शिक्षा व्यवस्थाओं के किए-कराए पर पानी फेरने का काम कर रहीं परीक्षाएँ

परीक्षा के दबाव में उलझे भारतीय छात्र और खोती हुई शिक्षा की आत्मा

भारत में शिक्षा व्यवस्था को लेकर हमेशा से उठते पेंचीदे सवाल शायद ही कभी खत्म हो सकेंगे। निरंतर आगे बढ़ते देश में शिक्षा का स्तर ऊपर जा रहा है या नीचे? क्या वास्तव में हमारे देश की शिक्षा व्यवस्थाएँ छात्रों के भविष्य को समृद्ध बनाने के काबिल हैं? ऐसे तमाम सवालों का एक बड़ा हिस्सा परीक्षा व्यवस्था की पोटली में बँधा हुआ है। कभी-कभी तो ऐसा लगता है, जैसे हमारे देश में शिक्षा का मुख्य उद्देश्य सिर्फ परीक्षा पास करना मात्र रह गया है।

बेशक, शिक्षा के क्षेत्र में पिछले कुछ दशकों में कई महत्वपूर्ण बदलाव हुए हैं, लेकिन परीक्षाएँ अभी-भी हमारे शिक्षा तंत्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनी हुई हैं और इन पर उठती सवालों की पाँचों ऊँगलियाँ शिक्षा व्यवस्था के दयनीय हालातों को साफ बयाँ करती हैं। क्या ये परीक्षाएँ वास्तव में छात्रों की योग्यता और बौद्धिक क्षमता को मापने का सही मापदंड हैं, या फिर शिक्षा व्यवस्था पर एक भारी-भरकम बोझ हैं? वह बोझ, जिसका वजन अब शिक्षा और इसकी व्यवस्थाओं से सहा नहीं जा रहा है। कुल मिलाकर, ये परीक्षाएँ शिक्षा का दम घोंटने का काम कर रही हैं।

इस संदर्भ में रूस के महान क्राँतिकारी और भूगोलविद पीटर क्रोपोटकिन के दृष्टिकोण से मिली महत्वपूर्ण समझ से भी यदि हम समझ नहीं पाएँ, तो फिर हमें कोई नहीं समझा सकता है। 19वीं सदी के अंत में पीटर क्रोपोटकिन ने ‘नवयुवकों से दो बातें’ एक किताब लिखी थी, जिसका शीर्षक था। यह किताब उन नौजवानों के लिए सलाह पर आधारित थी, जो अपनी स्कूली पढ़ाई खत्म करने के बाद अपना करियर बनाना चाहते हैं। क्रोपोटकिन ने इस किताब के माध्यम से छात्रों को बताया कि जो छात्र डॉक्टर के रूप में अपना करियर स्थापित करना चाहते हैं, और जो इंजीनियर व प्रोफेसर आदि बनना बनना चाहते हैं, उनके विचार कैसे होने चाहिए।

जो छात्र अपनी स्कूली शिक्षा पूरी कर चुके हैं, वे बहुत कुछ सीख चुके होते हैं और आवश्यक तमाम जानकारी उनके पास होती है। यहाँ तक आकर सवाल बचता है, तो उनकी सोच और जज़्बे का। जिस छात्र का जज़्बा आखिर तक हिलता-डुलता नहीं, वह सबसे अच्छा प्रोफेशनल बनकर तैयार होता है।

रही बात व्यावहारिक ज्ञान की, तो वे जिस संस्थान में भी जाएँगे, वहाँ उन्हें मिल ही जाएगा। हम सभी यही मानते हैं। क्रोपोटकिन का भी बिल्कुल यही मानना था।

लेकिन, अब यह लगता है कि सच का इससे कोई लेना-देना नहीं है। हमारे समाज में नीट, जेईई और नेट जैसी परीक्षाओं को लेकर सोच और जज़्बे को कोई पूछने वाला ही नहीं है। कारण कि हमारी शिक्षा व्यवस्था सिर्फ परीक्षा पास करने तक ही सीमित होकर रह गई है। जो इसे पास कर लेता है, सबकी नज़रों में वही योग्य और विद्वान है। और जो इसे अच्छे अंकों से पास कर लेता है, उसकी तो फिर बलिहारी ही है उसके साथ लोग किसी शहंशाह जैसा व्यवहार करने लगते हैं। परीक्षा के परिणाम आने से पहले ही ढोल-नगाड़े तैयार रहते हैं, और इसके घोषित होते ही गली-मोहल्ले में कँधों पर उठा-उठाकर पास होने वाले छात्र की प्रदर्शनी निकाली जाती है। उसने कुछ पढ़ा-सीखा हो या नहीं, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। अच्छे अंकों से पास होना ही हमारे समाज में सबसे श्रेष्ठ बात मानी जाती है।

