ब्रांड वह शब्द है, जिसने दुनियाभर में तहलका मचा रखा है। यह सिर्फ एक लेबल नहीं है; यह एक धारणा है, जो हमारे विचारों को प्रभावित करती है। आज की दुनिया में हर कोई ब्रांडेड सामान की तलाश में रहता है। चाहे वह कपड़ा, खाना, इलेक्ट्रॉनिक्स या कोई अन्य दैनिक आवश्यकता की चीज़ हो, हर चीज़ को खरीदने से पहले...
Continue reading...मेरा काम ही मेरी पहचान है….
एक शाम मैं अपने घर की बालकनी में अपने कुछ मित्रों के साथ बैठा था कि अचानक तेज बारिश आ गई। सुहावनी शाम और तेज बारिश में याद आई गरमा-गर्म चाय और पकौड़ों की.. बात जब पकौड़ों की चली, तो हर कोई शहर में सबसे स्वादिष्ट पकौड़े कहाँ मिलते हैं, इस पर अपनी राय परोसने लगा.. कोई कहता कि पकौड़े...
Continue reading...लोगों का भला भी करते चलें..
जीवन की आपाधापी में ऐसे न जाने कितने ही काम हैं, जो बेशक हमें जिम्मेदारी के साथ करने होते हैं, लेकिन हमारी शान-ओ-शौकत के नीचे कुचलकर वे दम तोड़ देते हैं.. आलिशान बंगले, महँगी गाड़ियाँ, संभाले न संभले ऐसी धन-दौलत, नाम, रुतबा और भी न जाने कितने ही भारी-भरकम शब्द घोंट देते हैं गला उन लोगों का, जिनके जीवन के...
Continue reading...कठिनाइयों के बीच खड़ी उम्मीद……
शहर की हलचल भरी सड़कों पर, हॉर्न बजाते शोर और तेज़ कदमों की आवाज़ के बीच, हमारे दैनिक जीवन के गुमनाम नायक मौजूद होते हैं। ये लोग, जिन्हें अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है और कम ही सराहा जाता है, हमारे शहरी जीवन के महत्वपूर्ण स्तंभ हैं। फिर भी, उनकी चुनौतियों और बाधाओं से भरी यात्रा पर शायद ही कभी...
Continue reading...चंद रुपयों का सौदा….
आजकल की दिखावे की दुनिया में यह देखना वाकई निराशाजनक है कि मानव स्वभाव कितना उथला हो सकता है। हम अक्सर वास्तविक मायने रखने वाली चीजों के बजाए चमक-दमक वाली चीजों की ओर अधिक आकर्षित होते हैं। दिखावे का यह जुनून हमारे समाज की प्राथमिकताओं के बारे में बहुत कुछ कहता है। यह दर्शाता है कि हम अक्सर इस बात...
Continue reading...एक प्यारी-सी जिद…
बचपन की वो सुनहरी यादें.. याद है जब हम अपनी छोटी-छोटी जिदें पूरी करने के लिए बड़ों से रूठ जाया करते थे। कभी गुलाबी रंग का गुब्बारा चाहिए, तो कभी रंग-बिरंगी चूड़ियाँ। घुँघरू वाले झुनझुने की खनक या फिर मुँह में मिठास घोलते गुलाबी-गुलाबी गुड़िया के बाल.. इन छोटी-छोटी चीज़ों के लिए की गई हमारी जिद, हमारे बचपन की उन...
Continue reading...समाज पानी तो फिल्टर कर पीता है लेकिन खून नहीं
कैदियों के प्रति समाज का नज़रिया अपराधी या पीड़ित के बीच नहीं बंटा हुआ है। यह एक कटु सत्य है कि समाज के लिए एक कैदी सिर्फ अपराधी हो सकता है पीड़ित नहीं। यही सोच समाज पर भारी पड़ रही है और न केवल अपराध बल्कि अपराधियों को भी जन्म दे रही है। भारतीय समाज में कैदियों के प्रति नज़रिया...
Continue reading...बिना सज़ा के ही सज़ा काट रहे हैं विचाराधीन कैदी..
भारत एक लोकतांत्रिक देश है, जहाँ हर किसी को स्वतंत्रता से जीने का अधिकार है। भारत के संविधान और न्यायपालिका का भी यही मानना है कि भले ही कोई अपराधी सज़ा पाने से बच जाए, लेकिन किसी बेगुनाह को सज़ा न हो। लेकिन, विडंबना यह है कि इस लोकतांत्रिक और न्यायप्रिय देश में कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो अपना...
Continue reading...अब जरुरत, जेलों को बनाया जाए
बिगाड़गृह से सुधारगृह आज की जेलें: सुधारगृह या बिगाड़गृह? प्राचीन समय में किसी अपराधी के लिए कारावास की सज़ा को जरुरी माना जाता था। उसके पीछे तर्क यह था कि कैदियों को एकांत कारावास में रखने से उन्हें आत्म-मंथन का मौका मिले, जिससे अपराधियों में सुधार आए। हिंदू और मुगल शासन के दौरान, अपराधियों को कड़ी निगरानी में रखा जाता...
Continue reading...एक गुनाह की कितनी सज़ा?
समाज की दिखावटी सुविधाओं की ऊँची-ऊँची दीवारों के पीछे, दर्द और पीड़ा की एक छिपी हुई दुनिया है। यह दुनिया है जेल के कैदियों की, जो एक गलती के लिए सज़ा के अंतहीन चक्र में फंसे हुए हैं। समाज के मायने में एक अपराध के लिए एक ही सज़ा होती है। हमें भी बस इतना ही दिखता है कि किसी...
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