नहीं दरिद्र सम दुःख जग माहीं

भारत में गरीबी और भोजन की बर्बादी का मार्मिक दृश्य

तुलसीदास जी द्वारा रचित रामचरित मानस की यह चौपाई आज के समय को देखते हुए बिल्कुल सटीक बैठती है, जहाँ गरीबी से बड़ा कोई दुःख ही नहीं है। आज अमीर और अमीर होता जा रहा, जबकि गरीब और गरीब होता जा रहा है। पहले के समय में लोग कहते थे, दाल-रोटी खाओ, प्रभु के गुण गाओ। लेकिन आज के समय में गरीबों के नसीब में दाल भी कहाँ हैं? दाल के भाव भी तो 100-120 का आँकड़ा पार कर चुके हैं। ऐसे में एक गरीब इंसान कैसे दाल-रोटी खा सकता है?

कहते हैं कि प्रत्यक्ष को प्रमाण की जरुरत नहीं होती, इसका जीता-जगता उदाहरण, कुछ समय पहले प्रचलित हुआ गाना है- ‘सखी सैया तो खूब ही कमात है, महँगाई डायन खाए जात है’….. इस गाने को लिखने वाले लेखक ने जीवन के बड़े तज़ुर्बे हासिल करने के बाद इस गाने की एक-एक पंक्ति और एक-एक शब्द को भावनाओं के धागे में मोती के रूप में पिरोया है। आज की भाग-दौड़ भरी ज़िंदगी में लोगों को इतनी भी फुर्सत नहीं हैं कि वे अपने आस-पास हो रही घटनाओं पर ध्यान दे सकें। इसलिए इस गाने को लिखने वाले ने अप्रत्यक्ष रूप से लोगों तक गरीब की मजबूरी और व्यथा को संगीत के माध्यम से पहुँचाया है।

हर रोज हमारे आस-पास न जाने कितनी ही ऐसी घटनाएँ होती हैं, जिन्हें हम जाने-अनजाने ही नज़रअंदाज कर देते हैं। जाने कितने ही लोग भूख में बेबस होकर काल के गाल में समा जाते हैं, और इस गंभीर विषय पर किसी का ध्यान भी नहीं जाता। हाँ, सांत्वना देने भले ही फिर भीड़ में सबसे आगे आकर खड़े हो जाते हैं। लेकिन, उन भूख से तड़पते लोगों को खाने के लिए एक निवाला देने कोई आगे नहीं आता। मैं कहता हूँ 140 करोड़ की आबादी वाले देश में हर व्यक्ति अपनी थाली में से यदि एक निवाला भी किसी भूखे के लिए निकालने लगेगा न, तो देश में कोई भी गरीब भूखे पेट सोने को मजबूर न होगा।

अभी कुछ दिनों पहले एक पेंटिंग बड़ी महँगी बिकने की वजह से चर्चा में थी, जिसमें नन्हें-मुन्ने दो भाइयों की बेबसी को बड़ी ही खूबसूरती से दुनिया भर के रंगों में बिखेरा गया था।

उस पेंटिंग को बनाने वाले ने उन बच्चों के दर्द को बिल्कुल जीवंत करते हुए अपनी कला का प्रदर्शन किया था, जो लोगों का ध्यान बर्बस ही अपनी और खींच रही थी। लोग उस पेंटिंग को देखकर बड़े भावुक हो रहे थे। उनका कहना था कि कितना दर्द है दोनों बच्चों की आँखों में.. सबने उस पेंटिंग की सराहना की, लेकिन किसी ने भी उस पेंटिंग के पीछे की कहानी को जानने की कोशिश नहीं की।

दरअसल, इस पेंटिंग को कलाकार ने फुटपाथ पर रहने वाले दो गरीब बच्चों को देखकर बनाया था, जो अपनी माँ के काम से वापस आने के इंतजार में भूख से बिलख रहे थे। उस एक-डेढ़ वर्ष के बच्चे को नहीं पता मजबूरी क्या होती है, लेकिन उसके 5-6 वर्ष के भाई को बखूबी पता था। इसलिए खुद भी भूख से तड़पने के बावजूद वह अपने छोटे भाई को गोद में लिए यह दिलासा दे रहा था कि माँ जल्द ही खाने को कुछ लेकर आएँगी।

