यूपीए का दशक: मनमोहन की मौन सरकार और उपलब्धियों-विवादों की कहानी

यूपीए सरकार के दशक और मनमोहन सिंह के नेतृत्व को दर्शाती तस्वीर

भारतीय राजनीति में 2004 से 2014 का दशक एक ऐसा विरोधाभासी और जटिल अध्याय है, जिसका मूल्यांकन एकतरफा नहीं किया जा सकता। एक राजनीतिक रणनीतिकार के चश्मे से देखने पर महसूस होता है कि यह वह ऐतिहासिक दौर था, जब भारत ने इतिहास की सबसे तेज आर्थिक विकास दर दर्ज की और अभूतपूर्व लोक-कल्याणकारी सामाजिक सुधारों की नींव रखी, लेकिन यही दशक अंततः बड़े घोटालों, बेलगाम महँगाई और नीतिगत ठहराव के चलते गहरे जन-आक्रोश में तब्दील हो गया। 

इस पूरे कालखंड की कमान डॉ. मनमोहन सिंह के हाथों में थी, जो अपनी बेदाग छवि, सादगी और प्रखर आर्थिक विद्वता के लिए जाने जाते थे, लेकिन उनकी मौन राजनीतिक कार्यशैली और गठबंधन की मजबूरियों ने उनकी सरकार के पतन का मार्ग भी तैयार किया। यह पूरा सफर सत्ता के दोहरे केंद्र के अनूठे प्रयोग की कहानी है, जहाँ कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी राजनीतिक व गठबंधन का प्रबंधन संभाल रही थीं और डॉ. सिंह देश के आर्थिक व प्रशासनिक नीतिगत एजेंडा को दिशा दे रहे थे, जो शुरुआत में बेहद सफल रहा लेकिन बाद में सरकार की सबसे बड़ी कमजोरी बनकर उभरा।

यूपीए-1 का कार्यकाल उपलब्धियों के लिहाज से भारतीय राजनीति का एक स्वर्णिम दौर साबित हुआ, जिसकी शुरुआत 2004 में इंडिया शाइनिंग के रथ पर सवार एनडीए की अप्रत्याशित हार और सोनिया गांधी द्वारा प्रधानमंत्री पद के त्याग के बाद डॉ. सिंह के राज्याभिषेक से हुई थी। इस दौर में देश ने वैश्वीकरण का भरपूर लाभ उठाते हुए सालाना 8 से 9 प्रतिशत की दर से ऐतिहासिक आर्थिक विकास दर्ज किया, जिसमें 2005-06 के दौरान विकास दर 9.5 प्रतिशत के रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच गई थी। इसी कार्यकाल में सरकार ने अधिकार-आधारित शासन की शुरुआत करते हुए ग्रामीण गरीबी को मिटाने के लिए दुनिया की सबसे बड़ी रोजगार गारंटी योजना ‘मनरेगा’ लागू की, साथ ही लोकतंत्र में पारदर्शिता के लिए सूचना का अधिकार (आरटीआई) और बच्चों के लिए शिक्षा का अधिकार (आरटीई) जैसे युगांतकारी कानून बनाए। 

अंतर्राष्ट्रीय पटल पर डॉ. सिंह ने अपनी पूरी राजनीतिक पूँजी दाँव पर लगाकर वामदलों के भारी विरोध और सरकार गिरने के खतरे के बावजूद 2008 में भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु समझौते को अंजाम दिया, जिसने भारत को परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह से ऐतिहासिक छूट दिलाई। जनता ने विकास के इस दौर को सराहा और 2009 के आम चुनावों में कांग्रेस को पहले से भी बड़ा जनादेश मिला, जिसके बाद वैश्विक पटल पर अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने भी डॉ. सिंह को सम्मानपूर्वक मिस्टर गुरु कहकर संबोधित किया था।

