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क्या हम ‘अतिथि देवो भवः’ और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का असली अर्थ जान पाए हैं?

भारत में इंसान और मूक जानवरों के बीच करुणा और अतिथि भाव का दृश्य

क्या ‘अतिथि देवो भवः’ वाक्यांश में इंसानों की ही बात कही गई है, जानवरों की नहीं? समय के पहिए के घूमने के साथ संस्कृति और परम्पराओं में कई बदलाव देखने को मिले हैं। पहले के समय में घर के दरवाज़े पर कोई याचक आया करता था, तो उसे कभी-भी खाली हाथ नहीं लौटाया जाता था। अतिथि आया करता था, तो...

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दुनियादारी की होड़ में अब दया भी बिकाऊ

भारत में मासूम बच्चों की गरीबी और बिकती संवेदनाओं का विरोधाभास दर्शाता दृश्य

दो मासूम.. एक की उम्र लगभग 5 या 6 वर्ष.. और एक की मुश्किल से 1 वर्ष.. शरीर पर आधे-अधूरे कपड़े.. चेहरे पर बेबसी.. आँसूओं से लबालब भीगी हुईं आँखें.. एक नहीं, दोनों की.. कौड़ियों के दाम बिकता बचपन.. भूख की असहनीय पीड़ा.. तड़प रोटी की.. अपनी उम्र से लगभग 50 वर्ष अधिक जी लेने वाला वह 5 वर्षीय बच्चा...

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थाली से नाली तक का सफर

भारत में भोजन की बर्बादी और किसानों के श्रम के बीच का विरोधाभास दर्शाता दृश्य

शान दिखाना नहीं, बल्कि पेट भरना है भोजन का असली मतलब भारत, एक कृषि प्रधान देश है, जहाँ किसानों के श्रम और समर्पण से लाखों-करोड़ों लोगों को भर पेट भोजन मिलता है। सही मायने में किसान हमारे देश की रीढ़ हैं, जो अपने खून-पसीने से अपने जीवन के दिन-रात एक करके अन्न उगाते हैं। सिर्फ इसलिए, ताकि हम भूखे न...

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एक भूखी भूख..

भारत में भूख से जूझते मासूम बच्चों और इंसानी बेबसी को दर्शाता भावनात्मक दृश्य

जब भी जोरों की भूख लगती है और खाना बनने में तनिक भी देरी होती है, तो थाली-चम्मच पीटने की आवाज़ से पूरा घर गूँज उठता है, “मम्मी-मम्मी खाना दो..” और फिर क्या, कुछ ही देर में उस थाली में माँ रूपी फरिश्ता गर्म-गर्म खाना परोस देता है और इतना ही नहीं, बड़े ही प्रेम से अपने बच्चों और पूरे...

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छोटा-सा योगदान भी बड़े मायने रखता है…

भारत में छोटे सामाजिक प्रयास, शिक्षा और मानवीय योगदान से बदलाव को दर्शाता दृश्य

आज सुबह से ही हल्की-हल्की बारिश हो रही है, और हो भी क्यों न बरसात का मौसम जो चल रहा है। यह मौसम अक्सर लोगों को बड़ा पसंद होता है, क्योंकि इस समय धरती हरियाली की चादर ओढ़े, पेड़-पौधों पर आई नई पत्तियाँ खुशी से झूमती हुई, बरबस ही लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचती हैं। इस लुभावने मौसम और...

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गरीबी या मक्कारी?

भारत में गरीबी, मुफ्त सरकारी सहायता और आत्मनिर्भरता के बीच के विरोधाभास को दर्शाता दृश्य

गरीबी एक ऐसा शब्द है, जो सुनने में जितना साधारण लगता है, वास्तविकता में उतना ही भयावह और गंभीर है। यह एक ऐसी सामाजिक बुराई है, जिसने न केवल व्यक्ति विशेष बल्कि पूरे समाज, देश और यहाँ तक की वैश्विक स्तर पर मानवता को जकड़ रखा है। गरीबी को सही मायनों में एक अभिशाप कहा जाए, तो यह कोई अतिशयोक्ति...

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फायदेमंद गरीबी

सरकारी योजनाओं की कतार में खड़े लोग, असली और झूठी गरीबी के बीच के फर्क को दर्शाता दृश्य

एक समय था जब स्वयं को गरीब बताना हीन भावना को जन्म देता था, लेकिन अब स्वयं को गरीब दर्शाना फायदेमंद हो गया है…. स्वतंत्रता के बाद देश में जातिगत भेदभाव और गरीबी से उत्थान के लिए छात्रवृत्ति, अनुदान और विभिन्न योजनाओं इत्यादि के माध्यम से आर्थिक सहायता प्रदान करने के लिए सरकार ने विभिन्न योजनाएँ लागू कीं, ताकि पिछड़े...

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बेरोजगारी की गर्त में जा रहे हैं युवा, तो फिर सरकारी नौकरियाँ कौन ले रहा..??

बेरोजगारी पर बोलते युवा और सरकारी नौकरी की तैयारी करते उम्मीदवार, अवसर और योग्यता के अंतर को दर्शाता दृश्य

सरकार तो पर्याप्त नौकरियाँ दे रही है, लेकिन आज के युवा उन नौकरियों को पाने के लिए बनाए गए मापदंडों को पार कर पाने में सक्षम ही नहीं हैं बेरोजगारी एक ऐसा विषय बन गया है, जिसकी चर्चा बरसों से ज्यों की त्यों बनी रहती है, कम होने के बजाए उल्टा यह दिन-ब-दिन बढ़ती ही चली जाती है। आज के...

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आपके मायने में आशियाने की परिभाषा क्या?

बालकनी में गोरैया का घोंसला और शहर में उजड़ते गरीबों के घर, आशियाने की सच्ची परिभाषा दर्शाता दृश्य

अपना काम बनता,भाड़ में जाए जनता….. शाम का समय, गोधूलि बेला में घर की बालकनी में बैठकर चाय की चुस्कियाँ लेने का जो आनंद है, उसे शब्दों में बयाँ कर पाना मुश्किल है। मेरा पेड़-पौधों और खुले वातावरण से विशेष लगाव है, इसलिए मैं अक्सर शाम का समय घर की बालकनी में ही बिताता हूँ। एक शाम मैं बालकनी में...

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समाज के लिए नुकसानदेह 50 वर्ष से अधिक उम्र के कैदियों के पुनर्वास और कल्याण की नज़रअंदाजगी

भारतीय जेल में 50 वर्ष से अधिक उम्र के कैदी और रिहाई के बाद उनके पुनर्वास की चुनौती को दर्शाता दृश्य

एनसीआरबी के आँकड़ों के अनुसार भारतीय जेलों में 50 वर्ष से अधिक उम्र के 73 हजार से ज्यादा कैदी हैं। ऐसे कैदियों की स्थिति और उनकी रिहाई के बाद का जीवन एक महत्वपूर्ण मुद्दा है, जिस पर जेल प्रशासन और केंद्र सरकार को विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। आज के समय में, जब भारत सामाजिक न्याय और समावेशी विकास...

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