मध्य प्रदेश की सियासत का मिज़ाज़ देश के अन्य राज्यों से जरा जुदा है। 1956 में राज्य के गठन के बाद से इस धरती ने राजनीति के कई रंग देखे हैं। कभी कांग्रेस का एकछत्र राज, तो कभी भारतीय जनता पार्टी का अभेद्य किला, लेकिन पिछले तीन दशकों का इतिहास इस बात का गवाह है कि यहाँ की सत्ता कभी स्थिर पानी की तरह शांत नहीं रही, बल्कि इसमें हमेशा ज्वार-भाटा आता रहा है। इस दौर ने दिग्विजय सिंह के दस साल के चतुर शासन को देखा, तो शिवराज सिंह चौहान के अठारह साल के बेमिसाल और जमीनी नेतृत्व को भी जीया। बीच में कमलनाथ की 15 महीने की अल्पकालिक सरकार का सस्पेंस आया और फिर 2023 में मोहन यादव के रूप में एक नए और अप्रत्याशित चेहरे का उदय हुआ।
मध्य प्रदेश के चुनावी इतिहास में एक दिलचस्प गणित हमेशा काम करता आया है, वह यह कि जब भी मतदान का प्रतिशत बढ़ा, सत्ता की चाबी दूसरे हाथ में चली गई। 1990, 1993 और फिर 2003 में बढ़े हुए मतदान ने सरकारों को पलटने का काम किया। हालाँकि, 2023 के चुनाव ने इस पुरानी राजनीतिक परंपरा को तोड़कर एक नया अपवाद रच दिया, जहाँ वोटिंग प्रतिशत बढ़ने के बावजूद सत्ताधारी दल ने अपनी कुर्सी और मजबूती से बचा ली।
इस सिलसिले की शुरुआत साल 1993 से हुई, जब दिग्विजय सिंह ने मध्य प्रदेश की कमान संभाली। एक कुशल राजपूत नेता के रूप में उन्होंने लगातार दस वर्षों तक राज्य पर राज किया। उनके कार्यकाल को जहाँ प्रशासनिक विकेंद्रीकरण और नीतियों के लिए जाना गया, वहीं विकास की धीमी रफ्तार और सड़कों-बिजली के संकट जैसे विवादों ने उनका पीछा नहीं छोड़ा। साल 1993 में 174 सीटें और 1998 में 172 सीटें जीतकर दिग्विजय सिंह ने कांग्रेस का दबदबा बनाए रखा, लेकिन यही दौर मध्य प्रदेश में कांग्रेस का आखिरी स्वर्णिम काल साबित हुआ। साल 2003 के विधानसभा चुनाव ने राज्य की राजनीति को हमेशा के लिए बदल दिया। एंटी-इंकंबेंसी की ऐसी लहर चली कि दिग्विजय सरकार महज 38 सीटों पर सिमट गई और भाजपा 165 सीटों के प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में आ गई। भाजपा ने इस चुनाव में उमा भारती को आगे किया था। लोधी समुदाय से आने वाली उमा भारती के चेहरे ने भाजपा को अपने पारंपरिक सवर्ण वोट बैंक के दायरे से बाहर निकालकर पिछड़े वर्ग के बीच बेहद मजबूत और नई पहचान दिलाई।
उमा भारती के मुख्यमंत्री बनने के साथ ही मध्य प्रदेश में भाजपा के उस युग की शुरुआत हुई, जिसने राजनीति के सारे पुराने समीकरण ध्वस्त कर दिए। हालाँकि, उमा भारती और उनके बाद बाबूलाल गौर का कार्यकाल छोटा रहा, लेकिन नवंबर 2005 में जब किरार समुदाय से आने वाले शिवराज सिंह चौहान ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, तो मानो सूबे की सियासत को एक नया चेहरा मिल गया। शिवराज ने मामा की अपनी छवि और लाड़ली लक्ष्मी जैसी संवेदनशील कल्याणकारी योजनाओं के दम पर महिलाओं को अपना सबसे बड़ा और वफादार वोट बैंक बना लिया। नतीजा यह हुआ कि भाजपा ने साल 2008 में 143 सीटें और 2013 में 165 सीटें जीतकर लगातार अपनी ताकत बढ़ाई। लेकिन, राजनीति कभी सीधी रेखा में नहीं चलती।
