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शिक्षा प्रणाली में परिवर्तन केवल एक सैद्धांतिक प्रस्ताव नहीं, बल्कि एक व्यावहारिक आवश्यकता है

कक्षा में रचनात्मक गतिविधियों के माध्यम से सीखते छात्र, व्यावहारिक और छात्र-केंद्रित शिक्षा का प्रतीक

दुनिया की शिक्षा प्रणाली लगातार बदल रही है, ऐसे में पढ़ाने के तरीके और पाठ्यक्रम में बड़ा बदलाव लाना बहुत जरूरी हो गया है। रटने और सख्त नियमों में ऐसे बदलाव किए जाने चाहिए, जहाँ छात्रों को केंद्र में रखते हुए, उनकी रचनात्मकता, सोचने की क्षमता और जिंदगी भर सीखने की ललक को जगाया जाए। और यह तो सच ही...

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अच्छी लाइफ सेट करने में कौन-सा सिलेबस बड़ा: स्कूल का या फिर जिंदगी का?

परीक्षा के दबाव में बैठा छात्र और जीवन की चुनौतियों पर सोचता युवा, स्कूल और ज़िंदगी के सिलेबस का अंतर दर्शाता दृश्य

आपको 3 इडियट्स का यह गाना तो याद ही होगा “गिव मी सम सनशाइन गिव मी सम रेन गिव मी अनदर चांस आई वॉना ग्रो उप वन्स अगेन” “99 परसेंट मार्क्स लाओगे, तो घड़ी वरना छड़ी” अक्सर आपने यह भी सुना होगा कि 10वीं कक्षा अच्छे अंकों से पास कर लो, फिर लाइफ सेट हो जाएगी। या 12वीं कक्षा अच्छे...

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किताबी ज्ञान तक ही सीमित न हों शिक्षा के मायने

किताबी पढ़ाई में उलझे बच्चे और जीवन कौशल से दूर होती शिक्षा व्यवस्था का प्रतीकात्मक दृश्य

क्या असल जिंदगी के दोहे सिखा सकेगा किताबी ज्ञान? शिक्षा कैसी होना चाहिए? आखिर शिक्षा के मायने क्या होने चाहिए? क्या रट-रट कर हासिल किए गए श्रेष्ठ अंक ले आना बेहतर शिक्षा कहला सकती है? किताबी कीड़ा बनकर एक बेहतर शिक्षार्थी बना जा सकता है? क्या आप भी यही सोचते हैं कि शिक्षा महज़ किताबी ज्ञान हो? सिर्फ चंद किताबें...

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मुद्दा नजरिए का है, गलत वो भी नहीं, गलत हम भी नहीं..

छह और नौ के उदाहरण से अलग-अलग नज़रियों को समझाता दृश्य, सहानुभूति और संवाद का प्रतीक

“यह छह है, अरे नहीं, नहीं यह नौ है.. अरे भई! साफ दिखाई दे रहा है यह छह है.. नहीं, यह नौ है, तुम मेरी जगह पर आकर देखो..” इस दुनिया में रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति के पास अपना मस्तिष्क है, तो स्वाभाविक-सी बात है कि हर एक व्यक्ति एक अलग सोच और स्वतंत्र विचार भी रखता है। इस बात...

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शैक्षणिक संस्थानों में काउंसलर्स और साइकॉलजिस्ट्स की जरुरत समय की माँग

स्कूल काउंसलर छात्र से संवाद करते हुए, मानसिक स्वास्थ्य और मार्गदर्शन का प्रतीकात्मक दृश्य

शिक्षा निरंतर रूप से चलने वाली यात्रा है, मंजिल नहीं। कारण कि जीवन में शिक्षा और ज्ञान जितना भी अर्जित किया जाए, इसका पिटारा कभी नहीं भरता। यह सतत रूप से चलने वाली प्रक्रिया है, जो इंसान को कक्षाओं और पाठ्यपुस्तकों की सीमा से परे वृद्धि और विकास की सुगम राह पर ले जाती है। जैसे-जैसे छात्र इस यात्रा में...