दुनिया के बाहरी दिखावे और आडम्बर के पत्थर के नीचे दबे छात्र यह भूल जाते हैं कि ज्ञान की असल कसौटी प्रश्न-पत्र में छपे कुछ सवालों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इन सवालों के पीछे छिपे वो सवाल हैं, जो वास्तव में दिखते नहीं। चाहे कोई भी जुगत ही क्यों न लगाना पड़े, लेकिन हकीकत यह है कि उन सवालों को समझकर हल करने वाला छात्र हर बाधा को पार कर जाता है। यही वजह है कि वे परीक्षा में पास होने के लिए कोई भी रकम चुकाने को तैयार हो जाते हैं। इस कतार में कुछ अभिभावक भी पीछे नहीं हैं, जो अपने बच्चे को आगे बढ़ता हुआ देखने के लिए कुछ भी कर गुजरने के लिए तैयार हो जाते हैं। वे यह भूल जाते हैं कि वे अपने बच्चे को आगे नहीं बढ़ा रहे, बल्कि पीछे धकेल रहे हैं। वे यह भूल जाते हैं कि पेपर को लीक करके हासिल किए गए अंक एक भयावह भविष्य के सृजन से कुछ भी अधिक नहीं है।

जब परीक्षा पूरी की पूरी पीढ़ी के ही अच्छे भविष्य के लिए विराम बनकर खड़ी हो जाती है, तो विराम रुपी इस दिवार को पार करने के लिए कई तरह के कारोबार भी शुरू हो जाते हैं। कोचिंग, ट्यूशन, गाइड बुक और ऑनलाइन व्यवस्थाएँ आदि इस दौड़ में बहुत आगे जा चुकी हैं। इसके साथ ही, पेपर लीक होना, सॉल्वर गैंग की गतिविधियाँ और फर्जी परीक्षार्थी जैसे अनैतिक काम भी तेज गति से बढ़ते जा रहे हैं। इन दिनों लगभग हर दूसरी या तीसरी परीक्षा के पेपर लीक हो रहे हैं, जिसकी वजह से कई पेपर्स को मजबूरीवश रद्द भी करना पड़ता है। कुल मिलाकर, लोग किनारे ढूँढने लगे हैं जल्दी से सफलता हासिल करने के लिए। परिणाम की चिंता किए बिना, इसके लिए उन्हें कुछ भी क्यों न करना पड़ जाए, वे हर कदम के लिए तैयार हैं, क्योंकि उनका उद्देश्य मात्र सफलता पाना है, मेहनत करना नहीं।

कोचिंग संस्थान अब महज़ कारखाने बनकर रह गए हैं, जो प्रवेश परीक्षा पास करने के लिए किसी सामान की भाँति उन्हें योग्य बनाकर तैयार कर देते हैं। उन्हें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि उनके भीतर कौशल का विकास हुआ भी या नहीं। वे कारखानों में तैयार युवक-युवतियाँ बनकर रह जाते हैं, वे प्रतिभाशाली नौजवान कतई नहीं बन पाते हैं।

मेरे मायने में स्कूली शिक्षा ऐसी होनी चाहिए कि उसके बाद कोचिंग संस्थानों में सिर पटकने की बच्चों को जरूरत ही न पड़े। लेकिन, एक सच यह भी है कि हमारे स्कूल भी काफी हद तक कोचिंग संस्थानों की तरह ही काम करते हैं। उनका लक्ष्य भी बच्चों को परीक्षा में पास कराना मात्र रह गया है। बेशक, पहले ऐसा नहीं होता था, लेकिन अब ऐसा ही होता है।

शिक्षा की ये गभीर समस्याएँ किसी फौजदारी से हल होने वाली नहीं हैं। इसके लिए लंबे विमर्श की जरूरत है। जब तक तीन घंटे में प्रश्न-पत्र को हल करने की व्यवस्था बौद्धिकता और योग्यता का पैमाना बनी रहेंगी, इससे जुड़ी समस्याएँ भी निरंतर बढ़ती रहेंगी। इसलिए विकल्प खोजते समय उस सोच और जज़्बे की जरूरत का भी ख्याल रखना भी बहुत जरुरी है, जिसकी बात पीटर क्रोपोटकिन ने अपनी किताब में की थी। हमें वास्तव में एक ऐसी शिक्षा व्यवस्था की जरूरत है, जो वास्तविक ज्ञान, सोच और जज़्बे को प्रोत्साहित करे, न कि केवल परीक्षाओं के माध्यम से योग्यताएँ निर्धारित करे।

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