मैंने जब उस पेंटिंग को अखबार में देखा तब मुझे समझ आया कि क्यों पुराने लोग कहा करते थे, “भूख में जहरीली रोटी भी मीठी लगती है”। भूख से तड़पते बच्चों को कहाँ खबर रहती है जहर और अमृत की, उन्हें तो बस अपनी भूख की आग बुझाने के लिए रोटी चाहिए होती है।

इन्हीं सब बातों के जंजाल में उलझे हुए मुझे ख्याल आया कि जब से हम भारतीय लोगों ने पाश्चात्य सभ्यता को अपनाया है, तब से देश में यह भुखमरी नाम के राक्षस का जन्म हुआ है। जो लोग गाँव से जुड़े होंगे, उन्होंने देखा होगा कि आज से कुछ समय पहले गाँव-देहात में शादी-ब्याह जैसे बड़े कार्यक्रमों में खाना खाने के लिए जमीन पर टाट-पट्टी बिछाकर पत्तों से बनी थाली (पत्तल) में लोगों को भोजन कराया जाता था। इसे सम्मान का भोजन कहा जाता था, क्योंकि लोग इत्मीनान से बैठकर भरपेट भोजन करते थे और थाली में जूठा न छोड़ने की परंपरा को निभाते थे। उस समय ये बड़े-बड़े होटलों और मैरिज हॉल का चलन कहाँ था?

धीरे-धीरे समय बदलता गया और लोग पाश्चत्य संस्कृति को अपनाने लगे। आज आलम यह है कि भारतीय लोगों के तौर-तरीके, पहनावा-ओढावा, खाना-पीना सब विदेशी हो चुके हैं। अब शादी-ब्याह में लोग साजो-सज्जा में लाखों-करोड़ों रुपए खर्च कर देते हैं। इन आलीशान शादी-समारोहों में पचासों तहर की मिठाइयाँ और अनगिनत व्यंजनों की प्रदर्शनी लगी होती है, जहाँ लोग थाली भर-भर कर व्यंजन परोस तो लेते है, लेकिन पसंद न आने पर उसे कूड़ेदान में डालने में तनिक भी देर नहीं करते हैं। मुझे नहीं लगता इन समारोहों में आने वाला एक भी व्यक्ति इन सभी व्यंजनों का स्वाद ले पाता होगा।

हमारे देश में विडंबना यही है कि यहाँ लोग दिखावा करने में लगे हैं। किसने कितनी महँगी शादी की, किसकी शादी में ज्यादा व्यंजन थे? दिखावे की इस दौड़ में लोग यह भूल जाते हैं कि अधिकता हर चीज की बुरी होती है और जरुरत से ज्यादा बनवाया गया भोजन भी व्यर्थ ही जाता है।

मुझे लगता है जितना पैसा लोग दिखावे के लिए साजो-सज्जा में खर्च करते हैं, उतने पैसों का भोजन बनवाकर यदि गरीबों को खिलाया जाए तो देश से शायद भुखमरी जैसे राक्षस का सर्वनाश किया जा सकता है। उनकी दुआएँ लगेंगी, सो अलग। और हम सभी जानते हैं कि जहाँ दवा काम नहीं करती, वहाँ दुआ काम करती है। हम सभी को पाश्चात्य सभ्यता को भूलकर भारतीय सभ्यता के तौर-तरीके फिर से अपनाने चाहिए। व्यंजनों की प्रदर्शनी वाले भोजन के तरीके की जगह टेबल-कुर्सी पर बैठकर कराए जाने वाले तरीके को अपनाना चाहिए, ताकि लोग भर-पेट भोजन भी कर सकें और खाना व्यर्थ भी न हो। लोग इस विधि को अपनाकर ‘एक पंथ दो काज’ जैसी कहावतों को सार्थक बना सकते हैं।

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