हर किसी के जीवन में एक गाँव होता है, कभी जन्मभूमि के रूप में, तो कभी नानी के घर के रूप में.. माध्यम कई हो सकते हैं, लेकिन हर किसी का जीवन किसी न किसी बहाने गाँव से जुड़ा जरूर होता है.. वह दुनिया, जहाँ दिल हर बार लौट जाना चाहता है। मेरे लिए गाँव सिर्फ एक जगह नहीं, बल्कि वह एहसास है, जो हर बार दिल को सुकून देता है। मिट्टी की सौंधी खुशबू, पेड़-पौधों से लिपटे आँगन, नहर का ठंडा पानी, मंदिर की घंटियाँ और चौपाल की गप्पें, यह सब कुछ आज भी मेरी यादों में ज़िंदा हैं।
जब ज़िंदगी की भीड़-भाड़ में साँसें घुटने लगती हैं, तो वही पुरानी यादें गले लगाकर कहती हैं, “चलो, एक बार फिर गाँव चलते हैं।”
मुझे आज भी याद है कि गर्मियों की छुट्टियाँ आते ही हम सब भाई-बहन बस्ता-पट्टी छोड़कर सीधे गाँव भागने की पुरजोर तैयारियाँ करने लगते थे। बैग के कोने-कुचाले ढूँढ-ढूँढ कर हर छोटे से छोटे खिलौने को सहेजकर रख लेना, ताकि उन मिट्टी और लकड़ी के खिलौनों को तीन महीने हमारी याद न आए, हम अपने साथ लिए चलते थे। ट्रेन से उतरते ही जैसे कोई और ही दुनिया शुरू हो जाती थी। स्टेशन के बाहर बैलगाड़ी खड़ी रहती थी और रास्ते भर हर मोड़ पर कोई पुराना चेहरा मुस्कुरा कर हमें पहचान लिया करता था। रास्तों में धूल जरूर उड़ती थी, लेकिन उसमें भी अपनापन होता था।
गाँव की वो कच्ची गलियाँ, पीपल का पेड़, जिस पर झूला बँधा होता था, नानी की खूबसूरत कहानियाँ, जो वे हर बार एक नए मोड़ के साथ दोहराकर सुनाया करती थीं, सब कुछ किसी बेशकीमती कविता की तरह मेरी स्मृति में दर्ज है। सुबह खेतों से आती मिट्टी और घास की मिली-जुली सुगँध, शाम को मंदिर में होने वाले भजन और रात में नीम के पेड़ के नीचे चटाई पर लेटकर तारों की वह गिनती, जिस पर हमें पक्का यकीन होता था कि जितने हमने गिने, आसमान में उतने ही तारे हैं.. सच-मुच जीवन के इससे सुखद अनुभव और क्या ही होंगे..
लेकिन अफसोस, समय के साथ वह गाँव भी बदल गया, और शायद हम भी। अब जब गाँव जाता हूँ, तो बहुत कुछ खो गया है। गाँव तो वहीं है, लेकिन उसमें पहले जैसा जीवन नहीं रहा। वह पीपल का पेड़ तो है, लेकिन उसकी छाँव में बैठी नानी नहीं। खेत अब भी हैं, लेकिन उन्हें जोतने वाले हाथ काफी कम हो गए हैं। पहले जहाँ चौपाल पर बैठकर लोग राजनीति से लेकर रिश्तेदारी तक की हर बात पर चर्चा किया करते थे, आज उस चौपाल के कान तरस जाते हैं एक शब्द भी सुनने को.. वहाँ अब सन्नाटा जो पसरा रहता है। आज के समय में ये बेतुकी लगने वाली बातें हमारे समय में अनमोल हुआ करती थीं, क्योंकि इन चर्चाओं में शामिल लोगों से जो सटीक सलाह मिला करती थीं न, वो आज के समय में राजा का ताज पहने एआई में कहाँ? मोबाइल और टीवी ने सारी की सारी चर्चाएँ छीन ली हैं, और शहरीकरण ने हमारी सबसे खूबसूरत संस्कृति को दबा दिया है।
सबसे ज्यादा तकलीफ तब होती है, जब देखता हूँ कि गाँव के बच्चों के चेहरों पर आज भी वही पुराने सवाल लिखे हैं। स्कूल तो बने हैं, लेकिन शिक्षक नहीं आते। मिड-डे मील जरूर मिलता है, लेकिन शिक्षा बेस्वाद है। अस्पताल की इमारत ज्यों की त्यों खड़ी है, लेकिन सूनी पड़ी है, क्योंकि वहाँ मरीजों का इलाज करने के लिए डॉक्टर ही नहीं हैं। बिजली के खंभे हैं, लेकिन रात को अँधेरा अब भी घरों में पसरा रहता है। सरकार की योजनाएँ वहाँ तक पहुँचती हैं, इसमें कोई दो राय नहीं है, लेकिन उनका असर न जाने कहाँ गायब हो जाता है।
वैसे तो आज़ादी को साढ़े सात दशक से भी ज्यादा हो गए हैं, लेकिन गाँव की बेरंग तस्वीर में रंग भरने का काम आज भी अधूरा ही पड़ा है। बच्चे नंगे पाँव हैं, खेत सूखे हैं और सपने बची-कुची लौ के समान बुझते चले जा रहे हैं। हमेशा से ही मेरे मन में यह सवाल भीतर तक घर करा हुआ बैठा है कि क्या हम सिर्फ शहरों की चमक-दमक को ही विकास मानते रहेंगे? क्या गाँव की आवाज़ हमेशा सिर्फ चुनावी नारों तक ही सीमित रहेगी?
