कल्पना कीजिए एक माँ की, जो एक छोटे-से गाँव में रहती है। दिन भर की भागदौड़ से हुई थकान की वजह से सुबह उठने में कहीं देर न हो जाए, इस वजह से सारी रात खिड़की की संद से रोशनी के आने के इंतज़ार में बिता देती है। हर दिन तड़के उठकर, उसकी पहली चिंता होती है अपने परिवार के...
Continue reading...तमाम तथ्यों में से सत्य माना किसे जाए?
इंटरनेट पर गरीबी की खबरों और इससे जुड़े आँकड़ों की बाढ़ आई पड़ी है। कुछ खबरें दावा करती हैं कि भारत से गरीबी बीते कुछ सालों या दशकों में अच्छी खासी मात्रा में कम हुई है, जबकि कुछ खबरें लम्बे-चौड़े आँकड़ों के साथ इस बात की पुष्टि करती हैं कि देश से भुखमरी गुड़ पर मक्खी की तरह चिपकी बैठी...
Continue reading...माथे पर मक्कारी का ठप्पा लगातीं सरकारी योजनाएँ
मदद एक हद तक ही अच्छी लगती है, यदि बार-बार और लगातार मदद मिलती रहे, तो मदद लेने वाला व्यक्ति इसका आदी बन जाता है। उसमें काम करने की लगन का गला तो घुटने लगता ही है, साथ ही साथ मक्कारी का ठप्पा भी उस व्यक्ति के माथे पर लग जाता है। भारत सरकार जरूरतमंदों को राहत देने के उद्देश्य...
Continue reading...अज्ञानी पर ही सदा, करे गरीबी वार…..
क्या आपने कभी सोचा है बचपन में हमें अ से ज्ञ ही क्यों सिखाया गया, ज्ञ को पहले अ को बाद में क्यों नहीं सिखाया गया? दरअसल अ से ज्ञ तक पढ़ना, अज्ञान से ज्ञानी बनाने तक का पूरा सफर है। इस बात को समझने में लोगों की पूरी उम्र निकल जाती है और कई बार उम्र निकलने के बाद...
Continue reading...पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं…….
रामचरित मानस की यह चौपाई बताती है कि किसी के अधीन रहना कितना बड़ा अभिशाप होता है। हमारे धर्मिक ग्रन्थ हमें बहुत सी ऐसी बातें बताते हैं, जिन्हें स्वयं अनुभव करना कोई नहीं चाहेगा। उन्हीं में से एक है, पराधीनता…. हर कोई स्वतंत्रता चाहता है फिर चाहे वह इंसान हो या पशु-पक्षी। बात जब पशु-पक्षी की चली है, तो मैं...
Continue reading...दान-पुण्य के झूठे ढकोसलें
संसार का यह नियम है, जो इस धरती पर आया है उसे एक न एक दिन अपना जीवन काल पूरा करके मृत्यु को प्राप्त करना ही है। लगभग सभी धर्मों की यह मान्यता है कि किसी के मरने के बाद उसके लिए कुछ किया जाना चाहिए। उस व्यक्ति के मरने के बाद न जाने कितनी ही वस्तुओं का दान किया...
Continue reading...बेरोजगारी की गर्त में जा रहे हैं युवा, तो फिर सरकारी नौकरियाँ कौन ले रहा..??
सरकार तो पर्याप्त नौकरियाँ दे रही है, लेकिन आज के युवा उन नौकरियों को पाने के लिए बनाए गए मापदंडों को पार कर पाने में सक्षम ही नहीं हैं बेरोजगारी एक ऐसा विषय बन गया है, जिसकी चर्चा बरसों से ज्यों की त्यों बनी रहती है, कम होने के बजाए उल्टा यह दिन-ब-दिन बढ़ती ही चली जाती है। आज के...
Continue reading...अपना दाम खोटा, परखैया का क्या दोष..?
पहले के ज़माने में लोग ‘पहला सुख निरोगी काया’ को मानते थे। पूरे दिन मेहनत-मजदूरी करने के बाद शाम को चौपाल पर बैठकर किस्से-कहानियाँ सुनाया करते थे। उस समय मोबाइल और टीवी नाम के दानव नहीं हुआ करते थे। इसलिए लोग अपना समय बातों-बातों में बड़ी-बड़ी सीख देने वालीं ज्ञान की बातें एक-दूसरे से साझा किया करते थे। वह भी...
Continue reading...क्या हम लौटने लगे हैं अपनी जड़ों की ओर?
हर दिन के नियम की तरह कल शाम जब मैं मंदिर गया, तो कुछ लेट हो गया। तब तक आरती का समय हो चला था, तो मैं वहीं रुक गया। आरती के लिए जैसे ही शंख बजा, मंदिर में मौजूद सभी लोग एक जगह जमा हो गए। और फिर शंख और घंटी की मधुर आवाज के साथ आरती शुरू हुई।...
Continue reading...इस बार चलते हैं उल्टी सैर पर..
समय के पहिए के घूमने के साथ रहन-सहन के तरीके, परम्पराओं, अन्य तौर-तरीकों और यहाँ तक कि लोगों की विचारधाराओं में भी बड़े बदलाव देखने को मिलते हैं। बड़े दिनों बाद कल एक परिचित के यहाँ शादी में जाना हुआ, तब मैंने यह बात गौर की, कि समय के साथ बहुत कुछ बदल गया है.. बड़ा ही शानदार माहौल था।...
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