गर्मियों की रातों में छत पर बिछी चारपाइयाँ, खुले आसमान के नीचे सोते हुए तारों को गिनने का खेल, दादी-नानी की कहानियाँ और मिट्टी की सौंधी-सी महक.. क्या आपको याद हैं वो दिन? वो दिन.. जब मकान कच्चे होते थे, लेकिन दिल पक्के। रिश्तों में अपनापन था, मोहल्ले भर में हर किसी को अपना माना जाता था, और जीवन में सादगी के साथ एक अनकही मिठास थी। अब तो न ही कोई मेल-मिलाप है और न ही घर के आँगन में दादी माँ की कहानियाँ सुनाई देती हैं। देंगी भी कहाँ से? जीवन की दौड़ और कमाई की होड़ में परिवार के लोग अब तितर-बितर जो हो चुके हैं।
कभी गाँव-देहात में कदम रखते ही कच्चे मकानों की खूबसूरत मिट्टी की दीवारें, उन पर बनाई गईं सुंदर आकृतियाँ, आँगन में गेरू और खड़िया की खूबसूरत रंगोली और तुलसी का चौरा हमारी संस्कृति की विशेष पहचान हुआ करते थे। घरों में ज्यादा सामान भले ही न हो, लेकिन दिलों में अपनापन भरपूर था। आज़ादी से घूमते बच्चे, पेड़ों पर लगे झूले, दरवाजे पर बिना किसी रोक-टोक के आते मेहमान.. यह सब काफी आम हुआ करता था। लेकिन, समय के साथ-साथ यह तस्वीर भी बदल गई। अब मकान तो पक्के हो गए, मगर रिश्तों की दीवारें कच्ची पड़ गईं।
याद है.. जब हम रात में छत पर सोया करते थे? तारों की चादर के नीचे पूरा परिवार एक साथ लेटा रहता था। बातों-बातों में कब नींद लग जाती थी, पता भी नहीं चलता था। उन छोटे और कच्चे घरों की छतें इतनी बड़ी हुआ करती थीं कि हर रात जब पूरे परिवार के लिए बिस्तर लगते थे, तो ऐसा लगता था मानो पूरी दुनिया एक हो गई हो। लगता था जैसे पूरा आसमान हमारा है। मुँह से कोई गुड नाइट नहीं बोलता था, लेकिन वास्तव में हर नाइट गुड हुआ करती थी। आज के हमारे बड़े-बड़े मकानों में तो पूरे समय सिर्फ सन्नाटा पसरा पड़ा रहता है। हर कोई अपने कमरे में बंद है, और अब तो ‘गुड नाइट’ का मतलब अब सिर्फ एक मैसेज भेजना भर रह गया है, बिल्कुल बेमन से की गई किसी फॉर्मेलिटी की तरह..
हर घर में एक बड़ा-सा आँगन हुआ करता था, जहाँ हर सुबह तुलसी की पूजा होती थी, दोपहर में सिलबट्टे पर मसालें पीसे जाते थे, और शाम को पूरा परिवार वहीं बैठकर गपशप करता था। वह आँगन सिर्फ चार दीवारों से घिरा कोई खुला स्थान नहीं था, बल्कि रिश्तों का संगम भी था। वहीं बैठकर घर के बड़े-बुजुर्ग धूप सेंकते थे और बच्चे मिट्टी में खेलते थे.. काम-काज की सारी बातें भी तो उसी आँगन में हुआ करती थीं.. पक्के मकानों में आँगन को तो कुत्ते बाँधने और शू रेक का स्थान खा गया है।
चारपाई पर बैठकर परिवार के साथ बिताए वो सुनहरे पल अब सिर्फ यादों में ही तो रह गए हैं। उन चारपाइयों की जगह अब सोफे और डबल बैड ने ले ली है, बेशक बैठते ही थकान कुछ हद तक उतरना शुरू हो जाती है, लेकिन इन नई चीजों ने दिलों की दूरियाँ काफी बढ़ा दी हैं। इनमें वह बात कहाँ, जो चारपाई में हुआ करती थी।
पहले हर दरवाजा खुला रहता था, जिसे देख कोई भी राहगीर आकर कुछ देर आराम करने के उद्देश्य से बैठ जाया करता था। यहाँ तक कि जानवरों को भी आँगन तक टहलने की स्वतंत्रता थी। लोग अपने मोहल्ले ही नहीं, पूरे गाँव की परेशानियों से वाकिफ रहते थे.. यह वह दौर था, जब घर नहीं, बल्कि पूरा मोहल्ला ही परिवार हुआ करता था। सुख और दुःख में एक-दूसरे के ऐसे साथ खड़े रहते थे, जैसे परिवार के सदस्य.. अब बड़े-बड़े फ्लैट्स में रहने वाले लोग एक-दूसरे से मिलते तक नहीं। घरों के दरवाजे तो बस तीज-त्यौहार पर खुलते हैं.. वरना तो बिना ताले के हमेशा बंद ही मिलते हैं.. लोग अपने ही पड़ोसियों के सुख-दुःख से अनजान हैं। आज पड़ोसी कौन है, ये भी कई लोगों को नहीं पता होता। मेहमान भी तो अब नहीं आते, कभी आ भी जाएँ, तो आकर खुद को असहज ही महसूस करते हैं। अब तो लोग परिवार के सदस्यों के ही सुख-दुःख में शामिल नहीं होते, तो मैं भी कहाँ पड़ोसियों की खबर रखने की बात कर रहा हूँ..
