आजकल की दिखावे की दुनिया में यह देखना वाकई निराशाजनक है कि मानव स्वभाव कितना उथला हो सकता है। हम अक्सर वास्तविक मायने रखने वाली चीजों के बजाए चमक-दमक वाली चीजों की ओर अधिक आकर्षित होते हैं। दिखावे का यह जुनून हमारे समाज की प्राथमिकताओं के बारे में बहुत कुछ कहता है। यह दर्शाता है कि हम अक्सर इस बात...
Continue reading...एक प्यारी-सी जिद…
बचपन की वो सुनहरी यादें.. याद है जब हम अपनी छोटी-छोटी जिदें पूरी करने के लिए बड़ों से रूठ जाया करते थे। कभी गुलाबी रंग का गुब्बारा चाहिए, तो कभी रंग-बिरंगी चूड़ियाँ। घुँघरू वाले झुनझुने की खनक या फिर मुँह में मिठास घोलते गुलाबी-गुलाबी गुड़िया के बाल.. इन छोटी-छोटी चीज़ों के लिए की गई हमारी जिद, हमारे बचपन की उन...
Continue reading...समाज पानी तो फिल्टर कर पीता है लेकिन खून नहीं
कैदियों के प्रति समाज का नज़रिया अपराधी या पीड़ित के बीच नहीं बंटा हुआ है। यह एक कटु सत्य है कि समाज के लिए एक कैदी सिर्फ अपराधी हो सकता है पीड़ित नहीं। यही सोच समाज पर भारी पड़ रही है और न केवल अपराध बल्कि अपराधियों को भी जन्म दे रही है। भारतीय समाज में कैदियों के प्रति नज़रिया...
Continue reading...बिना सज़ा के ही सज़ा काट रहे हैं विचाराधीन कैदी..
भारत एक लोकतांत्रिक देश है, जहाँ हर किसी को स्वतंत्रता से जीने का अधिकार है। भारत के संविधान और न्यायपालिका का भी यही मानना है कि भले ही कोई अपराधी सज़ा पाने से बच जाए, लेकिन किसी बेगुनाह को सज़ा न हो। लेकिन, विडंबना यह है कि इस लोकतांत्रिक और न्यायप्रिय देश में कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो अपना...
Continue reading...अब जरुरत, जेलों को बनाया जाए
बिगाड़गृह से सुधारगृह आज की जेलें: सुधारगृह या बिगाड़गृह? प्राचीन समय में किसी अपराधी के लिए कारावास की सज़ा को जरुरी माना जाता था। उसके पीछे तर्क यह था कि कैदियों को एकांत कारावास में रखने से उन्हें आत्म-मंथन का मौका मिले, जिससे अपराधियों में सुधार आए। हिंदू और मुगल शासन के दौरान, अपराधियों को कड़ी निगरानी में रखा जाता...
Continue reading...एक गुनाह की कितनी सज़ा?
समाज की दिखावटी सुविधाओं की ऊँची-ऊँची दीवारों के पीछे, दर्द और पीड़ा की एक छिपी हुई दुनिया है। यह दुनिया है जेल के कैदियों की, जो एक गलती के लिए सज़ा के अंतहीन चक्र में फंसे हुए हैं। समाज के मायने में एक अपराध के लिए एक ही सज़ा होती है। हमें भी बस इतना ही दिखता है कि किसी...
Continue reading...जिंदगियों को खत्म करता अपराध का जाल..
उभरते हुए भारत की एक अनदेखी वास्तविकता है भारतीय जेलों की दमनकारी दुनिया…. जेलों की शुरुआत करने का मूल उद्देश्य सुधार और पुनर्वास करना था, लेकिन दुःखद रूप से यह अपराध को जन्म देने वाले केंद्र में तब्दील हो चुकी हैं। ऊँची-ऊँची दीवारों के भीतर की परिस्थितियाँ न केवल आपराधिक व्यवहार को कायम रखती हैं, बल्कि लोगों को अपराध के...
Continue reading...समाज के लिए नुकसानदेह 50 वर्ष से अधिक उम्र के कैदियों के पुनर्वास और कल्याण की नज़रअंदाजगी
एनसीआरबी के आँकड़ों के अनुसार भारतीय जेलों में 50 वर्ष से अधिक उम्र के 73 हजार से ज्यादा कैदी हैं। ऐसे कैदियों की स्थिति और उनकी रिहाई के बाद का जीवन एक महत्वपूर्ण मुद्दा है, जिस पर जेल प्रशासन और केंद्र सरकार को विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। आज के समय में, जब भारत सामाजिक न्याय और समावेशी विकास...
Continue reading...क्या सच में पढ़ाई से ज्यादा जरुरी है शादी?
कुछ समय पहले गुजरात के जामनगर में हुए एक भव्य आयोजन की चर्चा आपने जरूर सुनी होगी। देश के सबसे अमीर व्यक्ति मुकेश अंबानी के बेटे की प्री-वेडिंग सेरेमनी थी। रिपोर्ट्स बताती हैं कि इस तीन दिवसीय भव्य आयोजन पर करीब 1200 करोड़ रुपए खर्च हुए। हमारे देश में अक्सर ऐसी खबरें सुनने में आती हैं कि फलाने की शादी...
Continue reading...जेल: एक अनकही यूनिवर्सिटी में बुलंद होते
नामी क्रिमिनल्स के हौंसले जेल एक अनोखी यूनिवर्सिटी है। जेल एक कैदी को इतना सिखा देती है कि हम और आप उस बारे में सोच भी नहीं सकते। अगर यूँ कहा जाए कि जेल, जिंदगी की भूख बढ़ा देती है, तो इसमें कुछ भी गलत नहीं होगा। आप हर एक चीज़ के लिए भूखे होते हैं। आईपीएस दिनेश एमएन, जिन्होंने...
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