हर किसी के जीवन में एक गाँव होता है, कभी जन्मभूमि के रूप में, तो कभी नानी के घर के रूप में.. माध्यम कई हो सकते हैं, लेकिन हर किसी का जीवन किसी न किसी बहाने गाँव से जुड़ा जरूर होता है.. वह दुनिया, जहाँ दिल हर बार लौट जाना चाहता है। मेरे लिए गाँव सिर्फ एक जगह नहीं, बल्कि...
Continue reading...देश से गरीबी का नाम-ओ-निशान ही गायब
सूरज अपनी हल्की किरणें बिखेर रहा था और मैं बालकनी में बैठकर अखबार के पन्ने पलट रहा था। एक हेडलाइन पर नज़र ठिठक गई: “भारत अब गरीबी मुक्त देश बन चुका है!” मेरी आँखें चमक उठीं। क्या यह सच में संभव हो गया? क्या अब कोई भी सड़क किनारे भूखा नहीं सोता? क्या अब किसी भी माँ को अपने बच्चे...
Continue reading...समाज और राजनीति
भीड़ में खामोशी.. हलचल भरी और खचाखच भीड़ वाली सड़कों पर जहाँ शहरी जीवन की दैनिक लय लोगों के जमावड़े के साथ पूरी होती है, वहाँ इस भीड़ के भारी शोर के बीचों-बीच कुछ लोग चुपचाप सादगी से चंद रुपए कमाने की आस में खुद से ही एक खामोश जंग लड़ रहे होते हैं। उनके जीवन का यह पिन ड्रॉप...
Continue reading...लिफाफे का नया चलन….
हम भारतीयों के जीवन में लिफाफे का महत्व किसी मूल्यवान वस्तु से कम नहीं है। शादी हो, सालगिरह हो, बच्चे का जन्म हो, या फिर कोई और खास मौका, शगुन का लिफाफा हर जगह अपनी उपस्थिति दर्ज कराता है। लेकिन ज़रा सोचिए, क्या हो यदि यह परंपरा सिर्फ खुशी के मौकों तक सीमित न रहे, बल्कि जीवन के कठिन समय...
Continue reading...आधुनिकता की दौड़ में खोता अपनापन……
भारत हमेशा से ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ के सिद्धांत पर विश्वास करने वाला देश रहा है। एक समय भारत ऐसा देश था, जहाँ संयुक्त परिवार जीवन का अभिन्न हिस्सा हुआ करते थे। यह वही देश है, जहाँ तीन-चार पीढ़ियाँ एक ही छत के नीचे रहा करती थीं। हर उम्र के लोग एक-दूसरे के साथ हँसी-खुशी के पलों को साझा किया करते थे।...
Continue reading...मंदिरों में बढ़ती भीड़: आस्था या दिखावा?
कई सालों पहले जब हम मंदिर जाया करते थे, तो वहाँ का दृश्य अलग ही हुआ करता था। शांतिपूर्ण माहौल, घंटियों की मधुर ध्वनि और श्रद्धालुओं की आँखों में भक्ति की चमक। लोग भगवान के दर्शन के लिए आते थे, उनकी आराधना करते थे और मन की शांति पाते थे। लेकिन, आजकल का नजारा कुछ बदला हुआ-सा दिखाई देता है।...
Continue reading...अश्लीलता की बाढ़ में बर्बाद होती युवा पीढ़ी
सोशल मीडिया और ओटीटी प्लेटफॉर्म पर बढ़ती अश्लीलता, देश के लिए नई चुनौती खड़ी कर रही है… भारतीय संस्कृति में सदाचार, चरित्र निर्माण, विनम्रता, प्रेम, दया, त्याग और आदर-सम्मान जैसे सद्गुणों को हमेशा से ही प्रमुखता दी गई है। इसके बावजूद, समाज में बढ़ते अपराध और नैतिक पतन की खबरें हमें आए दिन देखने, सुनने और पढ़ने को मिलती रहती...
Continue reading...उतना ही लें थाली में, व्यर्थ न जाए नाली में..
कुछ दिन पहले एक शादी समारोह में जाना हुआ, वहाँ की चकाचौंध देखते ही बनती थी। समारोह की रौनक देखकर ही पता चल रहा था कि काफी खर्च किया गया है। जब खाने की तरफ बढ़ा, तो देखा वहाँ खाने की कई वैरायटीज़ थी। मेन कोर्स अलग और बाकी स्टॉल्स अलग। वहाँ देखता क्या हूँ कि लोग हर व्यंजन को...
Continue reading...धर्म का व्यवसाय…..
धर्म, एक ऐसा शब्द है, जिसे सुनते ही मन में पवित्रता और शांति का अनुभव होने लगता है। यह एक ऐसी प्राचीन धारणा है, जो मनुष्य को नैतिकता, आध्यात्मिकता और सन्मार्ग की ओर प्रेरित करती है। धर्म का उद्देश्य सदा से व्यक्ति को ईश्वर और आत्म-साक्षात्कार की ओर ले जाना रहा है, ताकि वह छल, कपट और लालच जैसे विकारों...
Continue reading...रसोई का पलायन
आज जब रसोई में स्टील के डब्बों से लेकर माइक्रोवेव की बीप तक सब कुछ शोर करता है, तब अनायास ही स्मृति में गूँज उठती है वह धीमी-धीमी आवाज़ चूल्हे के नीचे जलती लकड़ी की चिट-चिट की.. और वह कभी न भूली जा सकने वाली याद.. आँच पर सौंधी-सी रोटी पकने की, पीतल की कढ़ाही में सरसों के तेल की...
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