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2047 का भारत और सिमटती सफेद पट्टी की चेतावनी

2047 के भारत में सामाजिक संतुलन और तिरंगे की सफेद पट्टी का प्रतीकात्मक चित्र

भारत जब 2047 में स्वतंत्रता के सौ वर्ष पूरे करेगा, तब वह केवल एक ऐतिहासिक पड़ाव का उत्सव नहीं मना रहा होगा, बल्कि अपने सामाजिक, राजनीतिक और नैतिक विकास का गहन आत्ममंथन भी कर रहा होगा। 2047 कोई दूर की तारीख नहीं, बल्कि वह दर्पण है, जिसमें आज की प्रवृत्तियाँ, जैसे हमारी भाषा, हमारे राजनीतिक निर्णय और हमारे सामाजिक व्यवहार,...

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77वें गणतंत्र दिवस के बाद संविधान पर पुनर्विचार

77वें गणतंत्र दिवस के बाद संविधान और नागरिक जिम्मेदारी पर चिंतन दर्शाती तस्वीर

वर्ष 2026 में देश ने अपना 77वाँ गणतंत्र दिवस मनाया। परेड, सांस्कृतिक झांकियाँ, राष्ट्रपति का संबोधन और राष्ट्रगान की गूँज, ये सभी दृश्य एक बार फिर हमारी सामूहिक चेतना का हिस्सा बने। हर वर्ष की तरह इस बार भी 26 जनवरी ने हमें गर्व का अनुभव कराया, लेकिन गणतंत्र दिवस केवल उत्सव का दिन नहीं होता। यह वह अवसर होता...

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1977 से 2026 तक भारत की राजनीति कैसे बदली

1977 से 2026 तक भारत की राजनीतिक विचारधारा में बदलाव दर्शाती तस्वीर

जून 1975 में जब इंदिरा गांधी ने आपातकाल लागू किया, तो उन्होंने अनजाने में भारतीय लोकतंत्र की उस नई नींव की आधारशिला रख दी थी, जिसे आने वाले पाँच दशकों की राजनीति को परिभाषित करना था। 1977 का चुनाव महज एक मतदान नहीं, बल्कि नागरिक अधिकारों की बहाली का जनादेश था, जिसने मोरारजी देसाई के रूप में देश को पहला...

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यह इत्र सबसे महँगा

एक गरीब बच्चा किताब पढ़ता हुआ और पास में उड़ती चिड़िया – शिक्षा की महक का प्रतीकात्मक दृश्य

फूलों का स्वभाव होता है खुद के साथ ही साथ अपने आसपास के वातावरण को भी महकाना और अपनी महक से सराबोर कर देना हर उस शख्स को, जिसने इसे छुआ है। फूलों से बने इत्र में खूबियाँ और भी बढ़ जाती हैं। बात महक की चली है, तो इसी पर आगे बढ़ते हैं। क्या महक का नाता सिर्फ फूलों...

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बचपन के भी दो चेहरे

भारत की सड़क पर स्कूल जाते बच्चे और फुटपाथ पर बैठे गरीब बच्चे – बचपन के दो चेहरे का सामाजिक दृश्य

बचपन के भी दो चेहरे हैं.. यह तथ्य आपको तब सत्य होता दिखाई देगा, जब आप खुद के आवरण से बाहर आएँगे, और अपने आस-पास के लोगों पर भी ध्यान देंगे.. हमारे देश की चहल-पहल भरी सड़कों पर बच्चों की अलग ही दुनिया हमें देखने को मिलती है.. लेकिन, उन मासूमों के जीवन में जो प्रतिकूल स्थितियाँ देखने को मिलती...

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मौन पीड़ाओं की नज़रअंदाजी..

मौन पीड़ाओं की अनदेखी

हमारे शहरों की हलचल भरी सड़कों पर, हॉर्न बजाती कारों के शोर और भागदौड़ के बीच, हम अक्सर ऐसे लोगों की खामोश चीखें सुनते हैं, जो हर दिन जीवन के लिए संघर्ष करते हैं। कभी रास्तों पर हमें बुजुर्ग पुरुष और महिलाएँ, कमजोर और समय से थके हुए, हाथ फैलाकर बैठे मिलते हैं। कभी खोखली आँखों वाले बच्चे, अपने छोटे-छोटे...

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एक अनदेखा संकट….

भारत में बच्चों का कुपोषण संकट

हम एक ऐसे देश में रहते हैं, जहाँ का हर कोना खान-पान की एक संपन्न विरासत लिए हुए है। एक ऐसा देश, जहाँ कहीं आपको मसालों की सुगंध मिलेगी, तो कही हवाओं में मिठास घुली होगी। अलग-अलग कोने में अलग-अलग जायका मिलेगा। यह खान-पान तो हमारी पहचान है, लेकिन खाने के शौकीन इस देश की एक सच्चाई और है, जहाँ...

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इंसानियत की समझ से परे टीस भूख की

भूख की टीस – इंसान, जानवर और पक्षी

भूख और भुखमरी ये ऐसे मुद्दे हैं, जो हमें हमारी इंसानियत की गहराइयों में झाँकने पर मजबूर करते हैं। जब हमारा अपना बच्चा भूखा सोता है, तो हमारी आत्मा भीतर तक कचोट जाती है। दया बेशक हमें सिर्फ अपने लोगों पर ही आती है। कुछ स्थितियों में बाहर किसी व्यक्ति को देखकर भी आ ही जाती है, लेकिन हम में...

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भूख की चीख

भूखे बच्चे की नम आँखें

पेट से निकली हुई बेबाक भूख की चीख कानों से सुनाई नहीं, बल्कि दिखाई देती है आँखों से भूख से जिस समय पेट बिलखता है, उस स्थिति में दुनिया की कोई भी बात ज़हन में नहीं आती। बात बहुत बड़ी है, जरुरत है, पेट की इस गुहार को सुनने की और इसे महसूस करने की। उस पेट में उठती दलील,...

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खून को पसीने के रूप में बहाता है किसान, तब जाकर आप तक पहुँचता है अन्न

खेत में पसीना बहाता भारतीय किसान

“खून को पसीने के रूप में बहाता है किसान, तब जाकर आप तक पहुँचता है अन्न” यह वाक्यांश सटीक रूप से इस तथ्य को उजागर करता है कि किसानों का श्रम और संघर्ष ही हमारे जीवन का आधार है। यदि वे मेहनत और हमारी फिक्र करना बंद कर दें, तो मुझे कहने में कोई संकोच नहीं कि हम चंद ही...

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