एक समय था जब स्वयं को गरीब बताना हीन भावना को जन्म देता था, लेकिन अब स्वयं को गरीब दर्शाना फायदेमंद हो गया है…. स्वतंत्रता के बाद देश में जातिगत भेदभाव और गरीबी से उत्थान के लिए छात्रवृत्ति, अनुदान और विभिन्न योजनाओं इत्यादि के माध्यम से आर्थिक सहायता प्रदान करने के लिए सरकार ने विभिन्न योजनाएँ लागू कीं, ताकि पिछड़े...
Continue reading...बेरोजगारी की गर्त में जा रहे हैं युवा, तो फिर सरकारी नौकरियाँ कौन ले रहा..??
सरकार तो पर्याप्त नौकरियाँ दे रही है, लेकिन आज के युवा उन नौकरियों को पाने के लिए बनाए गए मापदंडों को पार कर पाने में सक्षम ही नहीं हैं बेरोजगारी एक ऐसा विषय बन गया है, जिसकी चर्चा बरसों से ज्यों की त्यों बनी रहती है, कम होने के बजाए उल्टा यह दिन-ब-दिन बढ़ती ही चली जाती है। आज के...
Continue reading...समाज के लिए नुकसानदेह 50 वर्ष से अधिक उम्र के कैदियों के पुनर्वास और कल्याण की नज़रअंदाजगी
एनसीआरबी के आँकड़ों के अनुसार भारतीय जेलों में 50 वर्ष से अधिक उम्र के 73 हजार से ज्यादा कैदी हैं। ऐसे कैदियों की स्थिति और उनकी रिहाई के बाद का जीवन एक महत्वपूर्ण मुद्दा है, जिस पर जेल प्रशासन और केंद्र सरकार को विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। आज के समय में, जब भारत सामाजिक न्याय और समावेशी विकास...
Continue reading...आपके मायने में आशियाने की परिभाषा क्या?
अपना काम बनता,भाड़ में जाए जनता….. शाम का समय, गोधूलि बेला में घर की बालकनी में बैठकर चाय की चुस्कियाँ लेने का जो आनंद है, उसे शब्दों में बयाँ कर पाना मुश्किल है। मेरा पेड़-पौधों और खुले वातावरण से विशेष लगाव है, इसलिए मैं अक्सर शाम का समय घर की बालकनी में ही बिताता हूँ। एक शाम मैं बालकनी में...
Continue reading...सड़कें न हो गरीबों का घर……
हमारे शहरों के हर कोने में, जहाँ पर जीवन एक अलग लय में बहता है और जहाँ सपनों को उड़ने के लिए पंख मिलते हैं, इसके पीछे एक कड़वी हकीकत छिपी है, जिसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। शहरी गरीब, जो शहर को जीवित रखने के लिए कड़ी मेहनत करते हैं, उन्हें जीवन की बुनियादी जरूरतों के बिना खुद...
Continue reading...किसने बनाए हैं ‘जूठन’ और ‘उतरन’ जैसे शब्द?
लम्बे समय की सेविंग के बाद पिछले महीने ही अपने लिए इतना महँगा शर्ट खरीदा था, इतनी जल्दी यह मुझे छोटा होने लगा है, एक काम करता हूँ किसी को दे देता हूँ.. आज फिर माँ ने टिफिन में दो रोटी ज्यादा रख दी, यह फिर फेंकने में जाएगी, किसी को दे देता हूँ.. यह जो हमारे द्वारा अपने कपड़ों...
Continue reading...तोड़ देगी भारत को गरीबी एक दिन
विभिन्न देशों की स्थिति-परिस्थिति यानि आर्थिक स्थिति को देखते हुए, उन्हें दो हिस्सों में विभाजित किया जाता है: एक विकसित और एक विकासशील। निम्न और मध्यम आय वाली अर्थव्यवस्थाओं को आमतौर पर विकासशील देश कहा जाता है, वहीं, उच्च मध्यम आय और उच्च आय वाली अर्थव्यवस्थाओं को विकसित देश कहा जाता है। यह तो हुआ किताबी ज्ञान। मेरे मायने इस...
Continue reading...भ्रष्टाचार और पेपर लीक की आग की लपटों में झुलसते छात्र
भारत की शिक्षा प्रणाली एक भयानक तूफान के चपेट में आ बैठी है। एक ऐसा तूफान, जो धूल-मिट्टी के रूप में अपने साथ भ्रष्टाचार और पेपर लीक का बवंडर साथ लिए चल रहा है। एक ऐसा तूफान, जो अनगिनत छात्रों की उम्मीदों और आकांक्षाओं को निगलता ही चला जा रहा है। इन तमाम सुर्खियों और जाँचों के पीछे एक गहरी...
Continue reading...आधी रात में केक काटने का चलन: उत्सव या दिखावा?
कुछ दिनों पहले ही मेरा जन्मदिन बीता, रात के 12 बजते ही अचानक से फोन बज उठा। जन्मदिन की बधाई देने के लिए परिचितों के मैसेज की जैसे कतार-सी लग गई, ऐसा लग रहा था मानों रात के 12 बजे का समय एकदम से विशेष बन गया हो। घर में भी हर कोई जाग रहा था, मेरी बिटिया हाथ में...
Continue reading...आजकल की शादियाँ दिखावा..?
देव उठने के साथ ही शादियों का सीज़न शुरू हो चुका है। इस सीज़न में जीवन की नई शुरुआत करने वाले नव दंपतियों को मेरी ओर से ढेर सारी शुभकामनाएँ…। आने वाले कुछ महीनों तक शहनाइयों की गूँज और शादियों की चमक-दमक बनी रहेगी। आप में से भी ऐसे कई लोग होंगे, जिनके घर शादी के न्यौते आ चुके होंगे...
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