“जबरदस्ती के ‘जय श्री राम’ में सब कुछ है, बस राम नहीं” जगविदित है अयोध्या में 22 जनवरी को राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा समारोह होने जा रहा है। शतकों के इंतज़ार के बाद यह दिन हमें देखने को मिल रहा है। लोग अपने-अपने अंदाज में अपने भाव व्यक्त कर रहे हैं। इसी बीच सोशल मीडिया पर श्रीराम को लेकर एक...
Continue reading...समानता की दौड़ से परे नारी का अस्तित्व
आज हमारा समाज महिलाओं और पुरुषों की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक समानता की वकालत कर रहा है। लेकिन यह निराशाजनक तथ्य है और मुझे इस विचारधारा से बहुत नफरत है। अब बेवजह तो कुछ भी नहीं होता, तो जाहिर है इसकी भी वजह होगी और है भी। इंसान का उसके जन्म के समय से ही जेंडर निर्धारित कर दिया जाता...
Continue reading...देश की महिला सशक्त है: मूर्त वास्तविकता या महज़ एक भ्रम?
महिला सशक्तिकरण, नारीवाद और समान अधिकारों की तलाश एक अरसे से बाट निहार रही है कि उसे हमारे समाज के किसी कोने में थोड़ी-सी ही सही, लेकिन जगह मिल जाए। हालाँकि, इसमें कोई दो राय नहीं है कि हमने पिछले कुछ दशकों में महिलाओं के जीवन को बेहतर बनाने में निर्विवाद रूप से प्रगति की है, लेकिन इस बात को...
Continue reading...अब कम उम्र के लोगों को कैंसर की चपत
कम उम्र के लोगों को तेजी से अपना शिकार बना रहा कैंसर युवाओं को अपनी चपेट में लेने को उतारू- कैंसर मेरे एक परिचित हैं रोहन, पिछले साल उनमें अचानक तेज पेट दर्द की समस्या पनपने लगी। इसे सामान्य समस्या समझकर उन्होंने प्रारंभिक उपचार के लिए डॉक्टर से सलाह ली। डॉक्टर ने संबंधित जाँचें लिख दी यह पता लगाने के...
Continue reading...सीखकर उपकार भूलने की भूल और मन में गुरु बनने का गुरुर
सीखकर भले ही भूल जाएँ, लेकिन गुरु नहीं बन सकते शिष्य “गुरु और माता-पिता ईश्वर के समान वंदनीय हैं” बचपन से ही हमें यह सिखाया जाता है, कुछ मानते भी हैं, लेकिन कुछ आधुनिकता के मोड़ पर मुड़कर इस कहावत और इसकी महत्ता को आगे बढ़ने के साथ पीछे छोड़ जाते हैं। कल मैं एक परम् पूज्य महाराज जी के...
Continue reading...अच्छी परवरिश पर पैसा भारी
अपनी खुशियाँ न्यौंछावर करके एक पिता अपने बेटे को करोड़ों रुपए कमाने के लायक बनाता है, और इस काबिल होने के बाद वही बेटा उस पिता से कौड़ियों की भाँति व्यवहार करने लगता है। यह एक ऐसा कटु सत्य है, जिससे कलयुग और विशेष रूप से इस मॉडर्न ज़माने का कोई भी व्यक्ति मुकर नहीं सकता। इससे पहले के दो...
Continue reading...वक्त की रफ्तार ने आगे बढ़ाया या पीछे धकेल दिया हमें..
मेरे ज़हन में कई दफा कुछ ऐसे ख्याल पनपते हैं, जो बयाँ करते हैं कि वक्त की रफ्तार वाकई हमारी सोचने की क्षमता और काम की हमारी काबिलियत से काफी तेज है। वक्त का पहिया चलता गया और लोगों के सोचने और समझने का नजरिया भी समान रूप से बदलता चला गया। बहुत-सी परम्पराएँ, कार्यशैलियाँ और विचार ऐसे रहें, जो...
Continue reading...शिकायत खुद से..
जीवन की आपाधापी में खुद के लिए चंद मिनटों की मोहलत बमुश्किल ही मिली.. एक तरफ दुनियादारी का शौक और दूसरी तरफ जिम्मेदारियों का बोझ, ये दोनों किसी गाड़ी के पहिए के से मेरे जीवन में साथ-साथ ही चले, न ही एक आगे और न ही एक पीछे, बिल्कुल साथ-साथ.. शिकायक करूँ भी तो किससे, सिवाए खुद के? इसलिए शिकायत...
Continue reading...शादी-ब्याह को चंगुल मानने लगी युवा पीढ़ी की बड़ी आबादी
विवाह एक खूबसूरत बंधन है, जहाँ सिर्फ दो व्यक्ति ही नहीं, बल्कि दो परिवार भी मिलते हैं। बेशक, यह एक नैतिक परंपरा रही है, लेकिन धीरे-धीरे नए दौर के बोझ तले दबती जा रही है। एक ऐसा नया दौर, जिसमें शादी का बंधन किसी कैद जैसा जान पड़ने लगा है। एक ऐसा नया दौर, जहाँ अपने ही हमसफर का कुछ...
Continue reading...जनता को इस बात से फर्क पड़ना चाहिए कि उनका प्रतिनिधि शिक्षित है या नहीं
भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है और इसकी सफलता इसके नेताओं या राजनीतिज्ञों की शैक्षणिक योग्यता पर निर्भर है। इस मुद्दे पर बहस लाज़मी है कि क्या राजनेताओं के लिए शैक्षणिक योग्यता को अनिवार्य किया जाना चाहिए? वर्ष 2015 में हरियाणा सरकार ने स्थानीय निकाय चुनाव लड़ने के लिए न्यूनतम शैक्षिक मानदंड निर्धारित करते हुए हरियाणा पंचायती राज...
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