इसके विपरीत, 2009 से 2014 के बीच का यूपीए-2 का कार्यकाल घोटालों की बाढ़, आर्थिक मंदी और नेतृत्व के गहरे संकट का गवाह बना, जहाँ पूर्व में सफल रहा दोहरे सत्ता केंद्र का मॉडल पूरी तरह बिखर गया। प्रधानमंत्री को गठबंधन के अड़ियल और मांगलिक सहयोगियों के सामने कमजोर होना पड़ा और पीएमओ अक्सर फैसलों के बाद असहाय नजर आने लगा। इस दौर में 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन, कोयला ब्लॉक आवंटन और राष्ट्रमंडल खेलों में हुए बड़े भ्रष्टाचारों को जब कैग की रिपोर्ट ने उजागर किया, तो सरकार की बची-खुची साख पूरी तरह मटियामेट हो गई और विपक्ष ने प्रधानमंत्री की इस लाचारी पर बाथरूम में रेनकोट पहनकर नहाने की कला जैसे तीखे व्यंग्य बाण छोड़े। 

आर्थिक मोर्चे पर 2008 की वैश्विक मंदी के असर, अंधाधुंध सरकारी खर्चों और गलत नीतियों के कारण उपभोक्ता मूल्य सूचकांक 10.4 प्रतिशत पार कर गया, खाद्य महँगाई 13 प्रतिशत तक पहुँच गई और विकास दर गिरकर 5 प्रतिशत के निचले स्तर पर आ गई। इसी समय बैंकिंग क्षेत्र में अनियंत्रित तरीके से बाँटे गए कर्जों की वजह से एनपीए का संकट खड़ा हुआ, जिसे बाद में देश का सबसे बड़ा बैंकिंग घोटाला कहा गया, जबकि वर्ष 2013 में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी द्वारा दागी सांसदों से जुड़े सरकारी अध्यादेश को सरेआम बकवास कहकर फाड़े जाने की घटना ने प्रधानमंत्री पद की गरिमा और उनके अधिकार क्षेत्र को सबसे बड़ी चोट पहुँचाई।

अंततः 17 मई, 2014 को सत्ता छोड़ते समय डॉ. मनमोहन सिंह ने यह उम्मीद जताई थी कि इतिहास उन पर समकालीन मीडिया या तत्कालीन विपक्ष की तुलना में अधिक दयालु होगा और यह बात आंशिक रूप से सही भी साबित हुई, क्योंकि उनके धुर विरोधी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी राज्यसभा से उनकी विदाई के समय उन्हें सदन और देश का मार्गदर्शक बताया।

आसान शब्दों में समझें, तो यूपीए के इस दशक की विरासत दो ध्रुवों में बंटी हुई है; एक तरफ जहाँ सर्वोच्च औसत विकास दर, आर्थिक सशक्तिकरण, मनरेगा, खाद्य सुरक्षा और परमाणु एकीकरण जैसी बड़ी सफलताएँ हैं, वहीं दूसरी तरफ नीतिगत अपंगता, संस्थागत भ्रष्टाचार, कमरतोड़ महँगाई और बैंकिंग एनपीए का भारी बोझ है। यूपीए का यह दशक भारतीय लोकतंत्र को यह सबसे बड़ा सबक देता है कि आधुनिक राजनीति में केवल अच्छी नीतियाँ बनाना या व्यक्तिगत रूप से निष्कलंक और ईमानदार होना ही काफी नहीं है, बल्कि एक शीर्ष नेता के भीतर उन नीतियों को जनता तक प्रभावी ढंग से पहुँचाने का संवाद कौशल और अपने सहयोगियों पर कड़ा प्रशासनिक नियंत्रण रखने की निर्णायक राजनीतिक क्षमता होना भी उतना ही अनिवार्य है, जिसमें विफल रहने के कारण ही 2014 में यूपीए का ऐतिहासिक चुनावी विनाश हुआ, जिससे फिलहाल 2029 तक आहिस्ता आहिस्ता उबरने की उम्मीद है।

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