साल 2018 के चुनाव में भाजपा का रथ अचानक थम गया। पंद्रह साल बाद कांग्रेस ने 114 सीटें जीतकर सत्ता में वापसी की, जबकि भाजपा 109 सीटों पर अटक गई। भाजपा की इस हार के पीछे सबसे बड़ी वजह संसद द्वारा एससी/एसटी एक्ट में किए गए संशोधन से सवर्णों का नाराज होना था। इस नाराजगी को हवा सपाक्स पार्टी ने दी। भले ही सपाक्स कोई सीट नहीं जीत पाई, लेकिन उसने भाजपा को सवर्ण विरोधी दिखाने का माहौल बना दिया, जिससे भाजपा को भारी नुकसान हुआ। बाद में इसी डैमेज कंट्रोल के लिए केंद्र सरकार को सामान्य वर्ग के लिए 10 प्रतिशत ईडब्ल्यूएस आरक्षण लागू करना पड़ा।
साल 2018 में सत्ता में आई कांग्रेस ने उच्च जातियों को साधने के लिए कमलनाथ के रूप में एक राजपूत चेहरे को मुख्यमंत्री बनाया। लेकिन, युवा ओबीसी नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया की अनदेखी करना कांग्रेस को भारी पड़ गया। यह अंतर्विरोध मार्च 2020 में तब फूट पड़ा, जब सिंधिया अपने 22 वफादार विधायकों के साथ भाजपा में शामिल हो गए। कमलनाथ सरकार गिर गई और शिवराज सिंह चौहान ने चौथी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेकर सत्ता की कमान दोबारा संभाल ली। इसके बाद आया साल 2023 का चुनाव, जिसने विश्लेषकों को भी चौंका दिया।
भाजपा ने 230 में से 163 सीटें जीतकर विपक्ष को धराशायी कर दिया, जबकि कांग्रेस सिर्फ 66 सीटों पर सिमट गई। इस बंपर जीत का असली श्रेय शिवराज सिंह चौहान की लाड़ली बहना योजना को गया, जिसने महिला मतदाताओं को एकतरफा भाजपा के पक्ष में ला खड़ा किया। इस चुनाव ने उत्तर प्रदेश की मुख्य विपक्षी पार्टी समाजवादी पार्टी के अरमानों पर भी पानी फेर दिया। अखिलेश यादव की 24 रैलियों के बावजूद सपा को महज 0.46 प्रतिशत वोट मिले, लेकिन उसने चार सीटों पर कांग्रेस का खेल बिगाड़कर भाजपा की राह आसान कर दी।
इस ऐतिहासिक जीत के बाद भाजपा ने एक ऐसा चौंकाने वाला फैसला लिया, जिसने सबको हैरत में डाल दिया। 18 साल से मुख्यमंत्री रहे शिवराज सिंह चौहान की जगह उज्जैन के मोहन यादव को नया मुख्यमंत्री बनाया गया। ओबीसी समुदाय से आने वाले मोहन यादव को आगे करके भाजपा ने न केवल पीढ़ीगत बदलाव का संदेश दिया, बल्कि 2024 के लोकसभा चुनावों और उत्तर प्रदेश-बिहार के यादव वोट बैंक को भी साधने की बड़ी रणनीतिक चाल चली।
मध्य प्रदेश का यह पूरा सफरनामा दिखाता है कि यहाँ की सियासत में जाति हमेशा से एक साइलेंट किलर रही है। भाजपा ने उमा भारती से लेकर मोहन यादव तक लगातार ओबीसी मुख्यमंत्रियों के जरिए पिछड़े वर्ग को अपने पाले में रखा, जबकि कांग्रेस इस वोट बैंक में सेंध लगाने में नाकाम रही। आज मुख्यमंत्री मोहन यादव के सामने शिवराज सिंह चौहान की विशाल राजनीतिक छाया से बाहर निकलकर अपनी स्वतंत्र पहचान बनाने और लाड़ली बहना जैसी भारी-भरकम योजनाओं के वित्तीय प्रबंधन को संभालने की बड़ी चुनौतियाँ हैं।
आने वाले समय में कांग्रेस अपनी खोई जमीन तलाशने की कोशिश करेगी और भाजपा अपने इस नए चेहरे के साथ वर्चस्व बनाए रखने का दाँव खेलेगी। मध्य प्रदेश की राजनीति का यह उतार-चढ़ाव भरा ड्रामा आगे भी उतना ही दिलचस्प रहेगा, क्योंकि यहाँ की जनता पलक झपकते ही इतिहास बदलना जानती है।