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स्कूलों की रटंत शिक्षा नहीं, सीखने वाली शिक्षा है जीवन के लिए जरूरी

कक्षा में प्रैक्टिकल गतिविधियों के माध्यम से सीखते छात्र, रटंत शिक्षा से आगे बढ़ती शिक्षा प्रणाली

सिर्फ एक डिग्री नहीं, बल्कि रोजगार की ओर पहल का माध्यम भी हो शिक्षा जब बात आती है एक निहित शिक्षा प्रणाली की, मेरा ख्याल है कि इससे अधिकांश लोग प्रभावित होते हैं। कठिन पाठ्यक्रम संरचना से लेकर मैरिट स्कोरिंग प्रणाली तक, सब कुछ बहुत पुराना है। कुछ देशों को छोड़कर दुनिया भर में कहानी एक-सी है। मौजूदा शिक्षा प्रणाली...

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शिक्षक को समय-समय पर स्वयं को अपडेट करना क्यों है जरूरी?

कक्षा में छात्रों का मार्गदर्शन करता शिक्षक, आधुनिक शिक्षण और नैतिक शिक्षा का प्रतीक

शिक्षक कौन होता है? जो आपको अच्छी शिक्षा देता है, है न! सिर्फ ज्ञानी होना शिक्षक होना तो नहीं कहला सकता और फिर शिक्षकों का तो कर्तव्य ही होता है कि वे अपने छात्रों में उच्च नैतिकता और मजबूत चरित्र का विकास करें। यदि शिक्षक ऐसा करने में विफल रहते हैं, तो इसका मतलब है कि वे अपनी सामाजिक और...

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अंग्रेजी का बढ़ता प्रचलन, दूर कर रहा हमें मातृभाषा से

अंग्रेजी और हिंदी के बीच उलझा छात्र, मातृभाषा और शिक्षा व्यवस्था के संघर्ष को दर्शाता दृश्य

क्या मातृभाषा को अनदेखा करना सही है? बात शुरू करता हूँ अंग्रेजी के बढ़ते प्रचलन से। आज सभी अंग्रेजी के पीछे भाग रहे हैं। हमारे देश में अंग्रेजी का प्रचलन बढ़ता ही जा रहा है। आजकल शिक्षा व्यवस्था खासतौर पर अंग्रेजी विद्यालयों में हिंदी का कोई विशेष महत्व नहीं है। तो क्षेत्रीय भाषा की बात ही कौन करे? इसकी वजह...

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कहाँ गई वो जादू की पाठशाला?

प्रकृति की गोद में सीखते बच्चे, जो नई तालीम और जादू की पाठशाला की अवधारणा दर्शाते हैं

एक बच्चे के रूप में मेरा स्कूल बहुत अलग था। आज के बच्चे ऐसी शिक्षा और ऐसे बचपन से कोसों दूर हैं। चीज़ें पहचान से परे हो गई हैं। बूढ़े लोग अक्सर अतीत के बारे में बातें करते हैं। हमारे समय में ऐसा था वैसा था और न जाने क्या-क्या? लेकिन वे सही कहते हैं। आप पूछ सकते हैं कि...

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जो करना है आज ही करो, क्योंकि किसे पता कल हो न हो

सूर्योदय के समय खड़ा व्यक्ति जो जीवन की अनिश्चितता और आज में जीने का संदेश दर्शाता है

“पूरा दिन पड़ा है, शाम को करता हूँ”, “इतना भी क्या जरुरी है, बाद में हो जाएगा”, “जल्दी किस बात की है, अभी नहीं तो बाद में हो ही जाएगा”, कई बार यह बाद, बाद ही रह जाता है, क्योंकि आजकल समय का कोई भरोसा नहीं है। हम सभी अपने सपनों को पूरा करने की तलाश में होते हैं, लेकिन...

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