छत्तीसगढ़ की राजनीति का मिज़ाज़ देश के अन्य राज्यों से बिल्कुल जुदा है। 1 नवंबर 2000 को मध्य प्रदेश से अलग होकर बने इस राज्य ने अपने अब तक के सफर में कई राजनीतिक करवटें बदली हैं। यहां के शांत दिखने वाले मतदाताओं की राजनीतिक परिपक्वता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वे किसी भी दल को अंधभक्ति का सर्टिफिकेट नहीं देते। साल 2003 में जनता ने अजीत जोगी की शुरुआती कांग्रेस सरकार को नकारकर भाजपा के डॉ. रमन सिंह को पंद्रह साल का लंबा मौका दिया गया। फिर 2018 में बदलाव की ऐसी आंधी चली कि भाजपा महज 15 सीटों पर सिमट गई और भूपेश बघेल के नेतृत्व में कांग्रेस की भारी बहुमत से वापसी हुई। लेकिन, राजनीति का पहिया घूमकर 2023 में फिर वहीं आ गया, जहाँ जनता ने कांग्रेस के पाँच साल के दावों को खारिज करते हुए विष्णु देव साय के रूप में भाजपा को दोबारा सत्ता सौंप दी। छत्तीसगढ़ की यह सियासी पटकथा बताती है कि यहाँ सत्ता की चाबी सिर्फ नारों से नहीं, बल्कि जमीन पर दिखने वाले काम और जनता के भरोसे से मिलती है।
रमन सिंह के पंद्रह साल के कार्यकाल को यदि निष्पक्षता से देखा जाए, तो यह राज्य के बुनियादी ढाँचे और आर्थिक विकास का स्वर्णिम काल था। इस दौरान, राज्य की अर्थव्यवस्था ने लगभग आठ प्रतिशत की मजबूत चक्रवृद्धि वार्षिक विकास दर दर्ज की। देश के कुल उत्पादन में छत्तीसगढ़ की हिस्सेदारी 1.4 प्रतिशत से बढ़कर 1.8 प्रतिशत हो गई। रमन सिंह सरकार की सबसे बड़ी ताकत उनकी सार्वजनिक वितरण प्रणाली का सुदृढ़ीकरण था, जिसने उन्हें चावल वाले बाबा की लोकप्रिय छवि दी। इस योजना ने राज्य के गरीब परिवारों तक न केवल सस्ता अनाज पहुँचाया, बल्कि कुपोषण से लड़ने में भी मदद की। इसके साथ ही, बिजली के क्षेत्र में किए गए सुधारों ने छत्तीसगढ़ को एक पॉवर-सरप्लस राज्य बना दिया। लेकिन, इस लंबी अवधि के विकास के बाद भी बस्तर और सरगुजा जैसे दूरदराज के आदिवासी इलाके मुख्यधारा से नहीं जुड़ पाए। लगभग 36 प्रतिशत आबादी बहुआयामी गरीबी के दायरे में बनी रही और दक्षिण छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद का खूनी खेल सरकार के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द बना रहा।
साल 2018 में जब भूपेश बघेल सत्ता में आए, तो उन्होंने राजनीति की धुरी को पूरी तरह बदल दिया। उन्होंने रमन सिंह के इंडस्ट्रियल मॉडल के मुकाबले रूरल इकॉनमी मॉडल को तरजीह दी। कांग्रेस का पूरा फोकस पैसा सीधे लोगों की जेब में डालने पर था। राजीव गांधी किसान न्याय योजना और देश में अपनी तरह की अनूठी गोधन न्याय योजना यानी गोबर खरीदी के जरिए ग्रामीण इलाकों में नकदी का प्रवाह बढ़ाया गया। बघेल सरकार ने छत्तीसगढ़िया स्वाभिमान और स्थानीय तीज-त्यौहारों को सरकारी संरक्षण देकर एक मजबूत क्षेत्रीय पहचान खड़ी की। सरकार का दावा था कि इन नीतियों के कारण छत्तीसगढ़ की बेरोजगारी दर घटकर महज 1.7 प्रतिशत रह गई, जो देश में सबसे कम में से एक थी। हालाँकि, यह मॉडल दिखने में जितना आकर्षक था, इसके भीतर की परतें उतनी ही कमजोर साबित हुईं। कर्ज माफी और नकद ट्रांसफर के चक्कर में राज्य का खजाना खाली होने लगा और विकास के बड़े बुनियादी काम ठप पड़ गए।
