2025

शिक्षक को समय-समय पर स्वयं को अपडेट करना क्यों है जरूरी?

कक्षा में छात्रों का मार्गदर्शन करता शिक्षक, आधुनिक शिक्षण और नैतिक शिक्षा का प्रतीक

शिक्षक कौन होता है? जो आपको अच्छी शिक्षा देता है, है न! सिर्फ ज्ञानी होना शिक्षक होना तो नहीं कहला सकता और फिर शिक्षकों का तो कर्तव्य ही होता है कि वे अपने छात्रों में उच्च नैतिकता और मजबूत चरित्र का विकास करें। यदि शिक्षक ऐसा करने में विफल रहते हैं, तो इसका मतलब है कि वे अपनी सामाजिक और...

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अंग्रेजी का बढ़ता प्रचलन, दूर कर रहा हमें मातृभाषा से

अंग्रेजी और हिंदी के बीच उलझा छात्र, मातृभाषा और शिक्षा व्यवस्था के संघर्ष को दर्शाता दृश्य

क्या मातृभाषा को अनदेखा करना सही है? बात शुरू करता हूँ अंग्रेजी के बढ़ते प्रचलन से। आज सभी अंग्रेजी के पीछे भाग रहे हैं। हमारे देश में अंग्रेजी का प्रचलन बढ़ता ही जा रहा है। आजकल शिक्षा व्यवस्था खासतौर पर अंग्रेजी विद्यालयों में हिंदी का कोई विशेष महत्व नहीं है। तो क्षेत्रीय भाषा की बात ही कौन करे? इसकी वजह...

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कहाँ गई वो जादू की पाठशाला?

प्रकृति की गोद में सीखते बच्चे, जो नई तालीम और जादू की पाठशाला की अवधारणा दर्शाते हैं

एक बच्चे के रूप में मेरा स्कूल बहुत अलग था। आज के बच्चे ऐसी शिक्षा और ऐसे बचपन से कोसों दूर हैं। चीज़ें पहचान से परे हो गई हैं। बूढ़े लोग अक्सर अतीत के बारे में बातें करते हैं। हमारे समय में ऐसा था वैसा था और न जाने क्या-क्या? लेकिन वे सही कहते हैं। आप पूछ सकते हैं कि...

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जो करना है आज ही करो, क्योंकि किसे पता कल हो न हो

सूर्योदय के समय खड़ा व्यक्ति जो जीवन की अनिश्चितता और आज में जीने का संदेश दर्शाता है

“पूरा दिन पड़ा है, शाम को करता हूँ”, “इतना भी क्या जरुरी है, बाद में हो जाएगा”, “जल्दी किस बात की है, अभी नहीं तो बाद में हो ही जाएगा”, कई बार यह बाद, बाद ही रह जाता है, क्योंकि आजकल समय का कोई भरोसा नहीं है। हम सभी अपने सपनों को पूरा करने की तलाश में होते हैं, लेकिन...

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फिर एक धमाका और तहस-नहस हुईं कई ज़िंदगियाँ

हरदा में पटाख़ा फैक्ट्री ब्लास्ट के बाद मलबे में तब्दील रिहायशी इलाके और राहत कार्य

जब किसी युद्ध से बम ब्लास्ट की खबर सामने आये तो ये मालूम ही रहता है कि कसूरवार और बेकसूरवार दोनों ही तरह के लोगों की जान जा सकती है लेकिन ये क्या! एक नया शोर अचानक कानों में सुनाई दे रहा है कि हरदा जैसे छोटे से जिले में पटाख़ा फैक्ट्री में ब्लास्ट हुआ। ब्लास्ट भी ऐसा कि 20...

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तालीम बढ़ रही है अदब घट रहे हैं, मसला मालूम नहीं अल्फाज़ रट रहे हैं

कौशल आधारित शिक्षा और रटंत शिक्षा के बीच अंतर दर्शाता दृश्य, जहाँ बच्चा स्वतंत्र सोच के साथ सीख रहा है

तिल्फ़ (नन्हा शिशु) में बू आए क्या माँ-बाप के अतवार की। दूध तो डिब्बे का है, तालीम है सरकार की।। उपरोक्त दोनों पंक्तियाँ वर्तमान समय की शिक्षा का विस्तार से वर्णन करती हैं, जिनका उपयोग प्रसिद्ध उर्दू कवि अकबर इलाहाबादी ने अपने उर्दू दोहे में किया है। इसका अर्थ यह है कि माता-पिता के संस्कार उनके बच्चों में नहीं दिखते,...

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आपके संस्कार ही आपकी पहचान हैं

“माता-पिता द्वारा बच्चों को अच्छे संस्कार सिखाते हुए, मोबाइल और सोशल मीडिया के प्रभाव से दूर पारिवारिक मूल्य समझाते हुए”

कैसे संस्कार हैं इसके? कैसे संस्कार दिए हैं माता-पिता ने? इत्यादि। जब भी हम किसी बच्चे को उद्दंडता करते देखते हैं या किसी भी व्यक्ति चाहे वह किसी भी उम्र का हो, को बुरा व्यवहार करते देखते हैं, तो पहला शब्द ही हमारे दिमाग में आता है ‘संस्कार’। कहते हैं बच्चों के संस्कार उनके खुद के जीवन की ही नहीं,...

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यह कैसा संस्कार?

आधुनिक परिवार में बच्चों के संस्कारों और माता-पिता की भूमिका को दर्शाता भावनात्मक दृश्य, जहाँ मोबाइल और व्यवहार का प्रभाव दिखता है

बच्चों को संस्कार देने से पहले, क्या हम हमारे संस्कारों पर खरे उतर रहे हैं? हम खुद में तो झाँके कि हम कितने संस्कारी हैं? संस्कारों पर बात पहले भी की जा चुकी है, आगे भी करते रहने की जरूरत रहेगी और तब तक रहेगी जब तक हम उस संस्कार के पेड़ के नीचे वापस न बैठ जाएँ। यह बड़े...

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नारा नहीं हैं, ‘राम’

राम नाम के वास्तविक अर्थ, मर्यादा और त्याग को दर्शाता भावनात्मक दृश्य, जहाँ नारे नहीं बल्कि मानवीय मूल्य प्रमुख हैं

“जबरदस्ती के ‘जय श्री राम’ में सब कुछ है, बस राम नहीं” जगविदित है अयोध्या में 22 जनवरी को राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा समारोह होने जा रहा है। शतकों के इंतज़ार के बाद यह दिन हमें देखने को मिल रहा है। लोग अपने-अपने अंदाज में अपने भाव व्यक्त कर रहे हैं। इसी बीच सोशल मीडिया पर श्रीराम को लेकर एक...

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समानता की दौड़ से परे नारी का अस्तित्व

समानता की दौड़ से परे नारी और पुरुष के पूरक अस्तित्व को दर्शाता प्रतीकात्मक दृश्य, जहाँ सम्मान और जिम्मेदारी साथ-साथ दिखती है

आज हमारा समाज महिलाओं और पुरुषों की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक समानता की वकालत कर रहा है। लेकिन यह निराशाजनक तथ्य है और मुझे इस विचारधारा से बहुत नफरत है। अब बेवजह तो कुछ भी नहीं होता, तो जाहिर है इसकी भी वजह होगी और है भी। इंसान का उसके जन्म के समय से ही जेंडर निर्धारित कर दिया जाता...

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