एक समय था जब घरों में खामोशी इबादत की तरह होती थी, लेकिन अब तो खामोशी भी बेहद डरावना रूप ले चुकी है। एक समय वह भी था जब रिश्ते धीरे-धीरे परिपक्व होते थे, अब तो इंस्टेंट कॉफी की तरह बनने और टूटने लगे हैं।
यह एक ऐसा कड़वा सच है, जिसके दलदल में नई पीढ़ी धीरे-धीरे फँसती चली जा रही है। और तो और इसका असर हमारी पीढ़ी पर भी दिखने लगा है। हम सब उस दिशा में बढ़ रहे हैं, जहाँ सब कुछ है, सिर्फ अपनापन नहीं।
आजकल की दोस्ती, प्यार, शादी.. सब कुछ जैसे एक शोर बनकर रह गया है। रिश्तों में संवाद कम, शक ज्यादा हावी हो गया है। साथ होना अब साझेदारी नहीं, एक कॉम्पिटिशन बन गया है.. रिश्ते में शामिल लोग इसी ताक में बैठे रहते हैं कि कौन पहले थक कर साथ छोड़ेगा।
हर रिश्ता जैसे कोर्टरूम बन गया है, जहाँ हर बात का जवाब सबूत के साथ माँगा जाता है। “तुम्हें क्यों पसंद किया?”, “किससे बात कर रहे थे?”, “कहाँ थे?”, और जवाब न मिले तो, “मैं तुम्हें छोड़ दूँगा”, “किसी और को पा लूँगी”, “तलाक ले लेंगे” और भी न जाने क्या-क्या। इस तरह की कटु और दिल को छलनी करने वाली भाषा अब गुस्से की नहीं रही, यह आदत की बन गई है।
सोशल मीडिया ने भी इस आग में घी डालने का कुछ कम काम नहीं किया है। पुराने ज़माने की “दूसरों की खिचड़ी में घी ज्यादा दिखना” कहावत भी इस नए ज़माने में आकर सच हुई है। दूसरे के जीवन से लोग जलते हैं और दूसरों के जीवन को देखकर लोग सोचते हैं कि आखिर सामने वाला इतना खुश क्यों है? लेकिन, पूछना तो दूर, यह कोई नहीं सोचता कि क्या वह सच में खुश है?
हालात ये हैं कि इंस्टाग्राम की रील्स और फोटोज़ में चेहरों पर स्माइल होती है, लेकिन असल ज़िंदगी में साइलेंस। ज़िंदगी अब जीने की नहीं, दिखाने की चीज़ बन गई है। कभी-कभी तो लगता है कि नई पीढ़ी अपना वजूद भूलकर बस दूसरों को यह साबित करने में लग गई है कि “मैं भी कुछ हूँ”, “मेरे पास भी सब कुछ है।”
लेकिन, हकीकत यह है कि जितनी ताकत रिश्तों में ‘सुनने’ की होती है, उतनी ‘सुनवाने’ में नहीं। आज की पीढ़ी सब कुछ जल्दी चाहती है.. सफलता भी, प्यार भी, पहचान भी और समस्या का हल भी। मेरे मायने में तो नई पीढ़ी इतनी जल्दबाजी में है कि प्यार का असली अर्थ तक समझ नहीं सकी है। उन्हें कोई बताए कि प्यार तो सब्र का दूसरा नाम होता है, प्यार में तो रुकना होता है, सुनना होता है, सहना होता है। लेकिन, अपने आप को मॉडर्न कहने वाली इस पीढ़ी में सब आज कमजोरी मान लिए गए हैं।
पहले के रिश्तों में छोटी-मोटी अनबन से लेकर बड़ी से बड़ी लड़ाई के बाद भी एक थाली में खाना खाया जाता था, आज हालात ये हैं कि लड़ाई के बाद तो सीधे ब्लॉक ही कर दिया जाता है। कहने का अर्थ है कि बुरा लगना या मन का न होना आज किसी रिश्ते से भी ऊपर जा बैठा है। पहले कहा जाता था, “चलो बैठकर बात करते हैं और जो भी मसला है, उसे सुलझा लेते हैं”, अब कहा जाता है, “न बात करनी है, न सुननी है।” हाथ में मोबाइल और सेटिंग में जाकर सीधा ब्लॉक.. उसके बाद तू कौन और मैं कौन?
