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भारतीय राजनीति में महिलाओं की हिस्सेदारी तो पूरी, लेकिन भागीदारी कम

भारतीय राजनीति में महिलाओं की भागीदारी को दर्शाती महिला नेता और ग्रामीण चुनावी कार्यक्रम

कुछ समय पहले मुझे एक गाँव के चुनावी कार्यक्रम में शामिल होने का अवसर मिला। वहाँ की स्थानीय राजनीति के बारे में सुनने और समझने का मौका मिला। जब मैं कार्यक्रम में पहुँचा, तो सबसे पहले मेरी नज़र वहाँ उपस्थित लोगों की भीड़ पर पड़ी, जिनमें से ज्यादातर पुरुष थे। महिलाएँ भी थीं, पर उनकी संख्या नगण्य थी और जो...

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राजनेताओं से भी लिया जाए काम का लेखा-जोखा..

लोकतंत्र में राजनेताओं की जवाबदेही और कार्य रिपोर्ट

भारत एक लोकतांत्रिक देश है। लोकतंत्र को समझाते हुए अब्राहम लिंकन ने कहा था, “जनता का, जनता के द्वारा और जनता के लिए शासन”, जहाँ जनता अपने बीच से ही एक व्यक्ति को नेता चुनती है और वही नेता जनता के हित में काम करते हैं। ये नेता जनता के प्रतिनिधि होते हैं और जनता का विश्वास उनके कँधों पर...

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केवल राजनीति पर क्यों उठे सवाल…

नेपोटिज़्म राजनीति और समाज के विभिन्न क्षेत्रों में

आजकल एक शब्द बड़ा प्रचलित हो चला है, जो आपने भी अक्सर सुना होगा, नेपोटिज़्म या हिंदी में कहें तो भाई-भतीजावाद। आज हर क्षेत्र और स्तर पर आपको इसका असर देखने को मिल जाएगा। लेकिन, इस आरोप से सबसे ज्यादा राजनीति बदनाम है। हालाँकि, ज्यादा दूर न जाएँ; यदि आप अपने आस-पास ही देखें, तो आपको इसके उदाहरण बड़ी आसानी...

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अब वो बात कहाँ..

पुराने समय में संगीत सुनने का अनुभव

एक रोज़ मेरा किसी काम से बाहर जाना हुआ, घर लौटते हुए शाम हो गई। मैं घर लौट ही रहा था कि दूर किसी चाय की दुकान पर एक पुराना गाना सुनाई दिया। गाने के बोल मेरे कानों में पड़े, तो एक पल के लिए मैं जवानी के उस समय में पहुँच गया, जब मैं गाने सुनने का बड़ा शौकीन...

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सच्चे रिश्तेदार

शादी में भीड़ और सच्चे रिश्तेदारों का फर्क

शादियों का मौसम शुरू हो चुका है, और हर रोज लाखों की तादाद में शादियाँ हो रही हैं। आप लोग भी रिश्तेदारों और परिचितों की शादियों में मेहमान नवाजी का लुफ्त उठा ही रहे होंगे। आजकल की शादियों में 500-700 मेहमान बुलाना तो आम बात है। कहीं-कहीं तो यह संख्या हजारों में भी देखने को मिल जाती है। ज्यादा से...

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पक्के मकान.. कच्चे दिल..

पक्के मकानों में खोता अपनापन और पुराने घरों की यादें

गर्मियों की रातों में छत पर बिछी चारपाइयाँ, खुले आसमान के नीचे सोते हुए तारों को गिनने का खेल, दादी-नानी की कहानियाँ और मिट्टी की सौंधी-सी महक.. क्या आपको याद हैं वो दिन? वो दिन.. जब मकान कच्चे होते थे, लेकिन दिल पक्के। रिश्तों में अपनापन था, मोहल्ले भर में हर किसी को अपना माना जाता था, और जीवन में...

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गाँव की बेरंग तस्वीर में रंग भरने का काम आज भी अधूरा

गाँव की बेरंग तस्वीर और अधूरा विकास

हर किसी के जीवन में एक गाँव होता है, कभी जन्मभूमि के रूप में, तो कभी नानी के घर के रूप में.. माध्यम कई हो सकते हैं, लेकिन हर किसी का जीवन किसी न किसी बहाने गाँव से जुड़ा जरूर होता है..  वह दुनिया, जहाँ दिल हर बार लौट जाना चाहता है। मेरे लिए गाँव सिर्फ एक जगह नहीं, बल्कि...

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देश से गरीबी का नाम-ओ-निशान ही गायब

गरीबी मुक्त भारत के दावे और ज़मीनी हकीकत

सूरज अपनी हल्की किरणें बिखेर रहा था और मैं बालकनी में बैठकर अखबार के पन्ने पलट रहा था। एक हेडलाइन पर नज़र ठिठक गई: “भारत अब गरीबी मुक्त देश बन चुका है!” मेरी आँखें चमक उठीं। क्या यह सच में संभव हो गया? क्या अब कोई भी सड़क किनारे भूखा नहीं सोता? क्या अब किसी भी माँ को अपने बच्चे...

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समाज और राजनीति

भीड़ भरी सड़कों के बीच मेहनत करता अनदेखा स्ट्रीट वेंडर

भीड़ में खामोशी.. हलचल भरी और खचाखच भीड़ वाली सड़कों पर जहाँ शहरी जीवन की दैनिक लय लोगों के जमावड़े के साथ पूरी होती है, वहाँ इस भीड़ के भारी शोर के बीचों-बीच कुछ लोग चुपचाप सादगी से चंद रुपए कमाने की आस में खुद से ही एक खामोश जंग लड़ रहे होते हैं। उनके जीवन का यह पिन ड्रॉप...

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लिफाफे का नया चलन…. 

बीमारी के समय लिफाफे के जरिए आर्थिक और भावनात्मक सहयोग करते लोग

हम भारतीयों के जीवन में लिफाफे का महत्व किसी मूल्यवान वस्तु से कम नहीं है। शादी हो, सालगिरह हो, बच्चे का जन्म हो, या फिर कोई और खास मौका, शगुन का लिफाफा हर जगह अपनी उपस्थिति दर्ज कराता है। लेकिन ज़रा सोचिए, क्या हो यदि यह परंपरा सिर्फ खुशी के मौकों तक सीमित न रहे, बल्कि जीवन के कठिन समय...

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