भारत की संस्कृति बहुत विराट है। यह हर उस जीव के बारे में सोचती है, जो पृथ्वी पर रहता है। संस्कृति हमारे बारे में ही सोचती है, अफसोस हम संस्कृति के बारे में कभी नहीं सोच सके और शायद कभी सोच भी नहीं सकेंगे। सबसे बड़ी सीखों में से एक हमारी संस्कृति ने हमें यह दी है कि हर दिन पहली रोटी गाय की और आखिरी कुत्ते की निकालना चाहिए। इसका स्पष्ट अर्थ यह है कि हम अपने आप से पहले और बाद अन्य तमाम प्राणियों के हित में सोचना सीखें। उनके काम आना सीखें। वे भी हमारी ही जिम्मेदारी हैं, इस बात का एहसास कर सकें। उन्हें हमारी जरुरत है, इस बात को समझ सकें। यह बात और है कि लोग अब इस सीख से भी किनारा कर चुके हैं। आधुनिक दुनिया में जो रहने लगे हैं।
खुद से पहले और बाद जानवरों के लिए भोजन निकालने की यह प्रथा सिर्फ प्रथा नहीं थी, यह एक जीवंत भावना थी। इंसानों की इंसानियत के साथ-साथ अब यह भावना भी धीरे-धीरे दम तोड़ रही है। हम आँकड़ों की बात करते हैं न! यदि इस बात के आँकड़ें निकाले जाएँ, तो इसमें कोई दो राय नहीं है कि रोटी पकाते समय गाय की पहली और कुत्ते की आखिरी रोटी निकालने की इस प्रथा में बीते कुछ वर्षों की तुलना में भारी स्तर पर गिरावट देखने को मिलेगी। गाँवों में तो एक घड़ी प्रथा को लोग जीवंत बनाए हुए हैं, लेकिन यह सत्य है कि शहरों में अब इस प्रथा का दम घुटने लगा है और धीरे-धीरे यह विलुप्ति की कगार पर आ पहुँची है।
माना कि आज के समय में हमारे पास समय का काफी अभाव है, हमें स्वयं का ख्याल रखने का भी पर्याप्त समय नहीं मिलता, लेकिन क्या सच में समय की इतनी कमी है कि हमारे लिए बनाई गई रोटियों में से ये दो रोटियाँ अधिक न बना सकी जाएँ? दिनचर्या और जीवन इंसानों का व्यस्त है, इसमें बेज़ुबान जानवरों और पक्षियों का क्या दोष? उन्हें क्यों मजबूर किया जा रहा है हर दिन भूखे रहने के लिए? आपकी व्यस्तता का खामियाजा आखिर क्यों उन्हें भुगतना पड़ रहा है? अपने साथ-साथ अन्य जीवों का भी ख्याल रखने के लिए क्या भारत की संस्कृति हमें यही सिखाती है?
