रात के तकरीबन साढ़े दस बजे होंगे। मैं ऑफिस से लौट रहा था। दिनभर की थकान के बाद बस घर पहुँचकर चैन से बैठने की इच्छा थी। ठंडी हवा चल रही थी, सड़कें खाली हो रही थीं, और लैंप पोस्ट की रोशनी में झींगुरों की हल्की-हल्की आवाज़ सुनाई दे रही थी।
तभी मैंने सड़क के किनारे एक व्यक्ति को बेबस पड़ा देखा। अंधेरे में उसका चेहरा साफ नहीं दिखाई दे रहा था, लेकिन उसके शरीर की हलचल बता रही थी कि वह ज़िंदा है। लोग आते-जाते रहे, लेकिन उस पर किसी का ध्यान नहीं था, या यूँ कहूँ कि कोई गौर करना ही नहीं चाह रहा था। मैं काफी देर तक वहीं खड़ा रहा, लोगों की यह नज़रअंदाजी देखता रहा.. मैं सोच रहा था कि इस स्थिति में मुझे क्या करना चाहिए?
जैसे ही कदम बढ़ाने को हुआ, दिल के किसी कोने से आवाज़ आई, क्या होता, यदि यह मैं होता? क्या मैं भी यूँ ही किसी की मदद की उम्मीद में पड़ा रहता?
मैं ठिठक गया। कदम खुद-ब-खुद उसकी ओर मुड़ गए। नज़दीक जाकर देखा, तो वह कोई बुज़ुर्ग आदमी था। उसके कपड़े मैले-कुचैले थे, शरीर पर गंदगी की परत जमी हुई थी। साँसें धीमी चल रही थीं। मैंने झिझकते हुए उसे हिलाया। कोई जवाब नहीं। मैंने अपने बैग में से पानी की बॉटल निकाली और उसके चेहरे पर छींटे मारे। पलकें हल्की-सी हिलीं। किसी तरह उसने आँखें खोलीं और बहुत धीमी आवाज़ में कहा, “भूख लगी है..”
इन तीन शब्दों को सुनने से पहले बर्फ की तरह ठोस मैं, पानी की तरह पिघल गया। उसकी यह हालत देखकर मन में बड़ी टीस उठी कि न जाने कितने दिनों से भूखा होगा वह। काम और दूसरी चिंताओं के चलते आज मैंने भी खाना नहीं खाया था.. उसे छोड़कर कहीं जाने का मन भी नहीं हुआ, सो बॉटल के पास ही सटे हुए टिफिन को बाहर निकाल लिया.. जब उसके काँपते हाथों ने पहला निवाला उठाया, तो उसकी आँखों में जो अलग-सी चमक दिखी, उसे शब्दों में बयाँ कर पाना मेरे बस की बात नहीं.. भूख से तड़पते इंसान की आँखों में उम्मीद की चमक पहली बार जो देखी थी। वह धीरे-धीरे खाने लगा और हर निवाले के साथ उसकी आँखों में एक नई ऊर्जा दिखने लगी। सच कहूँ, तो आज “दाने-दाने पर लिखा खाने वाले का नाम” कहावत का मोल और सार बहुत ही अच्छे से समझ आ गया था..
खाने के बाद उसने मेरी तरफ देखा और जो कहा, वह मेरे भीतर के मरे हुए इंसान को ज़िंदा करने के लिए काफी थे। उसने कहा, “आज बहुत दिनों बाद लगा कि मैं ज़िंदा हूँ..”
