आजकल एक शब्द बड़ा प्रचलित हो चला है, जो आपने भी अक्सर सुना होगा, नेपोटिज़्म या हिंदी में कहें तो भाई-भतीजावाद। आज हर क्षेत्र और स्तर पर आपको इसका असर देखने को मिल जाएगा। लेकिन, इस आरोप से सबसे ज्यादा राजनीति बदनाम है। हालाँकि, ज्यादा दूर न जाएँ; यदि आप अपने आस-पास ही देखें, तो आपको इसके उदाहरण बड़ी आसानी...
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अब वो बात कहाँ..
एक रोज़ मेरा किसी काम से बाहर जाना हुआ, घर लौटते हुए शाम हो गई। मैं घर लौट ही रहा था कि दूर किसी चाय की दुकान पर एक पुराना गाना सुनाई दिया। गाने के बोल मेरे कानों में पड़े, तो एक पल के लिए मैं जवानी के उस समय में पहुँच गया, जब मैं गाने सुनने का बड़ा शौकीन...
Continue reading...सच्चे रिश्तेदार
शादियों का मौसम शुरू हो चुका है, और हर रोज लाखों की तादाद में शादियाँ हो रही हैं। आप लोग भी रिश्तेदारों और परिचितों की शादियों में मेहमान नवाजी का लुफ्त उठा ही रहे होंगे। आजकल की शादियों में 500-700 मेहमान बुलाना तो आम बात है। कहीं-कहीं तो यह संख्या हजारों में भी देखने को मिल जाती है। ज्यादा से...
Continue reading...पक्के मकान.. कच्चे दिल..
गर्मियों की रातों में छत पर बिछी चारपाइयाँ, खुले आसमान के नीचे सोते हुए तारों को गिनने का खेल, दादी-नानी की कहानियाँ और मिट्टी की सौंधी-सी महक.. क्या आपको याद हैं वो दिन? वो दिन.. जब मकान कच्चे होते थे, लेकिन दिल पक्के। रिश्तों में अपनापन था, मोहल्ले भर में हर किसी को अपना माना जाता था, और जीवन में...
Continue reading...गाँव की बेरंग तस्वीर में रंग भरने का काम आज भी अधूरा
हर किसी के जीवन में एक गाँव होता है, कभी जन्मभूमि के रूप में, तो कभी नानी के घर के रूप में.. माध्यम कई हो सकते हैं, लेकिन हर किसी का जीवन किसी न किसी बहाने गाँव से जुड़ा जरूर होता है.. वह दुनिया, जहाँ दिल हर बार लौट जाना चाहता है। मेरे लिए गाँव सिर्फ एक जगह नहीं, बल्कि...
Continue reading...देश से गरीबी का नाम-ओ-निशान ही गायब
सूरज अपनी हल्की किरणें बिखेर रहा था और मैं बालकनी में बैठकर अखबार के पन्ने पलट रहा था। एक हेडलाइन पर नज़र ठिठक गई: “भारत अब गरीबी मुक्त देश बन चुका है!” मेरी आँखें चमक उठीं। क्या यह सच में संभव हो गया? क्या अब कोई भी सड़क किनारे भूखा नहीं सोता? क्या अब किसी भी माँ को अपने बच्चे...
Continue reading...समाज और राजनीति
भीड़ में खामोशी.. हलचल भरी और खचाखच भीड़ वाली सड़कों पर जहाँ शहरी जीवन की दैनिक लय लोगों के जमावड़े के साथ पूरी होती है, वहाँ इस भीड़ के भारी शोर के बीचों-बीच कुछ लोग चुपचाप सादगी से चंद रुपए कमाने की आस में खुद से ही एक खामोश जंग लड़ रहे होते हैं। उनके जीवन का यह पिन ड्रॉप...
Continue reading...लिफाफे का नया चलन….
हम भारतीयों के जीवन में लिफाफे का महत्व किसी मूल्यवान वस्तु से कम नहीं है। शादी हो, सालगिरह हो, बच्चे का जन्म हो, या फिर कोई और खास मौका, शगुन का लिफाफा हर जगह अपनी उपस्थिति दर्ज कराता है। लेकिन ज़रा सोचिए, क्या हो यदि यह परंपरा सिर्फ खुशी के मौकों तक सीमित न रहे, बल्कि जीवन के कठिन समय...
Continue reading...आधुनिकता की दौड़ में खोता अपनापन……
भारत हमेशा से ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ के सिद्धांत पर विश्वास करने वाला देश रहा है। एक समय भारत ऐसा देश था, जहाँ संयुक्त परिवार जीवन का अभिन्न हिस्सा हुआ करते थे। यह वही देश है, जहाँ तीन-चार पीढ़ियाँ एक ही छत के नीचे रहा करती थीं। हर उम्र के लोग एक-दूसरे के साथ हँसी-खुशी के पलों को साझा किया करते थे।...
Continue reading...मंदिरों में बढ़ती भीड़: आस्था या दिखावा?
कई सालों पहले जब हम मंदिर जाया करते थे, तो वहाँ का दृश्य अलग ही हुआ करता था। शांतिपूर्ण माहौल, घंटियों की मधुर ध्वनि और श्रद्धालुओं की आँखों में भक्ति की चमक। लोग भगवान के दर्शन के लिए आते थे, उनकी आराधना करते थे और मन की शांति पाते थे। लेकिन, आजकल का नजारा कुछ बदला हुआ-सा दिखाई देता है।...
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