कुछ दिन पहले एक शादी समारोह में जाना हुआ, वहाँ की चकाचौंध देखते ही बनती थी। समारोह की रौनक देखकर ही पता चल रहा था कि काफी खर्च किया गया है। जब खाने की तरफ बढ़ा, तो देखा वहाँ खाने की कई वैरायटीज़ थी। मेन कोर्स अलग और बाकी स्टॉल्स अलग। वहाँ देखता क्या हूँ कि लोग हर व्यंजन को लेने के लिए तो उत्सुक थे, लेकिन उसे पूरा खाने के लिए नहीं। यहाँ तक कि कई लोग तो ऐसे भी थे कि कोई डिश बड़े ही चाव के साथ ली, एक चम्मच चखी और पूरी की पूरी प्लेट ऐसे ही फेंक दी। कोई छोटा बच्चा ऐसा करता, तो उसे समझाया भी जाता, लेकिन जब बड़े ही ऐसा करें, तो क्या कहा जाए। यह देखकर मन बहुत विचलित हुआ।
आज-कल शादी-ब्याह जैसे समारोहों में ये नज़ारे बहुत आम हैं। जरुरत से ज्यादा खाना और उस खाने की बर्बादी। हम भी किसी शादी में मेहमान बनकर जाते समय और खाने की बर्बादी करते समय यह तक नहीं सोचते हैं कि किसी पिता ने अपनी जिंदगी की पूरी कमाई, इस शादी में लगा दी होगी। उसने अपनी कितनी इच्छाएँ मार के पैसा जोड़ा होगा और तब जाकर हमें ये विभिन्न प्रकार के व्यंजन परोसे होंगे।
हमारी निर्ममता की हद तो यह है कि हम मेहमान बनकर पहले तो शादी में जाते हैं, खाने का नुकसान करते हैं और फिर उसी शादी में खाने और बाकी चीजों की कमियाँ निकालते हैं। बिना यह सोचे कि इतना सब जुटाने में किसी पिता की कितनी मेहनत और पैसा लगा होगा। न ही खाना फेंकते समय हम उस किसान के बारे में सोचते हैं, जिसने कड़ी मेहनत से यह अनाज उगाया होगा, जो आज हमारी थाली में है और जिसे हम इतनी निर्दयता से फेंक रहे हैं। अन्न का महत्व समझना है, तो किसी भूखे को जूठन से खाना उठाकर खाते देखो। किस तरह वह खाना देखकर उसकी तरफ दौड़ पड़ता है। उसकी भूख उसे इस बात की परवाह नहीं करने देती कि यह भोजन तो किसी की जूठन है। उसे तो बस खाने से मतलब होता है, और एक हम हैं, जिसके पास भरपेट और मन लायक खाने के लिए पर्याप्त अन्न है, फिर भी हम अन्न की महत्वता को समझ नहीं पा रहे हैं।
समाज के नागरिक होने के नाते क्या हम इतना भी नहीं कर सकते कि हमारी थाली में जो अन्न आया है, उसका सम्मान करें और उसे व्यर्थ जाने से रोकें, ताकि जो जरूरतमंद हैं एवं जिन्हें एक समय का भोजन भी मुश्किल से ही मिलता है, यह उन लोगों तक पहुँच पाए। शादी-ब्याह जैसे समारोहों में जितना जरुरी हो, उतना ही खाना बनवाएँ और उतना ही अपनी थाली में लें, या बचे खाने के लिए ऐसी कोई व्यवस्था करें कि बचा हुआ खाना डस्टबिन में जाने के बजाए जरुरतमंद लोगों तक पहुँच सके।
कृषि और ऋषि प्रधान इस देश में यदि हम ही अन्न का महत्व नहीं समझेंगे, तो फिर कौन समझेगा। हमारी प्राचीन संस्कृति में तो अन्न को साक्षात ईश्वर मानते हुए ‘अन्नम् वै ब्रह्म’ लिखा गया है। वैदिक संस्कृति में भोजन मंत्र का प्रावधान है, जिसका सामूहिक रूप से पाठ कर भोजन ग्रहण किया जाता है। हमारे यहाँ भोजन के दौरान ‘सहनौ भुनक्तु’ कहा जाता है, इसके पीछे भावना यह है कि मेरे साथ और मेरे बाद वाला भूखा न रहे। क्या हम फिर से इसी भावना को जाग्रत नहीं कर सकते.. बिल्कुल कर सकते हैं, तो अगली बार खाना लेते समय इस बात का ध्यान रखें कि उतना ही लें थाली में, व्यर्थ न जाए नाली में..