गरीबी एक ऐसा शब्द है, जो सुनने में जितना साधारण लगता है, वास्तविकता में उतना ही भयावह और गंभीर है। यह एक ऐसी सामाजिक बुराई है, जिसने न केवल व्यक्ति विशेष बल्कि पूरे समाज, देश और यहाँ तक की वैश्विक स्तर पर मानवता को जकड़ रखा है। गरीबी को सही मायनों में एक अभिशाप कहा जाए, तो यह कोई अतिशयोक्ति...
Continue reading...फायदेमंद गरीबी
एक समय था जब स्वयं को गरीब बताना हीन भावना को जन्म देता था, लेकिन अब स्वयं को गरीब दर्शाना फायदेमंद हो गया है…. स्वतंत्रता के बाद देश में जातिगत भेदभाव और गरीबी से उत्थान के लिए छात्रवृत्ति, अनुदान और विभिन्न योजनाओं इत्यादि के माध्यम से आर्थिक सहायता प्रदान करने के लिए सरकार ने विभिन्न योजनाएँ लागू कीं, ताकि पिछड़े...
Continue reading...आपके मायने में आशियाने की परिभाषा क्या?
अपना काम बनता,भाड़ में जाए जनता….. शाम का समय, गोधूलि बेला में घर की बालकनी में बैठकर चाय की चुस्कियाँ लेने का जो आनंद है, उसे शब्दों में बयाँ कर पाना मुश्किल है। मेरा पेड़-पौधों और खुले वातावरण से विशेष लगाव है, इसलिए मैं अक्सर शाम का समय घर की बालकनी में ही बिताता हूँ। एक शाम मैं बालकनी में...
Continue reading...सड़कें न हो गरीबों का घर……
हमारे शहरों के हर कोने में, जहाँ पर जीवन एक अलग लय में बहता है और जहाँ सपनों को उड़ने के लिए पंख मिलते हैं, इसके पीछे एक कड़वी हकीकत छिपी है, जिसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। शहरी गरीब, जो शहर को जीवित रखने के लिए कड़ी मेहनत करते हैं, उन्हें जीवन की बुनियादी जरूरतों के बिना खुद...
Continue reading...किसने बनाए हैं ‘जूठन’ और ‘उतरन’ जैसे शब्द?
लम्बे समय की सेविंग के बाद पिछले महीने ही अपने लिए इतना महँगा शर्ट खरीदा था, इतनी जल्दी यह मुझे छोटा होने लगा है, एक काम करता हूँ किसी को दे देता हूँ.. आज फिर माँ ने टिफिन में दो रोटी ज्यादा रख दी, यह फिर फेंकने में जाएगी, किसी को दे देता हूँ.. यह जो हमारे द्वारा अपने कपड़ों...
Continue reading...तोड़ देगी भारत को गरीबी एक दिन
बात करे हैं कामयाबी की दास्तां सुनाएँ क्या गरीबी की भूखा तरसे खाने के एक निवाले को नमन है भारत के ऐसे विकास निराले कोविभिन्न देशों की स्थिति-परिस्थिति यानि आर्थिक स्थिति को देखते हुए, उन्हें दो हिस्सों में विभाजित किया जाता है: एक विकसित और एक विकासशील। निम्न और मध्यम आय वाली अर्थव्यवस्थाओं को आमतौर पर विकासशील देश कहा जाता...
Continue reading...‘मैं’ सिर्फ एक शरीर तक सीमित नहीं
सर्दियों की एक शांत-सी सुबह में, मुझे अपने विचारों के साथ कुछ सुखद पल खुद के साथ बिताने का सुअवसर मिला। चारों ओर कुहासा पसरा था, जैसे समय खुद किसी तपस्वी की तरह मौन साधे बैठा हो। मन उसी मौन में कहीं भीतर उतर गया था कि तभी एक प्रसंग की बेशकीमती स्मृति मेरे मन में दस्तक देती है, जो...
Continue reading...शुरुआत कहाँ से करें?
शुरुआत कहाँ से करें? शायद वहीं से जहाँ हम अक्सर ठिठक जाते हैं.. शायद वहीं से, जहाँ पहली बार किसी की बात ने भीतर तक चुभा दिया था, और हम चुपचाप मुस्कुरा दिए थे, ताकि किसी को महसूस न हो कि भीतर तक सब कुछ हिल चुका है। जहाँ हम पहली बार कमज़ोर कहे गए थे और हमने ऊपर से...
Continue reading...शब्दों में शक्ति तभी होगी, जब सोच में गहराई होगी..
“एक लेखक की सबसे बड़ी पूँजी उसकी सोच होती है। शब्द तो केवल उस सोच का माध्यम होते हैं।” एक शाम मैं अपनी बालकनी में सुकून से बैठा था। बड़े दिनों बाद ऐसा मौका मिला था, जब हाथ में एक बढ़िया किताब और पास में गर्मागर्म चाय थी। लेखक ने किताब में अपनी विचारधारा को कुछ इस तरह पिरोया था...
Continue reading...भाग्यशाली मैं….
आजकल जीवन जीने का ढंग किसी राजा महाराजा जैसा हो गया है। जब से स्मार्ट फोन लिया है एक अलग ही अनुभूति होती है। सुबह उठते ही न जाने कितने गुड मॉर्निंग और सुप्रभात के मैसेज राह देखते हैं, जैसे मेरी प्रभात के शुभ हुए बिना तो मेरे मित्रों का दिन ही नहीं निकलेगा। फिर इतनी इज्जत पाकर जो अनुभूति...
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