कैसे झारखंड की राजनीति की धुरी बना सोरेन परिवार

झारखंड की राजनीति में सोरेन परिवार की भूमिका दर्शाती तस्वीर

15 नवंबर, 2000 को भारत के 28वें राज्य के रूप में झारखंड का उदय महज़ एक प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि सदियों पुराने आदिवासी संघर्ष और अस्मिता नई जान मिलने जैसा था। तत्कालीन बिहार के 18 जिलों को काटकर बने इस खनिज समृद्ध राज्य ने अपने अब तक के सफर में कई राजनीतिक उतार-चढ़ाव देखे हैं। बाबूलाल मरांडी, अर्जुन मुंडा से लेकर रघुबर दास तक की सरकारों के बीच, सूबे की सियासत की असली धुरी सोरेन परिवार की विरासत रही है। यह गाथा ‘दिशोम गुरु’ शिबू सोरेन के जमीनी आंदोलन से शुरू होकर उनके पुत्र हेमंत सोरेन की आधुनिक चुनावी रणनीति तक फैली है, जिसने हर चुनाव में सत्ता का रुख तय करने का काम किया है।

झारखंड आंदोलन की नींव वैसे तो 1950 में जयपाल सिंह मुंडा की झारखंड पार्टी ने रखी थी, जिसने 1952 के पहले चुनाव में 32 सीटें जीतकर अपनी ताकत दिखाई थी। लेकिन, इस आंदोलन को असली धार 1970 के दशक में मिली, जब आदिवासी और स्थानीय समुदायों ने अपने अधिकारों के लिए एकजुट होना शुरू किया। फरवरी 1972 में शिबू सोरेन, बिनोद बिहारी महतो और वामपंथी नेता ए.के. रॉय ने मिलकर झारखंड मुक्ति मोर्चा की स्थापना की। महज 28 वर्ष की उम्र में शिबू सोरेन ने महाजनी प्रथा, अवैध खनन और जल-जंगल-जमीन के अधिकारों के लिए जो बिगुल फूँका, उसने उन्हें आदिवासियों का ‘दिशोम गुरु’ यानी देश का शिक्षक बना दिया। सितंबर 1980 का गुआ गोलीकांड इस आंदोलन का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट रहा, जिसने आदिवासियों के भीतर असंतोष को और गहरा किया। अंततः 1997 में राजद सरकार के सहयोग और 2000 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के फैसले से आदिवासियों की दशकों पुरानी अलग राज्य की माँग साकार हो सकी।

राज्य गठन के बाद शिबू सोरेन झारखंड की राजनीति के सबसे बड़े पॉवर सेंटर बनकर उभरे, लेकिन उनका मुख्यमंत्री के रूप में कार्यकाल बेहद अस्थिर और उतार-चढ़ाव से भरा रहा। वेतीन बार राज्य के मुख्यमंत्री बने, पर कभी भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सके। मार्च 2005 में वह पहली बार मुख्यमंत्री बने, लेकिन बहुमत साबित न कर पाने के कारण यह सरकार महज नौ दिन ही चल पाई। इसके बाद अगस्त 2008 में उन्होंने दूसरी बार कमान संभाली, पर छह महीने के भीतर विधायक बनने की अनिवार्यता के बीच जनवरी 2009 में वह तमाड़ उपचुनाव हार गए और उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। दिसंबर 2009 में वह तीसरी बार मुख्यमंत्री बने, लेकिन जून 2010 में भाजपा द्वारा समर्थन वापस लेने से उनकी सरकार एक बार फिर गिर गई। नरसिम्हा राव सरकार के वक्त का 1993 का ‘रिश्वत कांड’ और शशिनाथ झा हत्याकांड जैसे विवादों के बावजूद, जिसमें अंततः 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें बरी किया, शिबू सोरेन की आदिवासी जनमानस पर पकड़ कभी कमजोर नहीं हुई और वह हमेशा एक लोकनायक बने रहे।

शिबू सोरेन के सक्रिय राजनीति से दूर होने के बाद जेएमएम की कमान हेमंत सोरेन के हाथ आई, जिन्होंने पार्टी को आधुनिक चुनावी सांचे में ढाला। साल 2013 में हेमंत सोरेन राज्य के सबसे युवा मुख्यमंत्री बने और उनका यह कार्यकाल 2014 तक चला। इसके बाद 2014 के चुनावों में भाजपा की बड़ी जीत हुई और रघुवर दास के रूप में राज्य को पहला गैर-आदिवासी मुख्यमंत्री मिला। हालाँकि, इस पाँच साल के कार्यकाल के दौरान स्थानीय आदिवासी समुदाय में असंतोष बढ़ता गया, जिसका सीधा फायदा हेमंत सोरेन ने 2019 के चुनावों में उठाया। साल 2019 के विधानसभा चुनाव में जेएमएम, कांग्रेस और राजद के महागठबंधन ने 81 में से 47 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत हासिल किया, जिसमें जेएमएम ने अकेले 30 सीटें जीतीं और हेमंत सोरेन ने दूसरी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली।

