भीगता अनाज, रोता किसान

Wetting grain, crying farmer

खुशहाल भारत का आधार ही किसानों की मजबूती है। यह लाइन आपने भी कभी न कभी नेताजी के भाषण में जरूर सुनी होगी। हमारे देश के तमाम नेता अपने भाषणों में किसानों को सशक्त बनाने की बात करते हुए नजर आते हैं। लेकिन वो नेता, जो किसानों के प्रति गहरी संवेदना व्यक्त करते हैं, क्या वाकई उन्हें किसानों से हमदर्दी है?

किसानों की दुर्दशा, सरकार की संवेदनाओं पर सवाल उठाती है। ये संवेदनाएं महज छलावा प्रतीत होती हैं क्योंकि अगर इनमें तनिक भी सच्चाई होती, तो फिर हजारों अन्नदाता यूँ काल के गाल में न समाते। सच्चाई तो यह है कि कृषि प्रधान देश के किसान का हाल, बदहाल है क्योंकि किसानों से बड़े-बड़े वायदे करने वाली सरकार, उनकी मूलभूत जरूरतें भी पूरी नहीं कर पा रही है।

मौसम की मार के चलते हर साल किसानों का अनाज भीगता है, सड़ता है, गलता है और किसान मरता है, क्यों? क्योंकि हमारे पास उचित भंडारण व्यवस्था का अभाव है। किसानों से बड़े-बड़े वायदे करने वाली सरकार अगर भंडारण व्यवस्था का उचित प्रबंध कर पाती, तो किसान खुद को यूँ ठगा हुआ महसूस न करता। जब किसान की फसलें बर्बाद होती हैं तो उसे न के बराबर मुआवजा मिलता है, साथ ही, हल भी सरकारी कागजों में दबा रह जाता है।

किसान, मंडियों में टैक्स भरता है, आड़तियों को आड़त का मूल्य अदा करता है, उसके फसल मूल्य से भी कटौती की जाती है, इसके बावजूद भी उसकी फसल, कृषि मंडी में बह जाती है।

समझ नहीं आता कि बड़े-बड़े स्मारक बनाने वाली सरकार, शेड बनाने में इतनी आना-कानी क्यों करती है? आखिर कृषि क्षेत्र में साधनों और सुविधाओं का अभाव क्यों है? आखिर क्यों हर साल किसान की मेहनत इस अभाव का शिकार होती है?

खेल के मैदान को ही देख लीजिए, कहीं बारिश से खेल फीका न पड़ जाए, इसलिए करोड़ों रुपयों के इंतजाम किए जाते हैं, तो फिर यह मानसिकता पेट भरने वाले अनाज के लिए क्यों नहीं है? हम खेल के लिए फिक्रमंद हैं, तो फिर खाद्यान्न के लिए क्यों नहीं? आखिर कब तक यूँ फसलें बर्बाद होती रहेंगी और कर्ज के बोझ तले दबकर अन्नदाता मरते रहेंगे?

जरूरत है सरकार और राज्यों के कृषि मंडी प्रशासन को किसानों के प्रति सजग और उनके उपज के प्रति गंभीर होने की, मंडी प्रागंण में शेड्स व्यवस्था कराने की, मंडी प्रागंण में पानी का भराव न हों, इसके लिए ऊँचे प्लेटफॉर्म्स बनवाने की, इसके अलावा अन्य दूसरे जरुरी इंतज़ाम करवाने की, ताकि फिर कोई बारिश किसान की आँखों में आँसू न लाए।

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