दफ्तर की खामोशी बहुत कुछ कहती है। दिनभर की चहल-पहल के बाद जब कुर्सियाँ खाली हो जाती हैं, कंप्यूटर स्क्रीन्स बंद हो जाती हैं और बालकनी में सन्नाटा फैल जाता है, तब एक उद्योगपति का मन अक्सर सवालों से भर जाता है। क्या यह वही सपना है, जिसे कभी शून्य से शुरू किया था? क्या यह वही संस्थान है, जिसे...
Continue reading...बुंदेलखंड की बदहाली को बदलने का दस सूत्रीय रोडमैप
बुंदेलखंड की धरती, जो कभी अपनी वीरता और सांस्कृतिक विरासत के लिए विश्व विख्यात थी, आज गरीबी, बेरोजगारी और पलायन के अभिशाप से कराह रही है। यहाँ के गाँवों में फैली भुखमरी और अभाव की स्थिति किसी से छिपी नहीं है, लेकिन सत्ता के गलियारों में बैठी सरकार शायद इस चीख को सुनने में असमर्थ है। नीति आयोग का बहुआयामी...
Continue reading...पर्यावरण से आगे भारत के विकास का बड़ा अवसर ‘कार्बन क्रेडिट’
आज पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन की चुनौती से जूझ रही है। मौसम का असंतुलन, बढ़ती गर्मी, अनियमित बारिश और प्राकृतिक आपदाएँ अब सामान्य बात बनती जा रही हैं। ऐसे समय में ‘कार्बन क्रेडिट’ शब्द अक्सर सुनने को मिलता है। लेकिन, आम नागरिक के मन में सवाल होता है आखिर यह है क्या? और इसका हमसे क्या संबंध है? सरल शब्दों...
Continue reading...कहाँ चले नेता जी? — चुनावी मौसम और गायब होते नेताओं पर व्यंग्य
गाँव के नुक्कड़ से लेकर शहर की चाय की दुकान तक, एक सवाल हमेशा ट्रेंड करता है, जैसे चुनाव के समय बड़े-बड़े वादे मुफ्त में ट्रैंड करते हैं- “कहाँ चले नेता जी?” क्योंकि नेता जी तो लुकाछिपी के खेल में व्यस्त हो जाते हैं। जब नेता जी दिख नहीं रहे हों, तब समझ जाइए कि या तो चुनाव बहुत दूर...
Continue reading...दिग्विजय से शिवराज, कमलनाथ से मोहन यादव तक, ऐसा रहा मध्य प्रदेश का सियासी उठा-पटक
मध्य प्रदेश की सियासत का मिज़ाज़ देश के अन्य राज्यों से जरा जुदा है। 1956 में राज्य के गठन के बाद से इस धरती ने राजनीति के कई रंग देखे हैं। कभी कांग्रेस का एकछत्र राज, तो कभी भारतीय जनता पार्टी का अभेद्य किला, लेकिन पिछले तीन दशकों का इतिहास इस बात का गवाह है कि यहाँ की सत्ता कभी...
Continue reading...दो दलों के बीच घूमता छत्तीसगढ़ का राजनीतिक चक्रव्यूह
छत्तीसगढ़ की राजनीति का मिज़ाज़ देश के अन्य राज्यों से बिल्कुल जुदा है। 1 नवंबर 2000 को मध्य प्रदेश से अलग होकर बने इस राज्य ने अपने अब तक के सफर में कई राजनीतिक करवटें बदली हैं। यहां के शांत दिखने वाले मतदाताओं की राजनीतिक परिपक्वता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वे किसी भी दल...
Continue reading...मुलायम, मायावती से योगी तक, कैसा रहा दिल्ली की गद्दी का रास्ता तय करने वाले उत्तर प्रदेश की सियासत का अब तक का सफर
भारतीय राजनीति में एक कहावत बहुत मशहूर है कि देश के प्रधानमंत्री का रास्ता उत्तर प्रदेश से होकर गुजरता है। यह बात यूँ ही नहीं कही जाती, क्योंकि 80 लोकसभा सीटों वाला यह राज्य देश की सत्ता का मुख्य केंद्र रहा है। आजादी के बाद से देश को मिले 15 प्रधानमंत्रियों में से 9 इसी मिट्टी से निकले हैं। लगभग...
Continue reading...यूपीए का दशक: मनमोहन की मौन सरकार और उपलब्धियों-विवादों की कहानी
भारतीय राजनीति में 2004 से 2014 का दशक एक ऐसा विरोधाभासी और जटिल अध्याय है, जिसका मूल्यांकन एकतरफा नहीं किया जा सकता। एक राजनीतिक रणनीतिकार के चश्मे से देखने पर महसूस होता है कि यह वह ऐतिहासिक दौर था, जब भारत ने इतिहास की सबसे तेज आर्थिक विकास दर दर्ज की और अभूतपूर्व लोक-कल्याणकारी सामाजिक सुधारों की नींव रखी, लेकिन...
Continue reading...वर्ष 2026 के बाद किस दिशा में जाएगा भारतीय लोकतंत्र का भविष्य
भारतीय लोकतंत्र आज एक ऐसे ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा है, जहाँ से भविष्य की राहें पहले से कहीं अधिक जटिल और रोमांचक नजर आ रही हैं। वर्ष 2026 केवल कैलेंडर का एक नया पन्ना नहीं है, बल्कि यह उस व्यापक राजनीतिक परिवर्तन की दहलीज है, जो आने वाले दशकों के लिए भारत की लोकतांत्रिक दिशा निर्धारित करेगा। वर्ष 2014 के...
Continue reading...क्या 2047 तक भारत सच में विश्वगुरु बन पाएगा?
जब भारत 2047 में स्वतंत्रता के सौ वर्ष पूरे करेगा, तब वह केवल एक ऐतिहासिक उपलब्धि का उत्सव नहीं मना रहा होगा, बल्कि अपने अब तक के राजनीतिक, सामाजिक और वैचारिक सफर का गंभीर आत्म-मूल्यांकन भी कर रहा होगा। यह पड़ताल सिर्फ यह नहीं देखेगी कि देश ने कितनी आर्थिक तरक्की की, कितनी सड़कें बनीं या कितनी गगनचुंबी इमारतें खड़ी...
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