एक किसान की कहानी है। सूखे की वजह से बार-बार उसकी फसल नष्ट हो जाती थी। गाँव के लोग अक्सर उसे ताने दिया करते थे.. तू खेती करता है, इसलिए ही तेरे खेत में बार-बार सूखा पड़ता है। तू खेती छोड़ दे, भगवान तुझे नहीं देख रहा..
कई साल वही ताने सुनते-सुनते गुज़र गए.. हर साल वह बुआई करता.. खूब मेहनत करता.. फसलों की खूब देख-रेख करता और कहता, “मैं नहीं जानता कि बारिश कब होगी, लेकिन मैं यह जरूर जानता हूँ कि जैसे यह सूखा हार नहीं मान रहा, वैसे ही मैं भी हार नहीं मानूँगा।” सूखा आता और उसकी सारी फसल बर्बाद कर देता..
दोनों में से किसी एक की हार तो होनी ही थी, सो फिर क्या था.. हर बार किसान हारता था.. इस बार सूखा हार गया.. कारण कि एक दिन खूब बारिश हुई। खेत लहलहा उठे। अबकी बार गाँव के लोग कहते हैं, “भाग्य ने खूब साथ दिया, तू तो बड़ा किस्मत वाला है, जो पूरे गाँव में तेरी फसल सबसे अधिक हुई।” तो कोई कहता, “किस्मत वाला है, वरना इतने सालों तक सूखे में कोई नहीं टिक पाता।”
लेकिन, सच्चाई यह थी कि उसने अपने मन को हारने नहीं दिया था। यही जीवन का सार है। यदि हम हालातों के ठीक होने का इंतज़ार करेंगे, तो शायद सारी उम्र हार के अंधेरे में बैठे रहेंगे। लेकिन, यदि हम अपने मन को मजबूत कर लें, तो कोई भी चुनौती हमें तोड़ नहीं सकती।
हर तरफ चर्चा हो रही थी उस किसान की, जो बरसों तक सूखे से जूझता रहा और अबकी बार पूरे गाँव में उसकी फसल सबसे अधिक हुई थी। समय का फेर देखो, जो लोग कल तक उसे ताने देते थे, आज वही उसकी तारीफ कर रहे थे। गाँव के लोग अब जब भी उसे देखते, उसकी सफलता पर चर्चा करते, लेकिन कोई भी उसकी वर्षों की मेहनत को नहीं गिनता। बारिश ने खेतों को हरा-भरा बना दिया, लेकिन उस किसान के हौंसलों की जड़ें उससे कहीं अधिक गहरी थीं।
लोगों को लगता कि भाग्य ने उसका साथ दिया, लेकिन वे यह नहीं देख पाए कि कितनी बार उसने खेत जोते, बीज डाले और फिर सब कुछ उसी मिट्टी में मिलते देखा। हर बार फसल के नष्ट होने पर उसकी आँखों में आँसू आते, लेकिन उसने कभी उम्मीद को सूखने नहीं दिया।
अबकी बार जब गाँव के बड़े-बुजुर्गों ने उसे बुलाया और उसकी सफलता की तारीफ की, तो वह सिर्फ मुस्कुरा दिया। किसी ने पूछा, “तूने हार मानने की नहीं सोची?”