मोहल्ले में किसी के घर शादी हो, तीज-त्यौहार आए या कोई नया मेहमान पहुँचे, सब एक-दूसरे के घर जाने के लिए उतने ही एक्टिव रहा करते थे, जितने कि आज के समय में व्हाट्सएप का नोटिफिकेशन आते ही हो जाते हैं। मिट्टी के चूल्हे पर रोटियाँ सेंकने की खुशबू अब पक्के मकानों में कहाँ आती है? भोजन पकाते समय माँ और बुआ के आपस में हँसी-मजाक की आवाज़ मुझे आज भी याद है.. आज के मॉड्यूलर किचन और इलेक्ट्रिक चिमनियों में वह बात कहाँ, जो पहले की रसोई में हुआ करती थी? अब तो गैस पर झटपट बना खाना, माइक्रोवेव में पकी हुईं रोटियाँ और डिब्बाबंद मसालें मिलते हैं। न तो स्वाद पहले की तरह है और न ही अपनापन.. भोजन तो जैसे सिर्फ पेट भरने का ज़रिया बन कर रह गया है, जो किसी भी फास्ट फूड की तरह झटपट बना लिया जाता है।
पहले के घरों की दीवारें भले ही कच्ची होती थीं, लेकिन उनमें बसने वाले रिश्ते पक्के थे। बीमार कोई एक होता था और फिक्र सबको होती थी.. दोस्ती में सच्चाई थी.. रिश्तों में अपनापन था.. और जीवन में ठहराव था। लोग भले ही साधनहीन थे, लेकिन दिल के अमीर थे। आज, पक्के मकानों में कच्चे दिलों के लोग रहते हैं। रिश्ते टूटने की कगार पर हैं, और गाँवों में छूट गईं उन कच्चे मकानों की यादें भी धुँधली हो चली हैं।
आज जब हम पक्के मकानों में रहने लगे हैं, तो हमें लगता है कि हमने हर सुविधा को अपनी मुट्ठी में कर लिया है। लेकिन, क्या वाकई हम पहले से ज्यादा सुखी हैं? आज भले ही हमारे मकान ऊँची-ऊँची इमारतों में बदल गए हैं, दीवारों पर महँगे रंग-रोगन चढ़ गए हैं, लेकिन दिलों की वह गर्माहट कहीं खो गई है। उन कच्चे मकानों की यादें आज भी दिल में एक टीस छोड़ जाती हैं। हमने भौतिक चीजें तो पा लीं, लेकिन अपने जड़ों से कट गए। कच्चे घरों के साथ हमने अपनी संस्कृति, अपनी परंपराएँ और अपनी सादगी भी खो दी।
माना कि समय बदलता है, सुविधाएँ बढ़ती हैं और जीवनशैली भी बदलती है, लेकिन इस बदलाव में यदि हम अपनी जड़ों को ही खो देंगे, तो यकीन मानिए, वह दिन दूर नहीं, जब हम एक पूरी की पूरी संस्कृति को ही उजाड़ देंगे। अभी-भी समय है कि हम रिश्तों की गर्माहट को वापस लाएँ.. माना कि व्यस्तता है, माना कि हम सभी अब एकल परिवारों में रहने लगे हैं, लेकिन कम से कम त्यौहार तो मिल-जुलकर मना ही सकते हैं.. दिल और घर से दरवाजे अपनों के लिए खुले रखें, अपनों के साथ समय बिताएँ.. फिर से छतों पर जाकर तारों से बातें करें, और फिर से रसोई में माँ-बुआ की हँसी गूँजने दें। मकान चाहे पक्के हों या कच्चे, असली खूबसूरती तो उसमें रहने वालों की मोहब्बत और अपनेपन में ही होती है।