मैं इस प्रश्न के साथ कुछ पल को वहीं ठहर गया कि मैंने उसे बचाया या उसने मुझे.. सच्चाई यह थी कि उस दिन मैंने उसे नहीं, उसने मुझे बचा लिया।
वह दिन बीत गया। मैं अपने जीवन में फिर से व्यस्त हो गया, लेकिन मन में एक बेचैनी रह गई। हम सब भाग रहे हैं, पैसा कमाने, पहाड़ की तरह बड़े-बड़े सपनों को पूरा करने, अपनी दुनिया को सँवारने.. लेकिन हम यह भूल जाते हैं कि असली संतोष और अमीरी दूसरों के लिए किए गए छोटे-छोटे कामों में होती है।
कुछ दिनों बाद जब मैं उसी रास्ते से गुज़रा, तो मैंने देखा कि वह आदमी वहाँ नहीं था। मन में विचार चल ही रहा था कि वह कहाँ गया होगा कि इतने में किसी ने पीछे से आवाज़ दी, “बेटा!”
मैंने पलटकर देखा, तो वह वही इंसान था, लेकिन इस बार वह बदला हुआ था। अब वह कमजोर और असहाय नहीं लग रहा था। बाल सँवार रखे थे, शरीर में थोड़ी मजबूती आ गई थी। चेहरे पर एक नई चमक थी। मैंने पूछा, “कैसे हो?” उसने हल्की मुस्कान के साथ कहा, “ज़िंदा हूँ, आपकी वजह से।”
अब मेरे चेहरे पर भी मुस्कान थी। मैंने पूछा, “तुम अब कहाँ रहते हो? क्या कर रहे हो?” उसने बताया कि जब मैंने उसकी मदद की, तो उसके मन में उम्मीद जागी। अगले ही दिन उसने एक गुरुद्वारे में शरण ली। वहाँ लंगर में खाना मिला, लोगों ने सहारा दिया। धीरे-धीरे उसने अपने जीवन को संभालना शुरू किया। अब वह एक छोटे-से ढाबे में बर्तन धोने का काम कर रहा था और इस उम्र में खुद अपना पेट पाल रहा था।
मुझे यह जानकर सुकून मिला कि अब वह किसी पर निर्भर नहीं है। इतने में, मैं क्या देखता हूँ कि बातचीत के दौरान उसने अपनी जेब से सौ रुपए निकालकर सड़क किनारे बैठे एक बुज़ुर्ग भिखारी को दे दिए।
मैं हैरानी से देखता रह गया। उसने मेरी तरफ देखा और कहा, “जिसने खुद दर्द सहा हो, वह किसी और का दर्द नहीं देख सकता।” उस दिन मेरी आँखें नम हो गईं। मैंने जो बीज किसी के जीवन में डाला था, वह अब उसके जीवन में हरियाली बन रहा था।
मदद का चक्र चलता ही रहता है.. जब हम किसी की मदद करते हैं, तो हम सिर्फ एक व्यक्ति का जीवन नहीं बदलते, बल्कि एक पूरी श्रृंखला शुरू कर देते हैं।
जिस तरह मैंने उस इंसान की मदद की और बदले में उसने किसी और की सहायता की, ठीक उसी तरह जब हम किसी जरूरतमंद का हाथ थामते हैं, तो कहीं न कहीं हमारे लिए भी कोई हाथ बढ़ाने को तैयार रहता है। हम अक्सर सोचते हैं कि “मैं अकेला क्या कर सकता हूँ?” लेकिन सच यह है कि एक छोटा-सा कदम, एक छोटी-सी करुणा की भावना, किसी की पूरी दुनिया बदल सकती है।
हम अपनी दिनचर्या में इतने मशगूल हो जाते हैं कि हमें एहसास ही नहीं होता कि हमारे आसपास कितने लोग मदद की उम्मीद में बैठे हैं। इसलिए, अगली बार जब आप किसी जरूरतमंद को देखें, तो यह मत सोचिए कि “यह मेरा काम नहीं है।” यह सोचिए कि इस स्थान पर मैं होता, तो क्या चाहता? और साथ ही याद रखिए कि जब आप किसी के लिए हाथ खोलते हैं, तो आपके लिए दो हाथ अपने आप खुल जाते हैं।