31 जनवरी, 2024 को झारखंड की राजनीति में तब बड़ा भूचाल आया, जब ईडी ने भूमि घोटाले के एक मामले में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को गिरफ्तार कर लिया। रणनीतिक दृष्टिकोण से यह जेएमएम के लिए एक बड़ी परीक्षा थी, लेकिन पार्टी ने इस संकट को एक अवसर में बदल दिया और गिरफ्तारी को सीधे आदिवासी अपमान और अस्मिता से जोड़कर सहानुभूति की एक बड़ी लहर पैदा कर दी। जून 2024 में जेल से रिहा होने के बाद हेमंत सोरेन ने तुरंत कमान संभाली और खुद को मिट्टी के लाल के रूप में पेश करते हुए आक्रामक चुनाव अभियान शुरू किया। 

इसके परिणामस्वरूप, नवंबर 2024 के विधानसभा चुनाव में इंडिया गठबंधन ने 81 में से 56 सीटों पर ऐतिहासिक जीत दर्ज की, जो राज्य के इतिहास का सबसे बड़ा आँकड़ा था। इस चुनाव में जेएमएम ने अपने इतिहास का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करते हुए 34 सीटें जीतीं, जबकि भाजपा महज 21 सीटों पर सिमट गई। इस बड़ी जीत के पीछे हेमंत सोरेन की मईया सम्मान योजना का महिलाओं पर प्रभाव और भाजपा के बाहरी नेताओं पर अत्यधिक निर्भरता के मुकाबले स्थानीय नैरेटिव का मजबूत होना सबसे प्रमुख रणनीतिक कारण रहा।

अप्रैल 2025 में जेएमएम के 13वें केंद्रीय सम्मेलन में एक ऐतिहासिक सांगठनिक बदलाव हुआ, जब 38 वर्षों तक पार्टी के अध्यक्ष रहे शिबू सोरेन ने अपने बेटे हेमंत सोरेन को आधिकारिक रूप से नया अध्यक्ष नियुक्त किया और स्वयं संस्थापक-संरक्षक की भूमिका में आ गए। इसके कुछ ही समय बाद, अगस्त 2025 में शिबू सोरेन के निधन के साथ ही झारखंड की राजनीति के एक वैचारिक और संघर्षपूर्ण युग का अंत हो गया। पिता की विरासत को आगे बढ़ाते हुए हेमंत सोरेन ने अब शासन व्यवस्था और जनकल्याण पर अपना ध्यान केंद्रित किया है, जिसकी झलक वर्ष 2026 के बजट में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। इस बजट में सरकार ने महिला सशक्तिकरण के लिए 34,211 करोड़ रुपए का जेंडर बजट और बच्चों के लिए 10,793 करोड़ रुपए का चाइल्ड बजट पेश कर अपनी प्राथमिकताओं को स्पष्ट किया है, जिसे विपक्ष भले ही दिशाहीन बता रहा हो, लेकिन यह सरकार की चुनावी जमीन को मजबूत करता है।

वर्तमान में हेमंत सोरेन के सामने जहाँ एक ओर राज्य में विकास को गति देने, कानून-व्यवस्था सुधारने और भ्रष्टाचार के आरोपों से मुक्त पारदर्शी सरकार चलाने की प्रशासनिक चनौतियाँ हैं, वहीं दूसरी ओर जेएमएम को एक क्षेत्रीय आंदोलन से बाहर निकालकर राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करने की बड़ी राजनीतिक जिम्मेदारी भी है।

कुल मिलाकर देखें तो झारखंड की राजनीति आज भी आदिवासी अस्मिता, स्थानीय पहचान और लोक-कल्याणकारी योजनाओं के इर्द-गिर्द ही घूम रही है। शिबू सोरेन ने संघर्ष के जरिए जिस वैचारिक जमीन को तैयार किया था, हेमंत सोरेन ने अपनी रणनीतिक कुशलता से उसे चुनावी सफलता के शिखर पर पहुँचाया है। यह लंबी यात्रा दर्शाती है कि झारखंड की जनता अपने अधिकारों और जल-जंगल-जमीन की लड़ाई से कभी पीछे नहीं हटती और जो नेता इस बुनियादी नब्ज को पकड़कर रखेगा, सत्ता की चाबी उसी के पास रहेगी।

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