और मजबूत विपक्ष के उभार के कारण 2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस को अभूतपूर्व चुनावी झटकों का सामना करना पड़ा। विश्लेषकों ने इसे पार्टी के संगठनात्मक ढाँचे के शिथिल होने और जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं के मनोबल में आई कमी के रूप में देखा। इस संक्रमण काल में पार्टी को आंतरिक असंतोष और वरिष्ठ नेताओं के विचलन जैसी चुनौतियों से भी जूझना पड़ा, जिससे ऐसा प्रतीत होने लगा कि देश की सबसे पुरानी पार्टी अपने अस्तित्व के सबसे कठिन दौर से गुजर रही है।

परंतु, राजनीति कभी भी स्थायी नहीं होती। हाल के वर्षों में कांग्रेस ने आत्ममंथन और पुनर्गठन की दिशा में गंभीर प्रयास किए हैं। राहुल गांधी के नेतृत्व में आयोजित भारत जोड़ो यात्रा ने पार्टी के लिए एक टर्निंग पॉइंट का काम किया। इस देशव्यापी जनसंपर्क अभियान ने न केवल कार्यकर्ताओं में एक नई ऊर्जा का संचार किया, बल्कि जनता के बुनियादी मुद्दों को विमर्श के केंद्र में लाकर खड़ा कर दिया। इस रणनीतिक बदलाव का सकारात्मक परिणाम 2024 के लोकसभा चुनावों में स्पष्ट रूप से देखने को मिला।

2024 के आम चुनाव कांग्रेस के लिए एक वैचारिक और रणनीतिक पुनरुत्थान के रूप में सामने आए हैं। पार्टी ने अपनी सीटों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज करते हुए देश के राजनीतिक परिदृश्य में अपनी प्रासंगिकता को पुनः साबित किया है। चुनावों में मिला यह जनसमर्थन दर्शाता है कि कांग्रेस एक मजबूत और जिम्मेदार विपक्ष के रूप में देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था को संतुलन प्रदान करने के लिए उठ खड़ी हुई है। निश्चित रूप से, संगठन को पूरी तरह पुनर्जीवित करने और नई पीढ़ी की उम्मीदों पर खरा उतरने का संघर्ष अभी भी जारी है, लेकिन वर्तमान परिदृश्य यह स्पष्ट करता है कि भारतीय लोकतंत्र के ताने-बाने में कांग्रेस की भूमिका आज भी उतनी ही अपरिहार्य है, जितनी अतीत में थी।

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