गरीब का सामना संघर्ष से ही क्यों?

कुएँ से पानी लाती ग्रामीण गरीब महिला और उसके साथ बच्चे

कल्पना कीजिए एक माँ की, जो एक छोटे-से गाँव में रहती है। दिन भर की भागदौड़ से हुई थकान की वजह से सुबह उठने में कहीं देर न हो जाए, इस वजह से सारी रात खिड़की की संद से रोशनी के आने के इंतज़ार में बिता देती है। हर दिन तड़के उठकर, उसकी पहली चिंता होती है अपने परिवार के लिए पानी की व्यवस्था करने की। गाँव में बेहद कम सुख-सुविधाओं के चलते, मीलों दूर कुएँ से पानी भरकर लाना उसकी दिनचर्या का बेहद अहम् हिस्सा होता है। और यह प्रक्रिया निरंतर रूप से चलती रहती है।

उसके हाथ, जो कई वर्षों की मेहनत से खुरदरे हो चुके हैं, किसी और की नज़रों में बेशक साधारण हाथ होंगे, लेकिन कोई उस माँ को गहराई से समझे, तो जानेगा कि उसका हर दिन एक युद्ध है। यह युद्ध है घर की मूलभूत जरूरतों और परिस्थितियों के खिलाफ। जब वह कुएँ से घड़े भर-भरकर पानी लाती है, तो उसकी कमर भले ही अकड़ जाए, पीठ भले ही झुक जाए, लेकिन मजाल है कि थोड़ा भी झुक जाए उसका हौंसला। उसके बच्चों और परिवार के लिए वह अपने सपनों का गला तक घोंट देती है और जुट जाती है अपने बच्चों को सक्षम बनाने में, ताकि जो वह नहीं कर पाई, वह उसके बच्चे कर सकें। फिर इसके लिए उसे कुछ भी क्यों न करना पड़ जाए, वह खुशी-खुशी करती है।

वह दिन-रात मेहनत करती है, घर के काम-काज से थोड़ा बहुत समय चुराकर चटाई, टोकरी आदि बुनती है। लेकिन, गरीबी की मार झेलती उसके पूरे परिवार की आमदनी भी बड़ी मुश्किल से ही उसके बच्चों के लिए भर-पेट भोजन की व्यवस्था कर पाती है। शिक्षा तो ऐसे परिवारों के लिए बहुत दूर के सपने होते हैं।

स्कूल जाने की उम्र में ऐसे परिवारों के बच्चे स्कूल की जगह खेतों में मिलते हैं, और उनके नन्हें-नन्हें हाथों में किताबों की जगह होते हैं हसिए, जिसकी सहायता से वे फसलों को काटते हैं। वे मुलायम उँगलियों से बीजों को रोपने को ही कलम पकड़ना समझने लगते हैं। उनके चेहरे की मासूमियत और सपने कब गरीबी की चट्टान के नीचे दबकर दम तोड़ देते हैं, पता ही नहीं चलता, और वे भी अपनी माँ की तरह संघर्ष करने को मजबूर हो जाते हैं। कुल मिलाकर, एक गरीब परिवार की आर्थिक स्थिति उन्हें आराम करने की इजाजत नहीं देती। उनके जीवन में खुशियों की जगह मुश्किलें ही अधिक होती हैं।

गाँव की कच्ची सड़कों पर, हर मोड़ पर गरीबी की ऐसी ही मिलती-जुलती कहानी होती है। पैसों की तंगी तो एक तरफ, बिजली की कमी, स्वास्थ्य सेवाओं, अच्छे स्कूलों और संसाधनों का अभाव भी इन गरीबों को गरीब बनाए रखने में कोई कसर नहीं छोड़ते हैं। हिम्मत करके कुछ-एक गुजर-बसर करने शहरों का रुख कर भी लेते हैं, तो यहाँ भी उनका स्वागत संघर्ष से ही होता है। शहर की चमक-दमक उनके सपनों को और भी धुंधला कर देती है। एकमात्र विकल्प मजदूरी या और कोई छोटे-मोटे काम करके वे अपने परिवार का पेट पालने की कोशिशों में लग जाते हैं। बच्चों को पढ़ाने के यहाँ भी कोई आसार नज़र नहीं आते।

गरीबी उन्मूलन के नाम पर सरकार तमाम योजनाएँ चलाती है, लेकिन अफसोस कि ये योजनाएँ चलकर उन लोगों तक नहीं पहुँच पाती हैं, जिन्हें इनकी वास्तव में जरुरत है। भ्रष्टाचार और बिगड़ी व्यवस्था इन गरीबों को तमाम लाभों से वंचित कर देती हैं। मेरे मायने में यह कई दिनों के भूखे व्यक्ति के मुँह में से निवाला छीनकर खाने के बराबर है। कई सामाजिक संगठन और एनजीओ भी गरीबों को गरीबी से राहत दिलाने का दावा करते हैं, लेकिन इनमें से भी कुछ की नियत गरीबों के हित का खाने को दौड़ पड़ती है। इनके खिलाफ आवाज़ उठाने का सवाल ही नहीं उठता, क्योंकि गरीब की आवाज़ उसके बोलने से पहले ही दबा दी जाती है।

एक समाज के रूप में, हमें गरीबों के संघर्षों को समझने और उनकी मदद करने की सख्त जरूरत है। हमें समझना ही होगा कि गरीबी सिर्फ आर्थिक स्थिति नहीं है, जिससे कोई व्यक्ति विशेष जूझ रहा है, बल्कि यह एक सामाजिक समस्या है, जो लाखों लोगों के जीवन को प्रभावित करती है। बेशक, भारत में गरीबी के खिलाफ लड़ाई बहुत लंबी और कठिन है, लेकिन नामुमकिन नहीं, हमें यह लड़ाई लड़नी ही होगी। हमें एक बेहतर और खुशहाल भविष्य की दिशा में काम करना होगा, ताकि कोई भी बच्चा भूखा न सोए, कोई भी माँ अपने बच्चों को सफल बनाने के लिए खुद को आर्थिक रूप से बेबस न समझे, कोई भी जरूरतमंद व्यक्ति सरकारी योजनाओं से वंचित न हो और सबसे विशेष, कोई भी व्यक्ति गरीब न हो।

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