वर्ष 2026 में देश ने अपना 77वाँ गणतंत्र दिवस मनाया। परेड, सांस्कृतिक झांकियाँ, राष्ट्रपति का संबोधन और राष्ट्रगान की गूँज, ये सभी दृश्य एक बार फिर हमारी सामूहिक चेतना का हिस्सा बने। हर वर्ष की तरह इस बार भी 26 जनवरी ने हमें गर्व का अनुभव कराया, लेकिन गणतंत्र दिवस केवल उत्सव का दिन नहीं होता। यह वह अवसर होता...
Continue reading...सन् 1977 से 2026 तक, 50 वर्षों में कैसे बदली भारत की राजनीतिक विचारधारा
जून 1975 में जब इंदिरा गांधी ने आपातकाल लागू किया, तो उन्होंने अनजाने में भारतीय लोकतंत्र की उस नई नींव की आधारशिला रख दी थी, जिसे आने वाले पाँच दशकों की राजनीति को परिभाषित करना था। 1977 का चुनाव महज एक मतदान नहीं, बल्कि नागरिक अधिकारों की बहाली का जनादेश था, जिसने मोरारजी देसाई के रूप में देश को पहला...
Continue reading...घुमंतू समाज को मुख्यधारा में जोड़ने के लिए जरुरी केंद्र व राज्य सरकारों की इच्छाशक्ति
भारत की सांस्कृतिक विविधता में घुमंतू समाज एक अनमोल रत्न की तरह है, जो अपनी अनूठी जीवनशैली और परंपराओं के साथ देश की सामाजिक-आर्थिक संरचना का अभिन्न हिस्सा रहा है। लेकिन, आश्चर्यजनक रूप से यह समाज, दशकों से अपनी खानाबदोश प्रकृति के कारण मुख्यधारा से कटा हुआ है और आज भी मूलभूत सुविधाओं व अधिकारों से वंचित है। शिक्षा, स्वास्थ्य,...
Continue reading...रील से राष्ट्र-निर्माण: युवा भविष्य को किस दिशा में ले जा रहा बजट 2026?
केंद्रीय बजट 2026 ने भारत की युवा नीति, शिक्षा प्रणाली और कौशल विकास की दिशा को लेकर एक आवश्यक और स्वस्थ बहस को जन्म दिया है। स्कूलों और कॉलेजों में कंटेंट क्रिएशन लैब्स की घोषणा, एनीमेशन, गेमिंग और डिजिटल मीडिया जैसे उभरते क्षेत्रों में ट्रेनिंग तथा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डीप-टेक में फेलोशिप यह सभी संकेत देते हैं कि भारत बदलती...
Continue reading...सरकारें घुमंतू समाज को ओबीसी का दर्जा देकर करें मुख्यधारा में जोड़ने की पहल
भारतीय संस्कृति और सभ्यता की असली ताकत इसकी विविधिता में बसती है। लेकिन, यही विविधिता कई बार कुछ समुदायों को हाशिए पर धकेलने का कारक बन जाती है। देश के घुमंतू समाज की स्थिति भी कुछ ऐसी ही है। यह समाज दशकों से उपेक्षा और असमानता का शिकार रहा है। जन्मजात अपराधी की दृष्टि से देखे गए या यूँ कहें,...
Continue reading...घुमंतू समाज के नए जीवन का आधार बनेगा राष्ट्रीय स्तर का कॉमन आइडेंटिटी कार्ड
भारत में घुमंतू, अर्ध-घुमंतू और विमुक्त जातियों की संख्या देश की कुल आबादी की लगभग 10% है, जो अपनी खानाबदोश जीवनशैली के कारण अक्सर सरकारी योजनाओं और सामाजिक सुविधाओं से वंचित रहते हैं। हाल ही में राजस्थान सरकार ने इन समुदायों के बच्चों के लिए घुमंतू जाति पहचान पत्र जारी किया है, जिससे वे बिना स्थायी दस्तावेजों के भी स्कूलों...
Continue reading...गुलामी में भी भारत को विश्व विजेता बनाने वाले मेजर ध्यानचंद को भारत रत्न कब?
कहा जाता है कि 1936 के बर्लिन ओलंपिक के बाद जर्मनी के तानाशाह एडॉल्फ हिटलर ने भारतीय हॉकी टीम के जादूगर मेजर ध्यानचंद को अपने देश में उच्च पद और सम्मानजनक जीवन का प्रस्ताव दिया था। ध्यानचंद ने विनम्रता से मना कर दिया। उस दौर में, जब भारत गुलाम था, यह फैसला केवल एक खिलाड़ी का नहीं था, यह एक...
Continue reading...कब खुलेंगे बुंदेलखंड के घरों में लटके पलायन के जंग लगे ताले?
बुंदेलखंड.. यह केवल एक नाम या क्षेत्र नहीं है, यह शौर्य और स्वाभिमान की वह धरती है, जिसने रानी लक्ष्मीबाई जैसे वीरों को जन्म दिया। लेकिन, आज जब हम इस माटी की ओर देखते हैं, तो समझ आता है कि वर्तमान में इस वीर धरा की सबसे बड़ी त्रासदी कोई युद्ध नहीं, बल्कि वह खामोश ‘पलायन’ है, जो हमारे गाँवों...
Continue reading...मेरी व्यथा.. — एक उद्योगपति की अनकही कहानी
दफ्तर की खामोशी बहुत कुछ कहती है। दिनभर की चहल-पहल के बाद जब कुर्सियाँ खाली हो जाती हैं, कंप्यूटर स्क्रीन्स बंद हो जाती हैं और बालकनी में सन्नाटा फैल जाता है, तब एक उद्योगपति का मन अक्सर सवालों से भर जाता है। क्या यह वही सपना है, जिसे कभी शून्य से शुरू किया था? क्या यह वही संस्थान है, जिसे...
Continue reading...बुंदेलखंड की बदहाली को बदलने का दस सूत्रीय रोडमैप
बुंदेलखंड की धरती, जो कभी अपनी वीरता और सांस्कृतिक विरासत के लिए विश्व विख्यात थी, आज गरीबी, बेरोजगारी और पलायन के अभिशाप से कराह रही है। यहाँ के गाँवों में फैली भुखमरी और अभाव की स्थिति किसी से छिपी नहीं है, लेकिन सत्ता के गलियारों में बैठी सरकार शायद इस चीख को सुनने में असमर्थ है। नीति आयोग का बहुआयामी...
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