जून 1975 में जब इंदिरा गांधी ने आपातकाल लागू किया, तो उन्होंने अनजाने में भारतीय लोकतंत्र की उस नई नींव की आधारशिला रख दी थी, जिसे आने वाले पाँच दशकों की राजनीति को परिभाषित करना था। 1977 का चुनाव महज एक मतदान नहीं, बल्कि नागरिक अधिकारों की बहाली का जनादेश था, जिसने मोरारजी देसाई के रूप में देश को पहला...
Continue reading...भारतीय राजनीति
घुमंतू समाज को मुख्यधारा में जोड़ने के लिए जरुरी केंद्र व राज्य सरकारों की इच्छाशक्ति
भारत की सांस्कृतिक विविधता में घुमंतू समाज एक अनमोल रत्न की तरह है, जो अपनी अनूठी जीवनशैली और परंपराओं के साथ देश की सामाजिक-आर्थिक संरचना का अभिन्न हिस्सा रहा है। लेकिन, आश्चर्यजनक रूप से यह समाज, दशकों से अपनी खानाबदोश प्रकृति के कारण मुख्यधारा से कटा हुआ है और आज भी मूलभूत सुविधाओं व अधिकारों से वंचित है। शिक्षा, स्वास्थ्य,...
Continue reading...सरकारें घुमंतू समाज को ओबीसी का दर्जा देकर करें मुख्यधारा में जोड़ने की पहल
भारतीय संस्कृति और सभ्यता की असली ताकत इसकी विविधिता में बसती है। लेकिन, यही विविधिता कई बार कुछ समुदायों को हाशिए पर धकेलने का कारक बन जाती है। देश के घुमंतू समाज की स्थिति भी कुछ ऐसी ही है। यह समाज दशकों से उपेक्षा और असमानता का शिकार रहा है। जन्मजात अपराधी की दृष्टि से देखे गए या यूँ कहें,...
Continue reading...बुंदेलखंड की बदहाली को बदलने का दस सूत्रीय रोडमैप
बुंदेलखंड की धरती, जो कभी अपनी वीरता और सांस्कृतिक विरासत के लिए विश्व विख्यात थी, आज गरीबी, बेरोजगारी और पलायन के अभिशाप से कराह रही है। यहाँ के गाँवों में फैली भुखमरी और अभाव की स्थिति किसी से छिपी नहीं है, लेकिन सत्ता के गलियारों में बैठी सरकार शायद इस चीख को सुनने में असमर्थ है। नीति आयोग का बहुआयामी...
Continue reading...कहाँ चले नेता जी? — चुनावी मौसम और गायब होते नेताओं पर व्यंग्य
गाँव के नुक्कड़ से लेकर शहर की चाय की दुकान तक, एक सवाल हमेशा ट्रेंड करता है, जैसे चुनाव के समय बड़े-बड़े वादे मुफ्त में ट्रैंड करते हैं- “कहाँ चले नेता जी?” क्योंकि नेता जी तो लुकाछिपी के खेल में व्यस्त हो जाते हैं। जब नेता जी दिख नहीं रहे हों, तब समझ जाइए कि या तो चुनाव बहुत दूर...
Continue reading...दो दलों के बीच घूमता छत्तीसगढ़ का राजनीतिक चक्रव्यूह
छत्तीसगढ़ की राजनीति का मिज़ाज़ देश के अन्य राज्यों से बिल्कुल जुदा है। 1 नवंबर 2000 को मध्य प्रदेश से अलग होकर बने इस राज्य ने अपने अब तक के सफर में कई राजनीतिक करवटें बदली हैं। यहां के शांत दिखने वाले मतदाताओं की राजनीतिक परिपक्वता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वे किसी भी दल...
Continue reading...यूपीए का दशक: मनमोहन की मौन सरकार और उपलब्धियों-विवादों की कहानी
भारतीय राजनीति में 2004 से 2014 का दशक एक ऐसा विरोधाभासी और जटिल अध्याय है, जिसका मूल्यांकन एकतरफा नहीं किया जा सकता। एक राजनीतिक रणनीतिकार के चश्मे से देखने पर महसूस होता है कि यह वह ऐतिहासिक दौर था, जब भारत ने इतिहास की सबसे तेज आर्थिक विकास दर दर्ज की और अभूतपूर्व लोक-कल्याणकारी सामाजिक सुधारों की नींव रखी, लेकिन...
Continue reading...वर्ष 2026 के बाद किस दिशा में जाएगा भारतीय लोकतंत्र का भविष्य
भारतीय लोकतंत्र आज एक ऐसे ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा है, जहाँ से भविष्य की राहें पहले से कहीं अधिक जटिल और रोमांचक नजर आ रही हैं। वर्ष 2026 केवल कैलेंडर का एक नया पन्ना नहीं है, बल्कि यह उस व्यापक राजनीतिक परिवर्तन की दहलीज है, जो आने वाले दशकों के लिए भारत की लोकतांत्रिक दिशा निर्धारित करेगा। वर्ष 2014 के...
Continue reading...क्या 2047 तक भारत सच में विश्वगुरु बन पाएगा?
जब भारत 2047 में स्वतंत्रता के सौ वर्ष पूरे करेगा, तब वह केवल एक ऐतिहासिक उपलब्धि का उत्सव नहीं मना रहा होगा, बल्कि अपने अब तक के राजनीतिक, सामाजिक और वैचारिक सफर का गंभीर आत्म-मूल्यांकन भी कर रहा होगा। यह पड़ताल सिर्फ यह नहीं देखेगी कि देश ने कितनी आर्थिक तरक्की की, कितनी सड़कें बनीं या कितनी गगनचुंबी इमारतें खड़ी...
Continue reading...अनुप्रिया पटेल की राजनीति और जनसेवा का सफर
भारतीय राजनीति में कुछ अपवादों को छोड़ दें, तो अक्सर मंत्रियों को उनके मंत्रालय तक ही सीमित देखा जाता है। लेकिन, केंद्रीय राज्य मंत्री और अपना दल (एस) की राष्ट्रीय अध्यक्ष अनुप्रिया पटेल को उन अपवादों में ही शामिल किया जा सकता है, जो मंत्रालय की जिम्मेदारियों के साथ-साथ सामाजिक कर्तव्यों के निर्वहन में भी पहली पंक्ति में खड़ी नजर...
Continue reading...