गाँव के नुक्कड़ से लेकर शहर की चाय की दुकान तक, एक सवाल हमेशा ट्रेंड करता है, जैसे चुनाव के समय बड़े-बड़े वादे मुफ्त में ट्रैंड करते हैं- “कहाँ चले नेता जी?” क्योंकि नेता जी तो लुकाछिपी के खेल में व्यस्त हो जाते हैं। जब नेता जी दिख नहीं रहे हों, तब समझ जाइए कि या तो चुनाव बहुत दूर है या फिर जनता बहुत पास आ गई है।
नेता जी का जीवन भी बड़ा रहस्यमयी होता है। वैज्ञानिक आज तक ब्लैक होल का रहस्य नहीं समझ पाए, लेकिन जनता उससे भी बड़ा रहस्य हर दिन झेलती है- “ये नेता जी आखिर चले कहाँ जाते हैं?” क्योंकि सड़क टूटे, नाली फूटे, बिजली रूठे, पानी छूटे.. तब नेता जी ऐसे गायब हो जाते हैं, जैसे मोहल्ले का उधारी वाला लड़का किराने वाले को देखकर हो जाता है।
लेकिन, जैसे ही कहीं फीता काटने का कार्यक्रम हो, मंच पर माला पहनने की संभावना हो, कैमरे चमक रहे हों या माइक में ‘माननीय’ बोलने वाला एंकर खड़ा हो.. नेता जी एकदम से प्रकट हो जाते हैं। फिर चुनाव से पहले नेता जी के भाषणों की तो बात ही निराली होती है। मंच पर चढ़ते ही उनकी आवाज़ में ऐसा आत्मविश्वास जाग उठता है, मानो अगले सोमवार तक देश को देश नहीं, सीधे स्वर्ग बना देंगे।
हर हाथ को काम मिलेगा..
हर खेत में पानी पहुँचेगा..
नदियाँ लहलहा उठेंगी..
इंफ्रास्ट्रक्चर की कहानी नई सड़कों पर लिखी जाएँगी..
नेता जी का भाषण ऐसा होता है कि आदमी शुरुआत में तालियाँ बजाता है, बीच में सोच में पड़ जाता है और अंत तक आते-आते भूल जाता है कि मुद्दा क्या था। और फिर जनता के भी क्या ही कहने.. जनता भी उस समय ऐसे तालियाँ बजाती है, जैसे अगले दिन से सच में जिंदगी बदलने वाली हो। नेता जी के वादों का आकार भी बड़ा दिलचस्प होता है। चुनाव से पहले वे इतने बड़े-बड़े सपने दिखाते हैं कि लगता है, बस वोट डालते ही मोहल्ले की चाँद हुई पड़ी सड़कों पर मेट्रो दौड़ने लगेगी। लेकिन, फिर चुनाव खत्म होता है.. मतदान केंद्रों की भीड़ हट जाती है.. बैलेट बॉक्स और ईवीएम गोदामों में पहुँच जाते हैं.. और नेता जी के वादे भी उन्हीं बक्सों के वजन के नीचे धीरे-धीरे दम तोड़ देते हैं।
जो नेता जी चुनाव से पहले कहते थे- “मैं हर घर जाऊँगा..” वही जीतने के बाद वाहवाहियाँ बटोरने में इतने व्यस्त हो जाते हैं कि जनता को उनसे मिलने के लिए तीन सिफारिशें और चार चक्कर लगाने पड़ते हैं। चुनाव से पहले गड्ढों को देखकर उनका दिल पसीज जाता है। जीतने के बाद वही गड्ढे उन्हें ‘विकास की प्रक्रिया’ लगने लगते हैं।
चुनाव से पहले कहते हैं- “भ्रष्टाचार खत्म करेंगे..” फिर जीतने के बाद जाँच बैठती है.. फाइल घूमती है.. समिति बनती है.. आखिर में भ्रष्टाचार तो नहीं खत्म होता, लेकिन जनता का धैर्य जरूर खत्म हो जाता है।
