अब न तो पहले जैसी शिक्षा रही है और न ही पहले जैसे शिक्षक
एक सुबह मैं ताजी हवा खाने के लिए टहलने निकला था, रोज की तरह ही सड़कों पर पीली स्कूल बसें आती जाती दिखाई पड़ रही थीं। चौराहों पर छोटे-छोटे बच्चे स्कूल की यूनिफॉर्म पहने कँधे पर बड़ा-सा बस्ता टांगे अपनी स्कूल बसों की राह देख रहे थे। उन बच्चों को देखकर मुझे अपना बचपन याद आ गया, जब मैं स्कूल जाया करता था। तब तो न ऐसी महँगी यूनिफॉर्म्स हुआ करती थीं और न ही कँधों पर बड़े-बड़े बस्तों का बोझ..
हम तो घर की ही शर्ट और हाफ पेंट पहनकर, कपड़े का झोला लेकर निकल पड़ते थे स्कूल के लिए.. तब स्कूल भी बहुत साधारण हुआ करते थे। न कोई बड़ी-सी बिल्डिंग और न ही कोई दिखावा, और फीस भी बिल्कुल सामान्य, लेकिन उस स्कूल में मिला ज्ञान एकदम ठोस था, जो आज भी याद है। बचपन में स्कूल में याद किए पहाड़े मुझे आज भी मुँह-जबानी याद है। उस समय मास्टर जी ने जो गणित के सूत्र बताए थे, वो सारे के सारे आज भी दिमाग में ताजा हैं। उस ज़माने की पढ़ाई और आज की पढ़ाई में कितना अंतर आ गया है। तब भले ही इतनी सुविधाएँ नहीं थीं, लेकिन पढ़ाई और अध्यापकों के पढ़ाने का तरीका इतना मजबूत था कि आज भी स्कूल में पढ़ा कुछ पूछ ले कोई, तो मै अभी बता दूँ। और एक आज की पढ़ाई है, जहाँ बच्चों से पिछली कक्षा का ही कुछ पूछ लो, तो उनके चेहरे का रंग ही उड़ जाता है।
तब से आज की शिक्षा की तुलना करूँ, तो तब से अब तक शिक्षा में काफी अंतर आ गया है। जहाँ हम अपने समय में चंद रुपयों की फीस देकर, एक किताब से 5 से 10 लोग पढ़ लिया करते थे, वहीं आज स्कूलों की फीस लाखों में जा पहुँची है। आज के बड़े-बड़े निजी स्कूल सुविधा के नाम पर बड़ी बिल्डिंग, एसी वाले क्लास रूम, स्कूल बस आदि तो दे रहे हैं, लेकिन शिक्षा के नाम पर आलम यह है कि बच्चों को छोटा-मोटा हिसाब करने के लिए भी कैल्कुलेटर निकालना पड़ता है। उन्हें ठीक से हिंदी पढना तक नहीं आती है। स्कूल के खर्चों की ही बात करूँ, तो आज स्कूलों की फीस तो लाखों में है ही, छोटी-छोटी कक्षाओं की एक-एक किताबें भी 500-1000 रुपए से कम की नहीं आती, लेकिन किताब खोल कर देखो, तो आपको सौ गलतियाँ देखने को मिल जाएँगी।
इसके अलावा यूनिफॉर्म, बेग, बोतल और अन्य चीजों के अलावा रोज के दूसरे चोंचलों का खर्च तो अलग ही है। वहीं, यदि स्कूल में शिक्षकों की बात करूँ, तो बड़े-बड़े स्कूलों में पढ़ाने वाले शिक्षकों में ही सही ज्ञान की कमी है, फिर छोटे स्कूलों की क्या ही बात की जाए। वे भी पढ़ाने के लिए किताबों पर निर्भर हैं। कहने का अर्थ है कि जितना ज्ञान किताबों में दिया है, वे भी उतना ही पढ़ा कर अपना काम पूरा मान लेते हैं। उन्हें भी परीक्षा से पहले जैसे-तैसे अपना कोर्स पूरा करने की जल्दबाजी रहती है। अब इसमें बच्चा कुछ सीख पाया या नहीं, उसे क्या आया, क्या नहीं, इससे कोई मतलब नहीं है। जबकि पहले के समय में शिक्षक भी ऐसे थे कि जब तक पढ़ाया हुआ पाठ हर बच्चे को ठीक से आ नहीं जाता था, तब तक वे पढ़ाना नहीं छोड़ते थे। तब जो पढ़ाया जाता था, वह इतना ठोस होता था कि बच्चों को हमेशा-हमेशा के लिए कंठस्थ हो जाता था। आज हालत यह है कि बच्चे पहले स्कूल में पढ़ते हैं, फिर कुछ न समझ में आने की स्थिति में कोचिंग भागते हैं, इसके बावजूद भी परीक्षा नज़दीक आते-आते दिमाग से सब साफ हो जाता है। कारण कि कोचिंग के हालात भी स्कूलों से कुछ अलग नहीं बचे हैं।
आजकल बेचारे माता-पिता अपने बच्चे की पढ़ाई के लिए पहले स्कूल की फिर कोचिंग की भारी भरकम फीस और बाकी के दिखावे में अपने खून पसीने की कमाई भले ही खर्च किए जा रहे हैं, लेकिन इसका कोई नतीजा निकलता नजर नहीं आता, क्योंकि इस शिक्षा व्यवस्था में न ही बच्चे किताबी ज्ञान के लायक बन पा रहे हैं, और न ही दुनियादारी की उन्हें कोई समझ आ रही है।
इस हालातों से मतलब साफ है कि समय के साथ शिक्षा महँगी तो हुई, लेकिन गुणवत्ता गिर गई है। अब न तो पहले जैसी शिक्षा रही है और न ही पहले जैसे शिक्षक, कुछ रह गया है, तो सिर्फ स्कूल कॉलेज और कोचिंग के दिखावे रटा रटाया ज्ञान और भारी भरकम फीस, जिसे भर-भर कर अभिभावकों की कमर टूट रही है, लेकिन फिर भी उनका बच्चा सही मायनों में शिक्षित नहीं हो पा रहा है। क्या यही शिक्षा का विकास है? क्या हम ऐसे भविष्य की कल्पना करते हैं आने वाली पीढ़ी के लिए? यदि हाँ, तो खुश हो जाइए, क्योंकि आप बिल्कुल सही राह पर हैं, और यदि नहीं, तो अभी-भी समय है, स राह से मुड़ जाइए.. स्थिति को सँभालने की इस समय सबसे अधिक जरुरत है। शिक्षा के स्तर के सुधार पर अभी ही ध्यान देना होगा। स्कूलों में बढ़ती सुख सुविधाओं के साथ-साथ पढ़ाई की गुणवत्ता के सुधार पर ध्यान देना होगा।
साथ ही, हर दिन महँगी होती शिक्षा के पीछे के कारण का पता लगाकर इसे रोकना होगा, क्योंकि यदि इसी तरह शिक्षा महँगी होती गई, तो कोई गरीब अपने बच्चे को कैसे पढ़ा पाएगा। आखिर शिक्षा उस बच्चे का भी तो अधिकार है, जिसके पिता दिहाड़ी करके अपने बच्चे को पढ़ा रहे हैं, ताकि वह गरीबी के चक्रव्यूह से निकल सके। इसके लिए शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार और बढ़ती कीमतों को रोकना होगा।