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किताबी ज्ञान के साथ-साथ

व्यावहारिक ज्ञान का प्रतीक, बैंक का फॉर्म भरने में बुजुर्ग महिला की मदद करता भारतीय स्कूली छात्र

व्यावहारिक ज्ञान भी जरुरी.. एक व्यक्ति को तब तक सफल नहीं माना जा सकता, जब तक वह पढ़ाई लिखाई के साथ-साथ दुनियादारी की समझ न रखे एक बार किसी काम से मेरा बैंक जाना हुआ, बैंक में भीड़ ज्यादा होने के कारण लम्बी लाइन लगी हुई थी। मैं भी लाइन में लगकर अपनी बारी का इंतजार करने लगा, तभी मेरी...

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गुरु कुम्हार और शिष्य घड़ा

गुरु-शिष्य परंपरा को दर्शाता ग्रामीण छात्रों को मार्गदर्शन करता भारतीय शिक्षक

गुरु कुम्हार शिष कुंभ है, गढ़ि-गढ़ि काढ़ै खोट। अन्तर हाथ सहार दै, बाहर बाहै चोट॥ कबीर के इस दोहे का अर्थ नई पीढ़ियाँ शायद ही जानती हों। गुरु और शिष्य के उदाहरण को हम इस दोहे से बखूबी समझ सकते हैं। जिस प्रकार कुम्हार भीतर से हाथ का सहारा देकर, बाहर से चोट मारकर मटके तथा बर्तनों को गढ़ता है,...

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खोखला बीज भला क्या काम का?

भारत की खोखली शिक्षा व्यवस्था को दर्शाता कक्षा में बैठा भारतीय बच्चा

इंसान की आधारभूत जरूरतों में से पहली जरूरत रोटी होती है, जिसके लिए किसान दिन-रात मेहनत करके फसल उगाता है, लेकिन सिर्फ मेहनत कर देने से अच्छी फसल नहीं उग जाती, इसके लिए जरूरत होती है गुणवत्ता वाले बीज की, क्योंकि जब बीज अच्छा होगा, तभी अच्छी फसल होगी और तब सही मायने में किसान की मेहनत रंग लाएगी। किसी...

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शिक्षा व्यवस्थाओं के किए-कराए

भारत की परीक्षा-आधारित शिक्षा व्यवस्था से परेशान छात्र और कोचिंग केंद्रों की भीड़

पर पानी फेरने का काम कर रहीं परीक्षाएँ भारत में शिक्षा व्यवस्था को लेकर हमेशा से उठते पेंचीदे सवाल शायद ही कभी खत्म हो सकेंगे। निरंतर आगे बढ़ते देश में शिक्षा का स्तर ऊपर जा रहा है या नीचे? क्या वास्तव में हमारे देश की शिक्षा व्यवस्थाएँ छात्रों के भविष्य को समृद्ध बनाने के काबिल हैं? ऐसे तमाम सवालों का...

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“ओल्ड इज़ गोल्ड” कहावत एकदम खरी

मोबाइल में उलझे बच्चे और पीछे संस्कार सिखाती दादी

आज के समय में देखा जाए तो संस्कार और शिक्षा दोनों ही बदल चुके हैं। प्राचीन समय में लोग अपने बच्चों को गुरुकुल में शिक्षा ग्रहण करने के लिए भेजा करते थे, जहाँ वे शिक्षा के साथ-साथ सामाजिक और धार्मिक ज्ञान भी अर्जित करते थे। फिर धीरे-धीरे समय बदला और अंग्रेजी सभ्यता ने भारतीय संस्कृति और परम्पराओं को जकड़ लिया।...

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एक निवाले की कीमत……

फुटपाथ पर बैठे दो भूखे भारतीय बच्चे भोजन की प्रतीक्षा करते हुए

बर्गर खाने की इच्छा हुई.. पास के मैक डोनाल्ड पर पहुँच जाओ। चाट खाने का मन हुआ.. चाट का ठेला बिल्कुल सड़क के किनारे ही है। घर के खाने से ऊब गए.. फटाफट तैयार हुए और बाहर किसी बढ़िया से होटल में खाना खा आए। हम लोगों के लिए, खाना एक रोजमर्रा का आनंद है, हमारी उँगलियों पर एक से...

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एक निवाले की कीमत……

फुटपाथ पर बैठे दो भूखे भारतीय बच्चे भोजन की प्रतीक्षा करते हुए

बर्गर खाने की इच्छा हुई.. पास के मैक डोनाल्ड पर पहुँच जाओ। चाट खाने का मन हुआ.. चाट का ठेला बिल्कुल सड़क के किनारे ही है। घर के खाने से ऊब गए.. फटाफट तैयार हुए और बाहर किसी बढ़िया से होटल में खाना खा आए। हम लोगों के लिए, खाना एक रोजमर्रा का आनंद है, हमारी उँगलियों पर एक से...

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नहीं दरिद्र सम दुःख जग माहीं

भूखे भारतीय बच्चे फुटपाथ पर बैठे भोजन की प्रतीक्षा करते हुए

तुलसीदास जी द्वारा रचित रामचरित मानस की यह चौपाई आज के समय को देखते हुए बिल्कुल सटीक बैठती है, जहाँ गरीबी से बड़ा कोई दुःख ही नहीं है। आज अमीर और अमीर होता जा रहा, जबकि गरीब और गरीब होता जा रहा है। पहले के समय में लोग कहते थे, दाल-रोटी खाओ, प्रभु के गुण गाओ। लेकिन आज के समय...

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जानवरों के लिए भोजन निकालने की

भारतीय घर के बाहर गाय और कुत्ते को रोटी देते लोग, विलुप्त होती परंपरा का दृश्य

प्रथा भी अब विलुप्ति की कगार पर भारत की संस्कृति बहुत विराट है। यह हर उस जीव के बारे में सोचती है, जो पृथ्वी पर रहता है। संस्कृति हमारे बारे में ही सोचती है, अफसोस हम संस्कृति के बारे में कभी नहीं सोच सके और शायद कभी सोच भी नहीं सकेंगे। सबसे बड़ी सीखों में से एक हमारी संस्कृति ने...

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क्या हम ‘अतिथि देवो भवः’ और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का असली अर्थ जान पाए हैं?

भारतीय घर के बाहर भूखे जानवर और पक्षी, जिन्हें भोजन दिया जा रहा है

क्या ‘अतिथि देवो भवः’ वाक्यांश में इंसानों की ही बात कही गई है, जानवरों की नहीं? समय के पहिए के घूमने के साथ संस्कृति और परम्पराओं में कई बदलाव देखने को मिले हैं। पहले के समय में घर के दरवाज़े पर कोई याचक आया करता था, तो उसे कभी-भी खाली हाथ नहीं लौटाया जाता था। अतिथि आया करता था, तो...

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