हमारे बड़े-बूढ़ों ने भी संस्कृति की इस गूँज से हमें बार-बार अवगत कराना चाहा, बेशक हम इस बात को समझे भी और हमने इस पर काम भी किया, लेकिन बदलते समय के साथ-साथ इसे भूल बैठे। इंसान के साथ ही समस्त प्राणियों के प्रति सेवा भाव रखने और उनकी भूख-प्यास का खुद की तरह ही ख्याल रखने की सीख हमारे पूर्वजों ने हमें अमानत के तौर पर सौंपी है। बचपन में दादा-नाना के साथ उनकी ऊँगली पकड़कर हम हर दिन अपने नन्हें-नन्हें हाथों से उन्हें खुद रोटियाँ खिलाने जाया करते थे। यह एक खूबसूरत अनुभव था, जो हमें सिखाता था कि हमें अन्य जीवों का भी ख्याल रखना चाहिए। आधुनिक दुनिया की सैर पर बड़े शौक से चले हम इस अमानत को कब पीछे कुचल कर आगे को बढ़ गए, इस बात का एहसास मात्र भी हमें नहीं है।
घर की गली में आती हुई दूर से ही यदि गाय दिख जाया करती थी, तो दौड़कर घर के भीतर जाकर दौड़कर उस गाय के लिए रोटी माँगकर ले आया करते थे, सिर्फ इसलिए कि वह हमारी गली, हमारे घर से भूखी न जाए। आप मेरी यादों से खुद को जोड़ पा रहे होंगे, क्यों? क्योंकि आपने भी यह सुनहरा जीवन बड़ी खुशी के साथ जीया है, मैं यह बात बहुत अच्छे से जानता हूँ। लेकिन दुनिया की भागम-भाग में इन यादों के पीछे छिपी हकीकत बहुत पीछे छूट गई है। अब किसी भी गली, किसी भी मोहल्ले में यह माहौल देखने को नहीं मिलता। न तो अब वो लोग हैं और न ही गलियों में घूमने के लिए गाय। शहरों में तो गायों को देखे हुए महीनों बीत जाया करते हैं।
कितना सुन्दर आचरण था यह, जिसकी बात करते ही सब-कुछ किसी खूबसूरत फिल्म के नज़ारों की तरह मेरी नज़रों के सामने चला जा रहा है। लेकिन, एक टीस भी है कि दुनिया की होड़ में हम कहाँ आ गए हैं और क्या खो बैठे हैं? जिस जगह हम आज आ खड़े हुए हैं, हमारी संस्कृति हमारा आना किसी कीमत पर भी गवारा नहीं करती है। यदि हम ही अपने आचरण भूल बैठेंगे, तो आने वाली पीढ़ी यह सब देखकर क्या सीखेगी?
आज के समाज में हमें यह समझने की आवश्यकता है कि हमारी संस्कृति केवल किताबों तक सीमित नहीं होनी चाहिए। हमें अपने बच्चों को यह सिखाना होगा कि दूसरों की मदद करना और उनके बारे में सोचना कितना महत्वपूर्ण है। यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम आने वाली पीढ़ी को अपनी संस्कृति की मूल भावनाओं से परिचित कराएँ और उन्हें भी इस प्रथा पर अमल रखना सिखाएँ, कि वे भी इस धरोहर को संजो कर रखें।
एक बात और कहना चाहूँगा कि सिर्फ बात करने से बात नहीं बनेगी, यह तभी संभव होगा, जब हम व्यस्तता से खचाखच भरी अपनी दिनचर्या से थोड़ा-सा समय चुराकर अपने आसपास के जीव-जंतुओं के बारे में सोचें और उनके लिए कुछ करें।
साथ ही बच्चों को भी इन गतिविधियों में शामिल करें। उन्हें बताएँ कि हम केवल अपने लिए नहीं, बल्कि सभी जीवों के लिए इस धरती पर हैं। बच्चों से हर दिन गाय को चारा डलवाएँ, पहली रोटी गाय के लिए और आखिरी रोटी कुत्ते के लिए निकालने की प्रथा से उन्हें अवगत कराएँ, पक्षियों के लिए छत पर दाना-पानी की व्यवस्था भी बच्चों से ही करवाएँ। आप देखिएगा, वे कितनी रूचि से ये सारे के सारे काम करेंगे और यदि किसी कारणवश या व्यस्तता के चलते आप भूल भी गए, तो वे आगे होकर आपको याद दिलाएँगे, क्योंकि वे इस बात की महत्ता को समझ चुके होंगे कि गाय भूखी है, उसे अब तक भोजन नहीं मिला। दाना खत्म हो गया है, चिड़िया क्या खाएगी। आसमान में उड़ते-उड़ते कबूतर थक गया होगा, उसे प्यास लगेगी तो पानी कहाँ जाकर पीएगा, अपनी छत पर रखे बर्तन में तो पानी खत्म हो गया होगा। ये बातें मैं नहीं, आपके बच्चे ही एक दिन आपसे कहेंगे। इस प्रकार, हम न केवल अपनी संस्कृति को जीवित रखेंगे, बल्कि अपनी मानवता को भी बचाए रखेंगे। यह हमारे समाज के लिए और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक महत्वपूर्ण शिक्षा होगी।