कांग्रेस सरकार के इस लोक-लुभावन चक्रव्यूह को भाजपा ने 2023 के चुनाव में भ्रष्टाचार के चाबुक से ढहा दिया। भूपेश बघेल के आखिरी दो साल विवादों और केंद्रीय एजेंसियों की जाँच के नाम रहे। सबसे बड़ा झटका महादेव बेटिंग ऐप कांड से लगा, जिसमें सीधे मुख्यमंत्री कार्यालय तक आँच आई और प्रमोटर्स से करोड़ों की रिश्वत के आरोपों ने सरकार की साख मिट्टी में मिला दी। इसके साथ ही लोक सेवा आयोग भर्ती घोटाले ने राज्य के शहरी युवाओं और मध्यम वर्ग को बुरी तरह नाराज कर दिया। चुनाव के वक्त जब कांग्रेस जातीय जनगणना और आरक्षण के सहारे दोबारा सत्ता का सपना देख रही थी, तब भाजपा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की गारंटी और महतारी वंदन योजना के तहत महिलाओं को सीधे वित्तीय मदद का कार्ड खेल दिया। परिणाम चौंकाने वाले रहे; एग्जिट पोल्स के सारे अनुमानों को दरकिनार करते हुए भाजपा ने 90 में से 54 सीटें जीतकर अब तक का अपना सबसे सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया, जबकि कांग्रेस 35 सीटों पर सिमट गई।
इस ऐतिहासिक जीत के बाद भाजपा ने एक बेहद सधा हुआ राजनीतिक कार्ड खेलते हुए विष्णु देव साय को मुख्यमंत्री बनाया। साय का राजनीतिक सफर जमीन से जुड़ा रहा है; उन्होंने 1989 में एक पंच के रूप में शुरुआत की थी और चार बार सांसद व केंद्रीय राज्य मंत्री रह चुके हैं। साय को कमान सौंपकर भाजपा ने न केवल सरगुजा और बस्तर के आदिवासी वोट बैंक को साधा, जहाँ भाजपा ने एकतरफा जीत हासिल की, बल्कि अरुण साव और विजय शर्मा को उपमुख्यमंत्री बनाकर एक आदर्श सामाजिक संतुलन भी तैयार किया। इस रणनीतिक बिसात का सीधा फायदा भाजपा को 2024 के लोकसभा चुनावों में मिला, जहाँ पार्टी ने क्लीन स्वीप करते हुए राज्य की सभी 11 सीटों पर परचम लहरा दिया। लोकसभा की यह बड़ी जीत यह साबित करती है कि छत्तीसगढ़ की जनता ने विष्णु देव साय की नई सरकार और केंद्र की नीतियों पर पूरी तरह मुहर लगा दी है।
वर्तमान में, मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के सामने चुनौतियाँ बहुत बड़ी हैं। रमन सिंह की विकासवादी विरासत को आगे बढ़ाना और भूपेश बघेल की लोक-कल्याणकारी योजनाओं के वित्तीय बोझ को संभालते हुए राज्य के खजाने को संतुलित करना उनकी पहली प्राथमिकता है। हालाँकि, गृह मंत्री अमित शाह द्वारा नक्सलमुक्त छत्तीसगढ़ का दवा उनके लिए राहत की खबर जरूर है, लेकिन छत्तीसगढ़ का राजनीतिक इतिहास गवाह है कि यहाँ की जनता वादों और दावों को बहुत करीब से परखती है। विष्णु देव साय के पास अब यह साबित करने का बेहतरीन मौका है कि उनकी सरकार सिर्फ चुनावी समीकरणों के सहारे नहीं, बल्कि सुशासन और पारदर्शी नीतियों के दम पर 2028 में भाजपा की सत्ता को बरकरार रख सकती है। आखिरकार, छत्तीसगढ़ की जागरूक जनता का यही संदेश है; काम करोगे तो टिकोगे, वरना विदाई तय है।