सवाल यह नहीं है कि नई पीढ़ी कहाँ जा रही है, सवाल तो यह है कि नई पीढ़ी किस दिशा में जा रही है। नई पीढ़ी ने सच की दुनिया से परे एक अलग ही दायरा बना लिया है.. यह पीढ़ी अपने ऊपर ऐसा आवरण ओढ़कर बैठी है, जिसका वास्तविकता से कोई लेना-देना नहीं है। इन्हें भर-भर कर फॉलोअर्स चाहिए, लेकिन साथ देने वाला कोई नहीं.. और न ही इन्हें खुद किसी का सच्चा हमदम बनना है।
हमारे ये बच्चे अब अपनों से भी अपने बनकर नहीं रह पा रहे हैं। इससे बड़ी दुर्दशा और क्या ही होगी.. एक ही घर में माता-पिता और बच्चे रह तो रहे हैं, लेकिन अलग-अलग कमरों, अलग-अलग स्क्रीन और अलग-अलग दुनिया में। अपनों से बातचीत की कमी इतनी है कि बच्चों को अब अपने ही माता-पिता से बात करना या कुछ शेयर करना अजीब लगने लगा है। बच्चों को लगता है कि माता-पिता समझेंगे नहीं, और माता-पिता सोचते हैं कि बच्चे सुनेंगे नहीं।
यदि नई पीढ़ी को इस दलदल से बाहर निकालना है, तो शुरुआत वहीं से करना होगी, जहाँ से यह दूरी शुरू हुई.. घर से। हर दिन कुछ मिनट या घंटों का समय ऐसा तय किया जाए, जहाँ कोई मोबाइल न हो, कोई टीवी न हो.. सिर्फ सवाल हों, और उनके वास्तविक जवाब।
“आज का दिन कैसा रहा?”, “क्या अच्छा लगा, क्या बुरा?”, “आज के दिन में कोई बदलाव चाहते, तो क्या बदलते?” ये छोटे-छोटे सवाल बच्चों को एहसास दिलाते हैं कि उनकी बात मायने रखती है।
आज की जरूरत यही है कि हम इक्यू (इमोशनल कोशेंट) को आईक्यू (इंटेलिजेंस कोशेंट) से ऊपर रखें। इंसान को नंबर्स से नहीं, उसकी संवेदनाओं से आँकें। कारण कि स्कूलों में मैथ्स और साइंस तो सिखाई जाती है, लेकिन रिश्तों को निभाना, असफलता को स्वीकारना और किसी के दर्द को समझना, यह सब कोई नहीं सिखाता। पहले घरों में यह परवरिश दी जाती थी, लेकिन अब तो यह भी इतिहास बनकर रह गया है.. आजकल काम की होड़ में पेरेंट्स के पास इसका समय ही कहाँ बचा है..
तो अगली बार जब आपका बच्चा गुस्से में हो, तो उसे चुप कराने के बजाए पूछिए, “क्या तकलीफ है?” नई पीढ़ी को भी इस तरह की पहल करके खुद को संभालने की जरुरत है.. जब आपका पार्टनर नाराज़ हो और तेज़ आवाज़ में कुछ बोल रहा हो, तो “क्यों चिल्ला रहे हो?” यह पूछने के बजाए कहिए, “मैं सुन रहा हूँ।” क्योंकि कभी-कभी ज़िंदगी सिर्फ सुन लिए जाने से भी थोड़ी बेहतर हो जाती है।