छोटे राज्यों के गठन में कैसी बुराई?

What is the harm in forming small states?

स्वतंत्रता से पूर्व भारत 17 प्रांतों और 584 रियासतों में बंटा हुआ था। इसके पश्चात् स्वतंत्रता के समय 15 अगस्त 1947 को भारत में 12 राज्य थे। 26 जनवरी 1950 को जब भारत एक संप्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य बना, तब तक हैदराबाद, जम्मू और कश्मीर, सिक्किम, मणिपुर और त्रिपुरा जैसे राज्य भी भारतीय संघ का हिस्सा बन चुके थे। फिलहाल भारत 28 राज्यों और 8 केंद्र शाषित राज्यों का एक संघ है। यह इतिहास और वर्तमान बताने के पीछे सिर्फ एक सवाल है कि क्या भारत के सर्वांगीण विकास के लिए अन्य जरुरी राज्यों का गठन नहीं किया जा सकता?

हालाँकि, यह प्रश्न नया नहीं है। हमने देखा है कि जब माँग उठी है और जरुरत लगी है, तो मध्य प्रदेश से छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश से उत्तराखंड, बिहार से झारखंड जैसे राज्यों को अलग कर दिया गया है। मैं समझता हूँ कि छोटे राज्यों का गठन, कुछ बेहतरीन फैसलों में से एक है, जिस पर गंभीरता से विचार करने और कदम उठाने की जरुरत है। यह सुरक्षा और प्रशासनिक, दोनों ही दृष्टि से एक उत्तम विचार साबित हो सकता है। हालाँकि, त्रिपुरा जैसे राज्य जो पहले से ही छोटे हैं, या पंजाब जैसे राज्य जिसे भारत की रोटी की टोकरी कहा जाता है, के विभाजन की बातें बेमतलब ही मालूम पड़ती हैं। लेकिन पिछड़ेपन का पर्याय बन चुके और यूपी व एमपी के बीच पिसने को मजबूर, बुंदेलखंड जैसे क्षेत्रों को पृथक करने में कोई गुरेज नज़र नहीं आता। इसी प्रकार क्षेत्रफल की दृष्टि से देश के सबसे बड़े राज्यों को विधिवत छोटे राज्यों में तब्दील किया जा सकता है।

क्षेत्रफल के हिसाब से भारत में राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, कर्णाटक, उड़ीसा या बंगाल जैसे बहुत से बड़े राज्य हैं, जिन्हें फिलहाल जिस कुशलता के साथ संचालित किया जा रहा है, उसे एक या दो भागों में विभाजित कर के, प्रशासनिक स्तर पर अधिक कुशलता के साथ संचालित और विकसित क्षेत्रों में तब्दील किया जा सकता है। टाइम्स ऑफ इंडिया अखबार के एक लेख में मैंने पढ़ा कि यूपी यदि एक देश होता, तो जनसंख्या के हिसाब से विश्व का चौथा सबसे बड़ा मुल्क होता।

आप इसी बात से अंदाजा लगा सकते हैं कि जनसंख्या या क्षेत्रफल के हिसाब से देश के ऐसे सघन राज्यों की आबादी को या अंतिम व्यक्ति तक सरकारी या प्रशासनिक सुविधा कैसे पहुँचाई जाती होगी। सरकारी सुविधा या प्रशासनिक सेवाएँ मिलती भी होंगी या हैं कि नहीं, यह भी एक अध्यन का विषय हो सकता है।

हमारे सामने इस बात के भी पर्याप्त प्रमाण है कि छोटे राज्य, लगभग हर क्षेत्र में बेहतर व अच्छा प्रदर्शन करने में सफल हुए हैं। सरकारी आँकड़ें बताते हैं कि तत्कालीन नवनिर्मित राज्य उत्तराखंड और छत्तीसगढ़ अपने मूल राज्यों यानी यूपी और मध्य प्रदेश की तुलना में आर्थिक रूप से 2004-05 से 2008-09 के बीच तेजी से बढ़े। यह क्षेत्रफल के हिसाब से सम्बंधित संसाधनों के बेहतर विकेंद्रीकरण के कारण संभव हो सका था। मैं मानता हूँ कि हमें संवैधानिक रूप से लोकतान्त्रिक विकेन्द्रीकरण पर भी विचार करना चाहिए। यह एक सामान्य नागरिक को सत्ता में भागीदारी का अवसर भी देगा और हर एक नागरिक की आवश्यकता के अनुरूप, कार्यप्रणाली विकसित करने में सहायक सिद्ध होगा, बशर्ते राजनीतिक दलों के निजी लाभ को किनारे रखकर, सिर्फ देश के सार्वभौमिक विकास को केंद्र में रखा जाए।

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