रात के तकरीबन साढ़े दस बजे होंगे। मैं ऑफिस से लौट रहा था। दिनभर की थकान के बाद बस घर पहुँचकर चैन से बैठने की इच्छा थी। ठंडी हवा चल रही थी, सड़कें खाली हो रही थीं, और लैंप पोस्ट की रोशनी में झींगुरों की हल्की-हल्की आवाज़ सुनाई दे रही थी। तभी मैंने सड़क के किनारे एक व्यक्ति को बेबस...
Continue reading...बरकत का ताबीज..
रात में गाँव में सन्नाटा पसरा हुआ था, सभी लोग सुबह होने तक नींद की यात्रा करने निकल पड़े थे.. लेकिन आखिरी छोर पर बने एक छोटे-से घर में भूख की कराहटें गूँज रही थीं। चूल्हा ठंडा पड़ा था, बर्तन खाली थे और एक माँ अपने बच्चे को थप-थपाकर सुलाने की नाकाम कोशिश कर रही थी। बच्चा धीरे से बोला-...
Continue reading...फेल होना भी है जरुरी….
हर चीज की शुरुआत बचपन से ही होती है। बचपन में सीखी सीख आपको भविष्य के लिए तैयार करती है। इसमें जितना योगदान घर से मिले संस्कारों का होता है, उतना ही स्कूली जीवन में मिली सीख का भी होता है। स्कूल से मिली सीख केवल किताबी ज्ञान ही नहीं देती है, बल्कि व्यक्ति को जिंदगी की कसौटी के लिए...
Continue reading...क्वालीफाईड होने में पीछे रह गई एजुकेशन
. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने कहा था, “शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य केवल डिग्री प्राप्त करना नहीं है, बल्कि इसे समाज के हित में उपयोग करना चाहिए।” लेकिन, समय के साथ यह धारणा धुँधली होती जा रही है। हम एक ऐसे दौर में जी रहे हैं, जहाँ डॉ डिग्री को योग्यता का प्रमाण माना जाता है, लेकिन उस डिग्री के पीछे...
Continue reading...गलत सीख देती किताबों का जिम्मेदार कौन?
कहते हैं किताबें हमारे जीवन की सबसे अच्छी साथी होती हैं। जब भी हमें उनकी आवश्यकता होती है, वे हमारे लिए उपलब्ध होती हैं। किताबें हमारे आसपास की दुनिया को समझने, सही और गलत के बीच निर्णय लेने में हमारी मदद करती हैं। वे हमारे आदर्श, मार्गदर्शक या सर्वकालिक शिक्षक के रूप में भी हमारे जीवन में शामिल होती हैं।...
Continue reading...जीवन के बोझ तले, कैसे पनपेंगे ये नौनिहाल??
अक्सर बीच-बाजार में या रास्तों में, चाय की टपरी या होटलों में हमें कुछ बच्चे नजर आते हैं। इनकी आँखें सितारों जैसी होती हैं, लेकिन उन आँखों की चमक को जीवन की कड़वी वास्तविकता ने धुँधला कर दिया है। यह कोई किताबी बातें नहीं, बल्कि गरीबी में पैदा हुए अनगिनत बच्चों का रोज़मर्रा का सच है। हर दिन उनके लिए...
Continue reading...बच्चों को दें कोई हुनर, ताकि वो बन पाएँ अपनी जिंदगी के विनर..
पिछले दिनों एक वीडियो देखने में आया, जहाँ महज़ ढाई-तीन साल का एक कोरियन बच्चा अपने अन्य दोस्तों के साथ अपनी कक्षा में बड़ी ही सावधानी और सफाई के खाना पकाना सीख रहा था। उन बच्चों को देखकर बड़ा अच्छा लगा। साथ ही, इतने छोटे बच्चों को खाना पकाते देख थोड़ा आश्चर्य भी हुआ, क्योंकि हमारे यहाँ तो ढाई-तीन साल...
Continue reading...शिक्षा है या नोट छापने की मशीन….
एक समय था जब शिक्षा को समाज में बदलाव और विकास का मुख्य साधन माना जाता था। शिक्षक को एक मार्गदर्शक, गुरु और प्रेरक के रूप में देखा जाता था, जो विद्यार्थियों को न केवल अकादमिक ज्ञान, बल्कि जीवन मूल्य भी सिखाते थे। यह वह समय था जब शिक्षक जीवन जीने के अनोखे गुण सिखाते थे और शिक्षा पूरी होने...
Continue reading...शिक्षित किसान, उन्नत देश
प्राचीन काल से ही भारत एक कृषि प्रधान देश रहा है, और कृषि हमेशा से ही हमारी अर्थव्यवस्था की रीढ़ बनी हुई है। आज भी देश की जीडीपी में लगभग 22% हिस्सा कृषि से आता है। लेकिन, जिस कृषि क्षेत्र ने देश को पहचान दी, वही दशकों से गंभीर संकटों का सामना कर रहा है। यह क्षेत्र जलवायु परिवर्तन, प्राकृतिक...
Continue reading...बाद पछताए क्या होत, जब चिड़िया चुग गई खेत..
हम एक ऐसे समय में जी रहे हैं, जहाँ विज्ञान और तकनीक ने हमारे जीवन को बेहद सुविधाजनक बना दिया है। हम हजारों किलोमीटर दूर बैठे इंसान को देख और सुन सकते हैं, पूरी दुनिया हमारे मोबाइल में समा गई है, कारण कि आज का युग तकनीकी का युग है। वीडियो कॉल, सोशल मीडिया और इंटरनेट ने हमें हर एक...
Continue reading...