दोषी कौन????????

Who is guilty????????

बीती सुबह, मैं घर के पास ही बने गार्डन में टहल रहा था। रेसीडेंसी के ब्लॉक बी और सी में रहने वाले मेरे कुछ मित्र रनिंग और एक्सर्साइज़ छोड़कर बड़ी ही गहरी चर्चा में लगे हुए थे। चर्चा इतनी विशेष थी, मानों वे सभी सुबह होने का ही इंतज़ार कर रहे थे कि कब हम सभी मिलें और इस बारे में बात करें। चर्चा का विषय थे ब्लॉक ए की दूसरी मंजिल पर मेरे ठीक चार फ्लैट्स छोड़कर रहने वाले शर्मा जी और उनकी पत्नी। उम्र के नए पड़ाव में दाखिल होने के बाद स्वास्थ्य ने शर्मा जी और उनकी पत्नी से कुछ किनारा कर लिया है।

किनारा कुछ ऐसा कि जीवन की नाँव को चलाने के लिए होते हुए भी उन दोनों के सिवाए उनके पास कोई पतवार नहीं है। उनके दोनों बेटे विदेश में जो रहने लगे हैं.. बड़े बेटे ने पढ़ाई खत्म होने के बाद अमेरिका में शादी करके घर बसा लिया और छोटा बेटा लंदन के फलानां बड़े शहर में पढ़ाई कर रहा है। वह भी कब लौटे, कह नहीं सकते.. आजकल विदेश में पढ़ने के बाद बच्चे वहीं जॉब ढूँढकर जीवन बिताना पसंद करते हैं.. कुछ भी हो, शर्मा जी को दोनों में से किसी एक को ही बाहर भेजना था, भाभीजी ही रोक देतीं, तो बात बन जाती और आज उन दोनों को बेटे के हाथों सेवा भी मिल जाती।

फिर ग्रुप में से एक दिग्गज व्यक्ति बोल उठे, “बहुत तकलीफ होती है, जब शर्मा जी को इस उम्र में अस्पताल के चक्कर अकेले लगाते हुए देखता हूँ। घुटनों के दर्द की वजह से भाभी जी से भी अब ठीक प्रकार चलते कहाँ बनता है.. शर्मा जी के दोनों बेटों को उनकी देखरेख के लिए भारत आ जाना चाहिए, भला, ऐसी पढ़ाई और पैसा भी क्या काम का, जो घरवालों के ही काम न आए। मैं तो दो साल बाद मेरे बेटे को वापस भारत बुला लूँगा, फिर वह आना चाहे या नहीं।”

मैं चुपचाप बिन कुछ कहे चर्चा को बीच में छोड़, मुस्कुराता हुआ वहाँ से चला आया। इतना पैसा खर्च करके उनकी इच्छा के विरुद्ध, करियर की पीक पर उन्हें देश वापस बुलाना भी तो सही नहीं है न.. लेकिन एक सवाल मन में घर कर गया कि आखिर इसका दोषी कौन है??

प्रतिस्पर्धा की होड़ में बच्चे को अच्छे से अच्छी सुख-सुविधाएँ देने और खुद से कोसों दूर करके पढ़ाई करने के लिए अन्य शहर या देश में भेजने वाले पेरेंट्स की, या उन बच्चों की जो अपने ही माता-पिता का सपना पूरा करने के लिए करियर बनाने में जुट जाते हैं। बच्चों को पेरेंट्स से दूर कर कौन रहा है?

मेरा यह मानना है कि यदि पेरेंट्स खुद बच्चे को बाहर पढ़ाई करने खुद से दूर भेज रहे हैं, तो फिर वह लौटकर पहले की तरह जीवन जीने आएगा, इस उम्मीद को छोड़कर उसे बाहर भेजें, तो न आप दुःखी रहेंगे और न ही आपका बच्चा। अपनी खुशी से वह वापस आता है, तो इससे अच्छी और क्या बात हो सकती है, लेकिन उम्मीद लगाकर बच्चों को कोसना सरासर गलत है। हाँ, बेशक यदि वह आपकी इच्छा के विरुद्ध आपको छोड़कर दूर गया है, तो बात अलग है।

पेरेंट्स ही तो नए-नए सपने बुनने की तलाश में उन्हें बाहर भेजते हैं न.. खुद से दूर करके बच्चों के अकेले रहने की आदत वाली यह परंपरा शुरू कौन कर रहा है? इसमें बच्चों का दोष कहाँ है? कोई भी बच्चा जन्म से ये ख्वाहिशें लेकर नहीं आता है। बड़ा घर, नई कार, अच्छी जॉब, ऐशो-आराम वाला जीवन और बड़े-बड़े सपने देखना पेरेंट्स ही तो सिखाते हैं। आपके द्वारा बोया गया बीज ही एक दिन आपके सामने पेड़ बनकर खड़ा होता है।

बच्चों को सादा जीवन जीना सिखाएँ, बड़े-बड़े सपने देखने की आदत उनमें डालने के बजाए सरकारी स्कूल में पढ़ाएँ, ताकि उनमें दुनिया में मौजूद हर परिस्थिति के लोगों के बारे में जानने का मौका मिल सके और वे दुनिया के तौर-तरीकों को समझकर एक परिवार के रूप में हमेशा आपके साथ रहें। सिर्फ और सिर्फ आप पर निर्भर करता है कि बच्चों को अपने पास रखकर खुश रहना है या फिर उन्हें किसी दूर देश में खुश देखकर खुश रहना…..

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