भारतीय संस्कृति और सभ्यता की असली ताकत इसकी विविधिता में बसती है। लेकिन, यही विविधिता कई बार कुछ समुदायों को हाशिए पर धकेलने का कारक बन जाती है। देश के घुमंतू समाज की स्थिति भी कुछ ऐसी ही है। यह समाज दशकों से उपेक्षा और असमानता का शिकार रहा है। जन्मजात अपराधी की दृष्टि से देखे गए या यूँ कहें,...
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घुमंतू समाज के नए जीवन का आधार बनेगा राष्ट्रीय स्तर का कॉमन आइडेंटिटी कार्ड
भारत में घुमंतू, अर्ध-घुमंतू और विमुक्त जातियों की संख्या देश की कुल आबादी की लगभग 10% है, जो अपनी खानाबदोश जीवनशैली के कारण अक्सर सरकारी योजनाओं और सामाजिक सुविधाओं से वंचित रहते हैं। हाल ही में राजस्थान सरकार ने इन समुदायों के बच्चों के लिए घुमंतू जाति पहचान पत्र जारी किया है, जिससे वे बिना स्थायी दस्तावेजों के भी स्कूलों...
Continue reading...भारत का घुमंतु समाज: डॉ. अतुल मलिकराम की दृष्टि से इतिहास, संस्कृति और अधिकार
भारत के सांस्कृतिक, सामाजिक और ऐतिहासिक परिदृश्य में घुमंतु समाज का स्थान अद्वितीय और गहरा है। यह कोई अलग या पृथक वर्ग नहीं, बल्कि भारत की सभ्यता की जीवंत धारा है — एक ऐसी धारा जो हजारों वर्षों से घूमती रही है, लेकिन कभी भी अपनी जड़ों से विचलित नहीं हुई। नट, सपेरा, बंजारा, लोहार, बैरवा, बावरिया, गारसिया, जोगी, टोड़ा,...
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