मुझे याद है, कैसे पहले हर घर एक-दूसरे का सहारा हुआ करते थे। सुख तो सुख, दुःख में भी कँधे से कँधा मिलाकर एक-दूसरे के साथ खड़े रहते थे। शादी-ब्याह में पूरा गाँव शामिल होता था, जैसे खुद के ही घर के किसी सदस्य की शादी हो। सबके साथ से बड़े-बड़े काम कैसे चुटकियों में हो जाया करते थे, पता भी नहीं चलता था। लेकिन, अब रिश्ते भी सोशल मीडिया के मैसेज बनकर रह गए हैं। पहले चिट्ठियाँ आती थीं, अब व्हाट्सऐप के दो शब्दों में यह कहकर रिश्ते निपटा दिए जाते हैं, “सब ठीक है।”
पहले जब कोई बुज़ुर्ग बीमार होता था, तो चार घर दौड़ पड़ते थे। अब एंबुलेंस तेज़ सायरन के साथ आती है, लेकिन अफसोस पड़ोसी दरवाज़ा भी नहीं खोलता।
गाँव में अब बच्चे कंचों की जगह मोबाइल में व्यस्त हो गए हैं। ज़मीनें बिक रही हैं, नौजवान शहर भाग रहे हैं, और बूढ़े माँ-बाप गाँव की सूनी चौखटों पर किसी की आहट का इंतज़ार करते रह जाते हैं।
जब गाँव की गलियों से गुजरता हूँ, तो हर मोड़ मुझे रोक लेता है। वह पुराना स्कूल, जहाँ मैंने ‘क, ख, ग’ सीखा था, अब टूट चुका है। सुंदर-सा वह पोखर, जो कभी अपना किनारा हमें बैठने के लिए दे दिया करता था, अब सूख गया है। दिल भर आता है, और मैं सोचता हूँ कि हम क्या खो बैठे हैं? लेकिन, सवाल यह नहीं है कि हमने क्या खोया है। असल सवाल यह है कि हम इस स्थिति में क्या बचा सकते हैं?
हमें गाँव के लिए नई योजनाएँ नहीं, नई सोच चाहिए। ऐसी सोच, जो शहरों की नकल नहीं, बल्कि गाँव की आत्मा को समझे। हमें चाहिए स्कूलों में शिक्षक, अस्पतालों में सेवा और खेतों में सिंचाई, न कि कागज़ों पर धूल जमातीं रिपोर्ट्स और आँकड़ें। गाँव के बच्चे भी स्मार्ट क्लास और रोबोटिक्स के हकदार हैं। क्यों न हर पंचायत में एक डिजिटल सेंटर हो, हर गाँव में एक वाचनालय हो, और हर गली में फिर से हँसी गूँजे?
बदलाव की शुरुआत सरकार से नहीं, हमसे होनी चाहिए। यदि हम साल में एक बार गाँव जाकर सिर्फ तस्वीरें खींचकर लौट आते हैं, तो बदलाव की उम्मीद कैसे कर सकते हैं? गाँव को यदि फिर से जिंदा करना है, तो सिर्फ पैसे नहीं, प्यार लगाना होगा। सिर्फ विकास नहीं, विवेक लगाना होगा। हमें अपने बच्चों को गाँव की कहानियाँ सुनानी होंगी, सिर्फ इसलिए नहीं कि वे भावुक हों, बल्कि इसलिए कि वे जिम्मेदार बनें। ताकि कल जब वे बड़े हों, तो गाँव उनके लिए पुरानी याद नहीं, एक सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी हो।
गाँव को बचाना कोई बीते समय की ज़िद नहीं है, बल्कि यह भारत की आत्मा को बचाने की लड़ाई है। और आत्मा को बचाना सिर्फ सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि हम सबका फर्ज़ है।