इंसान की आधारभूत जरूरतों में से पहली जरूरत रोटी होती है, जिसके लिए किसान दिन-रात मेहनत करके फसल उगाता है, लेकिन सिर्फ मेहनत कर देने से अच्छी फसल नहीं उग जाती, इसके लिए जरूरत होती है गुणवत्ता वाले बीज की, क्योंकि जब बीज अच्छा होगा, तभी अच्छी फसल होगी और तब सही मायने में किसान की मेहनत रंग लाएगी। किसी भी पौधे की संरचना में मिट्टी और बीज का विशेष योगदान रहता है, ठीक इसी प्रकार गीली मिट्टी कहे जाने वाले बच्चों को भी भविष्य निर्माण करने वाला बीज मानकर उन्हें शिक्षा रुपी खाद प्रदान की जानी चाहिए।
जैसा कि हम सभी देखते हैं, पढ़ाई और शिक्षा सिर्फ धंधे का विषय बन गए हैं, जिसके चलते आजकल हर गली, हर मोहल्ले में स्कूल खुल रहे हैं, जिनका उद्देश्य शिक्षा देना नहीं, बल्कि सिर्फ लाभ कमाना है। जिन लोगों को शिक्षा की परिभाषा भी नहीं पता, वे इन स्कूलों में कम पैसों में पढ़ाने वाले शिक्षक बन जाते हैं। इन बातों से अनभिज्ञ, गरीब तबके का हर व्यक्ति आज यही चाहता है कि उनका बच्चा अच्छे अंग्रेजी मीडियम स्कूल में पढ़े, उसे अच्छी शिक्षा मिले और वह अपने अभिभावकों का नाम रोशन करें। इन इच्छाओं के चलते ये लोग अपने बच्चों का दाखिला शिक्षा के साथ खिलवाड़ करने वाले गलियों के इन स्कूलों में करा देते हैं।
इन छोटे स्कूलों में बच्चे भेड़-बकरियों की तरह भर लिए जाते हैं, जहाँ बच्चों की बुनियादी शिक्षा पर ध्यान न देते हुए, बस सिलेबस को पूरा कराने की होड़ मची रहती है और सभी को एक ही डंडे से हांका जाने लगता है। देखा जाए तो सिलेबस पूरा कराने की इस भेड़चाल में शिक्षकों का भी पूरा दोष नहीं हैं, उनके ऊपर भी जल्दी कोर्स पूरा कराने का दवाब बना रहता है। शिक्षक कोर्स पूरा कराने के बाद अपने हाथ झड़ाकर किनारा कर लेते हैं, और भूल जाते हैं कि बच्चों को चीजें समझ आई भी हैं या नहीं। मेरा यह मानना हैं कि पुराने समय की वस्तु-विनिमय प्रणाली को फिर से शुरू करना चाहिए, जहाँ लोग एक-दूसरे की ज़रूरतों को ध्यान में रखकर वस्तुओं का आदान-प्रदान करते थे। आज शिक्षकों को भी यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि यदि अभिभावक उन्हें फीस दें रहे हैं, तो उनका भी ये फर्ज़ बनता है कि वे बदले में उनके बच्चों को अच्छी शिक्षा दें।
जैसा कि हम सभी जानते हैं शुरुआती समय में बच्चों के सीखने व याद करने की क्षमता बहुत तीव्र रहती है। इस समय यदि उन्हें सही शिक्षा मिले, तो वे आगे भी बेहतर प्रदर्शन कर सकते हैं, लेकिन ऐसे शिक्षक, जिन्हें खुद ही ज्ञान न हो, क्या वे बच्चों को बेहतर ज्ञान दे पाएँगे? जैसा कि हम ऊपर बीज और मिट्टी की गुणवत्ता की बात करते हुए आए हैं, क्योंकि अच्छी फसल और अच्छा बीज दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। ठीक उसी प्रकार अच्छी शिक्षा भी बेहतर भविष्य की पूरक है, क्योंकि यदि बीज ही खोखला होगा तो पौधा कैसे उग पाएगा और अगर पौधा उग भी गया, तो वह मजबूती से खड़ा नहीं रह पाएगा?
खेती से जो कम नहीं, समझो विद्या को मान ।
खेती अन धन दे सदा, विद्या गुणों की खान ।।
इन पंक्तियों में शिक्षा और खेती को समान दर्जा दिया गया है, क्योंकि खेती से अन्न और धन मिलता है और शिक्षा से व्यक्ति गुणवान बनता है। बस जरूरत है बच्चों को बेहतर शिक्षा देने की, जिस प्रकार किसान बुआई करने से पहले खोखले बीजों को चुनकर अलग करता है, ठीक उसी प्रकार इन छोटे स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों की खूबियों को पहचान के उन्हें और बेहतर बनाने का समय है। साथ ही बदलते समय की यह माँग है कि शिक्षक भी खुद की कमियों को दूर करने का प्रयास करें और खुद को शिक्षा के नए आयामों से जोड़कर बच्चों के सर्वांगीण विकास पर ध्यान दें, न कि उन्हें भेड़-बकरी की तरह एक ही डंडे से हांकते रहें, क्योंकि बदलाव का यह नियम है कि वह तभी संभव हो सकता है, जब इसकी शुरुआत खुद से ही की जाए।