किसान ने जवाब दिया, “हार मान लेने से सूखा तो खत्म नहीं होता। और यदि मैंने किस्मत मानकर इसे छोड़ दिया होता, तो शायद यह बारिश भी मेरे किसी काम की नहीं होती। मैं नहीं जानता था कि बारिश कब होगी, लेकिन मैं यह जरूर जानता था कि इस ढीठ सूखे की तरह ही मैं भी हार नहीं मानूँगा।”
उसकी बात सुनकर गाँव के कई नौजवानों ने सोचा, “क्या सच में हिम्मत हारने से ही लोग हारते हैं?” गाँव के लोगों की सोच बदलने लगी। अब किसान की कहानी सिर्फ उसकी नहीं रह गई थी। यह पूरे गाँव के लिए एक सीख बन गई थी।
जो नौजवान खेती छोड़कर शहर जाने की सोच रहे थे, वे अब रुक गए। उन्हें एहसास हुआ कि मेहनत से हालात बदले जा सकते हैं। कुछ और किसानों ने नई तकनीकों को अपनाने और अपनी ज़मीन को बेहतर बनाने का संकल्प लिया। जो कल तक उसे ताने देते थे, वे अब उससे खेती के गुर सीखने लगे।
गाँव में अब एक नई उम्मीद-सी जागने लगी थी। किसान ने यह साबित कर दिया था कि हार वह नहीं होती, जो आँखों से दिखाई देती है, हार वह होती है, जो मन में बैठ जाती है।
वर्षों तक लगातार उसने खेत जोते, बीज डाले और फिर फसल बर्बाद होती देखी। जब पहली बार उसकी फसल नष्ट हुई, तो उसने मिट्टी को और गहराई से समझना शुरू किया। दूसरी बार पानी का सही प्रबंधन सीखा। तीसरी बार बीजों की गुणवत्ता पर ध्यान दिया। हर असफलता उसे कुछ नया सिखाती रही। यहाँ उसने सीखा कि सिर्फ मेहनत करना ही काफी नहीं, समझदारी से मेहनत करना जरूरी है।
धीरे-धीरे उसकी फसल बेहतर होने लगी। और फिर वह दिन भी आया, जब बारिश ने खेतों को लहलहा दिया, और फिर क्या था, उसकी मेहनत बहुत ही सुंदर रंग लाई। गाँव के लोगों ने भले ही इस सफलता को किसान की किस्मत करार दिया। लेकिन, किसान जानता था कि यह सिर्फ भाग्य नहीं था, यह उसकी वर्षों की मेहनत का नतीजा था।
सबसे बड़ा युद्ध बाहर नहीं, भीतर लड़ा जाता है। यदि मन हार जाए, तो दुनिया की कोई ताकत तुम्हें जीत नहीं दिला सकती। लेकिन, यदि मन अडिग रहे, तो बड़े से बड़ा तूफान भी तुम्हारा रास्ता नहीं रोक सकता। उसने साबित कर दिया कि सिर्फ किस्मत के भरोसे रहने वाले ही असफलता का रोना रोते हैं। जो मेहनत करते हैं, उनके लिए किस्मत भी एक दिन झुक जाती है। उसकी हिम्मत की यह मिसाल पूरे गाँव के दिल को छू गई। किसान की कहानी किसी एक व्यक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जीवन की सच्चाई है।
हर इंसान के जीवन में संघर्ष आते हैं। कोई खेती में हारता है, कोई व्यापार में, कोई रिश्तों में, तो कोई सपनों की दौड़ में। लेकिन, असली हार तब होती है, जब इंसान मन से हार जाता है, कोशिश करना छोड़ देता है और खुद को कमजोर समझकर जीवन की रेस से खुद को कोसों दूर कर लेता है। यदि जीतने की ठानी है, तो फिर आपको कोई नहीं हरा सकता।
कितनी बार हम भी अपनी तकलीफों के आगे घुटने टेक देते हैं। कितनी ही बार हम सोचते हैं कि अब आगे कुछ नहीं बचा। हमारी तकलीफें हमारे मन से बड़ी नहीं हो सकतीं। सोचिए, यदि सूरज रात के अंधेरे को देखकर हार मान ले, तो क्या सुबह होगी? यदि बीज मिट्टी में दबकर यह सोच ले कि अब उसका अंत हो गया, तो क्या वह कभी वृक्ष बन पाएगा? फर्क सिर्फ इतना है कि कुछ लोग हालातों से हार मान लेते हैं, और कुछ लोग हालातों को अपनी जीत की सीढ़ी बना लेते हैं।
कल्पना कीजिए, यदि अभिमन्यु चक्रव्यूह में फंसकर कहता कि “मैं नहीं लड़ सकता”, तो क्या उसकी वीरता की कहानियाँ अमर होतीं? हम सबके जीवन में कभी न कभी ऐसा समय आता है, जब सब कुछ बिखरता हुआ-सा लगता है। लेकिन, यही वह पल होता है, जब हमें तय करना होता है कि हम इस दर्द को अपनी कब्र बनाएँगे या अपनी मजबूती का आधार?
यदि किसान भी यह सोचकर बैठ जाता कि इतने लोग गलत थोड़ी न कहेंगे, मुझे खेती-किसानी छोड़ देना चाहिए या फिर सूखा कभी खत्म नहीं होगा और बारिश कभी नहीं आएगी, तो शायद वह कभी सफल नहीं होता। लेकिन उसने हार नहीं मानी। इसलिए, इस मूलमंत्र को हमें भी अपने जीवन में उतारने की जरुरत है कि “मन के हारे हार है, मन के जीते जीत..”