सबसे मजेदार बात तो यह है कि अगले चुनाव तक वही पुराने वादे नए पोस्टर्स का रूप धारण कर नए नारों के साथ फिर लौट आते हैं। बस इस बार मंच बड़ा हो जाता है और नेता जी का हाथ हिलाकर वादे करने का अंदाज थोड़ा और अनुभवी। वैसे तो देश में गर्मी, बरसात और सर्दी तीन मौसम माने जाते हैं, लेकिन नेता जी के कैलेंडर में सिर्फ दो मौसम होते हैं- वर्तमान चुनाव और अगला चुनाव।
चुनाव आते ही नेता जी का व्यवहार भी बदल जाता है। जिन नेता जी ने किसी मोहल्ले से निकलते समय बीते पाँच वर्षों में कभी गाड़ी का शीशा नीचे नहीं किया, वही अचानक सड़क किनारे खड़े पप्पू चाय वाले से पूछने लगते हैं, “और भाई पप्पू, सब बढ़िया?”, “घर में सब कैसे हैं, किसी भी चीज की जरुरत हो मुझे याद करना..” पप्पू भी मुस्कुरा देता है, क्योंकि उसे पता है कि कुछ ही हफ्तों में नेता जी उसे फिर पहचानने से इन्कार कर देंगे।
नेता जी जनता से मिलते कम हैं, लेकिन फोटो खूब खिंचवाते हैं। किसी दिन गलती से कहीं गड्ढे में उनका पैर पड़ जाए, तो तुरंत चार लोग फोटो लेने पहुँच जाते हैं। अगले दिन अखबार में खबर छपती है- “जनता के दर्द को करीब से समझते नेता जी।” कभी-कभी तो लगता है कि नेता जी का असली काम समस्याएँ सुलझाना नहीं, बल्कि समस्याओं के पास जाकर फोटो खिंचवाना है।
बाढ़ आए, तो नाव में फोटो..
सूखा पड़े, तो खेत में फोटो..
किसी की छत गिरे, तो ईंट उठाते हुए फोटो..
और यदि कुछ न मिले, तो पौधा लगाते हुए फोटो..
नेता जी के पास एक खास कला होती है.. हर सवाल का जवाब बिना जवाब दिए देना। यदि उनसे कोई पूछ ले कि सड़क कब बनेगी, तो वे कहेंगे, “देखिए, सड़क सिर्फ सड़क नहीं होती, यह विकास की धड़कन होती है।” अब सामने वाला बेचारा धड़कन सुनता रह जाता है, सड़क फिर भी नहीं बनती।
नेता जी की याददाश्त भी कमाल की होती है। उन्हें हर वोटर का नाम चुनाव से पहले याद रहता है। “अरे रामू काका.. कैसे हैं?” कल आ रहे हो न वोट देने.. लेकिन, चुनाव जीतने के बाद वही रामू काका यदि सामने दिख जाएँ, तो नेता जी ऐसे देखते हैं जैसे मोबाइल में किसी अननोन नंबर से कॉल आ गया हो।
लेकिन, धीरे-धीरे जनता भी समझदार हो रही है। उसे पता है कि चुनावी मौसम में हाथ जोड़ना, हालचाल पूछना और “आपका बेटा हूँ” कहना राजनीति की पुरानी परंपरा है, क्योंकि चुनाव खत्म होते ही वही बेटा फिर पाँच साल के लिए ‘व्यस्त’ हो जाता है।
लेकिन, फिर भी हर चुनाव में जनता उम्मीद करती है।
शायद इस बार कोई वादा सच हो जाए..
शायद इस बार गड्ढे सच में भर जाएँ..
शायद इस बार भाषणों से ज्यादा काम दिखाई दे..
और नेता जी? वे भी हर बार पूरे आत्मविश्वास के साथ लौट आते हैं। नए पोस्टर, नए नारे और पुराने वादों के साथ। इसलिए अगली बार जब कहीं से आवाज़ आए- “कहाँ चले नेता जी?” तो परेशान मत होइएगा। थोड़ा इंतज़ार कर लीजिए.. चुनाव आते ही नेता जी फिर किसी नुक्कड़, किसी मंच, किसी रैली और किसी पोस्टर से निकलकर आपके सामने खड़े मिल ही जाएँगे।