सिर्फ पैसे वाले लोग ही दान कर सकते हैं, यह जरुरी तो नहीं..

Only people with money can donate, it is not necessary..

वेद, उपनिषद, पुराण और स्मृति, दान के महत्व पर विशेष तौर पर ज़ोर देते हैं। अथर्ववेद सौ हाथों से बटोरने और हजार हाथों से देने का आह्वान करता है। पहले के समय में, दान की अवधारणा को जीवन पर्यन्त ज़रूरतमंदों के काम आने के रूप में देखा जाता था। हालाँकि, दान की वास्तविक परिभाषा और महत्व को लेकर लोगों में कुछ भ्रम दिखता है। वास्तव में दान का अर्थ क्या है, इसे अनदेखा करते हुए, बहुत से लोग सिर्फ पैसा खर्च करने को ही दान समझते हैं। यह समझना महत्वपूर्ण है कि दान का मतलब किसी व्यक्ति पर पैसा खर्च करने तक ही सीमित नहीं है।

यहाँ मुझे एक सटीक उदाहरण याद आता है, शायद आप इससे मेरा कथन समझ पाएँ.. एक दिन मैं बस में बैठकर शहर में एक स्थान से दूसरे स्थान पर जा रहा था, बस खचाखच भरी हुई थी। एक बूढ़ी महिला ने एक सीट रोक कर रखी हुई थी, जैसे ही कोई अन्य महिला बस में चढ़ती, वह उसे अपनी सीट बैठने के लिए दे देती, और खुद खड़ी रहती। बैठी हुई महिला का जैसे ही स्टॉप आता, सीट फिर खाली हो जाती, और वह किसी अन्य महिला को बैठने के लिए सीट दे देती। यह सिलसिला काफी देर तक चलता रहा। मैं आखिरी सीट पर बैठा काफी देर तक यह देखता रहा, लेकिन समझ नहीं पाया कि जिस कुर्सी के लिए दुनिया में इतना बवाल है, यह बूढ़ी महिला कैसे एक के बाद एक कई महिलाओं को अपनी सीट दिए जा रही है, जबकि खुद से ठीक से खड़े रहते भी नहीं बन रहा है।

मेरा स्टॉप आने से दो स्टॉप पहले मुझसे रहा नहीं गया और मैं उससे पूछ बैठा कि अम्मा यह तुम क्या करती हो? अपनी सीट किसी और को बार-बार क्यों दे देती हो? उसने जो जवाब दिया, उससे उस दिन मेरी आँखों के पर्दे खुल गए। वह कहती है, भैया! लोग दान करके खूब पुण्य कमाते हैं, सभी के मन में यह सवाल होता है कि बैकुंठ जाएँगे, तो दान का क्या हिसाब देंगे? मैं बहुत गरीब हूँ, मेरे पास इतने पैसे नहीं कि हर दिन दान-धर्म करूँ, लेकिन फिर भी करना तो चाहती हूँ। मैं जिस घर में सफाई का काम करने जाती हूँ, वह बहुत दूर है।

बस से रास्ता तय करने के बीच अपनी सीट जरूरतमंदों को दिए देती हूँ, कुछ देर के लिए राहत पाकर जब वे बैठती होंगी, तो उनका मन मुझे कितनी दुआएँ देता होगा। दान का असली अर्थ पुण्य कमाना ही तो है, जो मैं हर दिन कमा लेती हूँ।

उस दिन मैंने सच्चे दान का अर्थ जाना कि आपके पास जो कुछ भी है, निःस्वार्थ भाव से उसे दे देना ही दान है, फिर भले ही इसमें पैसों का योगदान शामिल नहीं हो। इसमें आपका समय, ऊर्जा, कौशल, संसाधन या भावनात्मक समर्थन देना शामिल हो सकता है, जिन्हें इसकी आवश्यकता है। पैसों से परे दान के कई रूप हो सकते हैं, जैसे किसी की सेवा करना, किसी पुस्तकालय या किसी जरूरतमंद बच्चे को किताबें दान करना, ज्ञान साझा करना, मदद के लिए हाथ बढ़ाना या फिर भौतिक वस्तुओं का दान करना, जो दूसरों के लिए फायदेमंद हो सकते हैं।

सामुदायिक केंद्रों, अस्पतालों, पशु आश्रयों या पर्यावरण संगठनों के लिए अपना समय और योगदान देना भी तो सेवा ही है। और सेवा, दान का ही तो रूप है। आप ट्यूटरिंग या मेंटरिंग सेवाओं की पेशकश करके, कक्षा में निःशुल्क पढ़कर या किसी स्किल को किसी और को सिखाकर भी दान कर सकते हैं। फिर यहाँ हमें रक्तदान को भी नहीं भूलना चाहिए। किसी का जीवन बचाने से बड़ा पुण्य और क्या हो सकता है। हर तीन महीने में रक्तदान करके भी आप जरूरतमंद लोगों की मदद कर सकते हैं।

दया और सहानुभूति एक सार्थक जीवन की नींव हैं। करुणा भाव से लोगों की सेवा न सिर्फ करने वाले, बल्कि इसे प्राप्त करने वाले व्यक्ति पर भी दूरगामी प्रभाव डाल सकते हैं। दान चाहे मौद्रिक हो या भौतिक, दयालुता की दृष्टि से किए गए दान से हम उन लोगों को तृप्त कर सकते हैं, जिन्हें इसकी सबसे अधिक आवश्यकता है। इसलिए आज के समय में लोगों को दान की समग्र समझ से अवगत कराना बहुत जरुरी है। फिर हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए, जो बड़े-बुज़ुर्ग कह गए हैं कि दान करो एक हाथ से, तो दूसरे को भी पता मत चलने दो। जताकर किए गए दान का कभी फल प्राप्त नहीं होता, इसलिए दान हमेशा ऐसा करें, जिसके बारे में सिर्फ ईश्वर को पता हो, तो बैकुंठ जाकर हिसाब नहीं देना पड़ेगा..

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