गुरु कुम्हार शिष कुंभ है, गढ़ि-गढ़ि काढ़ै खोट। अन्तर हाथ सहार दै, बाहर बाहै चोट॥ कबीर के इस दोहे का अर्थ नई पीढ़ियाँ शायद ही जानती हों। गुरु और शिष्य के उदाहरण को हम इस दोहे से बखूबी समझ सकते हैं। जिस प्रकार कुम्हार भीतर से हाथ का सहारा देकर, बाहर से चोट मारकर मटके तथा बर्तनों को गढ़ता है,...
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लगातार अभ्यास मूर्ख व्यक्ति को भी बना देता है बुद्धिमान
“करत-करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान। रसरी आवत-जात ते सिल पर परत निशान॥” कवि वृंद रचित ”वृंद सतसई” का यह दोहा पुराने समय से ही काफी प्रचलित है, जो बच्चों को स्कूल हो या घर सभी जगह सिखाया जाता है, जिसका अर्थ है कि निरंतर अभ्यास करने से मुर्ख व्यक्ति भी विद्वान बन सकता है। दरअसल इस दोहे के पीछे...
Continue reading...खोखला बीज भला क्या काम का?
इंसान की आधारभूत जरूरतों में से पहली जरूरत रोटी होती है, जिसके लिए किसान दिन-रात मेहनत करके फसल उगाता है, लेकिन सिर्फ मेहनत कर देने से अच्छी फसल नहीं उग जाती, इसके लिए जरूरत होती है गुणवत्ता वाले बीज की, क्योंकि जब बीज अच्छा होगा, तभी अच्छी फसल होगी और तब सही मायने में किसान की मेहनत रंग लाएगी। किसी...
Continue reading...भ्रष्टाचार और पेपर लीक की आग की लपटों में झुलसते छात्र
भारत की शिक्षा प्रणाली एक भयानक तूफान के चपेट में आ बैठी है। एक ऐसा तूफान, जो धूल-मिट्टी के रूप में अपने साथ भ्रष्टाचार और पेपर लीक का बवंडर साथ लिए चल रहा है। एक ऐसा तूफान, जो अनगिनत छात्रों की उम्मीदों और आकांक्षाओं को निगलता ही चला जा रहा है। इन तमाम सुर्खियों और जाँचों के पीछे एक गहरी...
Continue reading...शिक्षा व्यवस्थाओं के किए-कराए पर पानी फेरने का काम कर रहीं परीक्षाएँ
भारत में शिक्षा व्यवस्था को लेकर हमेशा से उठते पेंचीदे सवाल शायद ही कभी खत्म हो सकेंगे। निरंतर आगे बढ़ते देश में शिक्षा का स्तर ऊपर जा रहा है या नीचे? क्या वास्तव में हमारे देश की शिक्षा व्यवस्थाएँ छात्रों के भविष्य को समृद्ध बनाने के काबिल हैं? ऐसे तमाम सवालों का एक बड़ा हिस्सा परीक्षा व्यवस्था की पोटली में...
Continue reading...“ओल्ड इज़ गोल्ड” कहावत एकदम खरी
आज के समय में देखा जाए तो संस्कार और शिक्षा दोनों ही बदल चुके हैं। प्राचीन समय में लोग अपने बच्चों को गुरुकुल में शिक्षा ग्रहण करने के लिए भेजा करते थे, जहाँ वे शिक्षा के साथ-साथ सामाजिक और धार्मिक ज्ञान भी अर्जित करते थे। फिर धीरे-धीरे समय बदला और अंग्रेजी सभ्यता ने भारतीय संस्कृति और परम्पराओं को जकड़ लिया।...
Continue reading...शिक्षक तो पढ़ा रहे हैं, लेकिन क्या बच्चे सीख भी रहे हैं?
शिक्षा का मतलब कभी-भी किसी खाली पात्र में जल भरने तक ही सीमित नहीं रहा है। महान अर्थशास्त्री तथा नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन एवं अभिजीत बनर्जी भी इस बात की पुष्टि कर चुके हैं कि किसी भी अन्य की तुलना में शिक्षा एकमात्र ऐसा साधन है, जो जीवन के अवसरों में वृद्धि करने का सबसे कारगर जरिया है। हमारे...
Continue reading...एक निवाले की कीमत……
बर्गर खाने की इच्छा हुई.. पास के मैक डोनाल्ड पर पहुँच जाओ। चाट खाने का मन हुआ.. चाट का ठेला बिल्कुल सड़क के किनारे ही है। घर के खाने से ऊब गए.. फटाफट तैयार हुए और बाहर किसी बढ़िया से होटल में खाना खा आए। हम लोगों के लिए, खाना एक रोजमर्रा का आनंद है, हमारी उँगलियों पर एक से...
Continue reading...नहीं दरिद्र सम दुःख जग माहीं
तुलसीदास जी द्वारा रचित रामचरित मानस की यह चौपाई आज के समय को देखते हुए बिल्कुल सटीक बैठती है, जहाँ गरीबी से बड़ा कोई दुःख ही नहीं है। आज अमीर और अमीर होता जा रहा, जबकि गरीब और गरीब होता जा रहा है। पहले के समय में लोग कहते थे, दाल-रोटी खाओ, प्रभु के गुण गाओ। लेकिन आज के समय...
Continue reading...जानवरों के लिए भोजन निकालने की प्रथा भी अब विलुप्ति की कगार पर
भारत की संस्कृति बहुत विराट है। यह हर उस जीव के बारे में सोचती है, जो पृथ्वी पर रहता है। संस्कृति हमारे बारे में ही सोचती है, अफसोस हम संस्कृति के बारे में कभी नहीं सोच सके और शायद कभी सोच भी नहीं सकेंगे। सबसे बड़ी सीखों में से एक हमारी संस्कृति ने हमें यह दी है कि हर दिन...
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