आज के समय में देखा जाए तो संस्कार और शिक्षा दोनों ही बदल चुके हैं। प्राचीन समय में लोग अपने बच्चों को गुरुकुल में शिक्षा ग्रहण करने के लिए भेजा करते थे, जहाँ वे शिक्षा के साथ-साथ सामाजिक और धार्मिक ज्ञान भी अर्जित करते थे। फिर धीरे-धीरे समय बदला और अंग्रेजी सभ्यता ने भारतीय संस्कृति और परम्पराओं को जकड़ लिया। साथ ही शिक्षा के नए नियम और नई पद्धति का भी आगमन हुआ, जिसके चलते भारतीय लोग अपने धर्म-ग्रंथों और तौर-तरीकों से दूर होने लगे। आज हालत यह है कि भारतीय माता-पिता भी अपने बच्चों को हिंदी न सिखाकर, अंग्रेजी में बात करने और अंग्रेजी तौर-तरीके सीखने पर बल देते हैं।
भारतीय सभ्यता की खूबसूरती की झलक हम अपने धर्मग्रंथों और हमारे रीति-रिवाजों में साफ देख सकते हैं, जहाँ दिन की शुरुआत ईश्वर का नाम और बड़ों के पैर छूकर उनका आशीर्वाद लेने से होती थी। वर्तमान समय की बात करें तो लोग पाश्चात्य संस्कृति के रंग में ऐसे रंगे हैं कि उनके खाने-पीने से लेकर, पहनने-ओढ़ने तक सभी चीजें विदेशी हो चुकी हैं। लोग सुबह राम-राम कहने की जगह गुड मॉर्निग बोलने में अपनी शान समझते हैं।
एक समय वह था जब लोग एक-दूसरे से मिलने उनके घर जाते थे, अपने बच्चों को बड़ों के पैर छूने की शिक्षा दिया करते थे, लेकिन आज-कल लोगों ने खुद को सोशल मीडिया की चार दिवारी में कैद कर लिया हैं। लोग व्हाट्सएप और फेसबुक पर ही हल-चाल लेना उचित समझते हैं और यदि कहीं किसी परिचित से भेंट हो भी जाए, तो राम-राम की जगह हाय-हेलो बोलकर किनारा कर लेते हैं। बच्चें भी बड़ों के पैर छूने की जगह हाय-हेलो बोलने में खुद को ज्यादा सहज महसूस करते है।
सदियों से पहली गुरु कही जाने वालीं आज के समय की माताएँ भी पहले की माताओं से बिल्कुल अलग हैं। पहले महिलाएँ घर के काम-काज के साथ-ही बच्चों को अच्छे संस्कार भी देती थी, लेकिन आज ज्यादातर महिलाएँ अपने बच्चों को आया (मेड) के भरोसे छोड़कर सोशल मीडिया, किट्टी पार्टी, गेट टुगेदर आदि में इतनी व्यस्त रहती हैं कि उन्हें बच्चे की पसंद-नापसंद तक याद नहीं रहती।
हद तो तब हो जाती है, जब महिलाएँ बच्चों के मासूम सवालों और अठखेलियों का आनंद लेने की जगह उनसे परेशान होकर, बच्चों को मोबाइल नाम का दानव थमा देती हैं, जो धीरे-धीरे उन मासूम बच्चों को अपनी गिरफ्त में ले लेता है और माता-पिता चाहकर भी उन्हें इस दानव के चंगुल से नहीं छुड़ा पाते हैं, और सारा दोष बच्चों पर ही मढ़ देते हैं कि दिनभर फोन चलते रहते हैं।
अभी कुछ दिनों पहले की ही बात है, मैं पार्क में टहल रहा था, तब अपने साथी मित्रों को सोशल मीडिया पर चर्चित एक 3-4 वर्ष के बालक के बारे में बात करते सुना, जो ‘भक्त भागवत’ के नाम से सोशल मीडिया पर मशहूर है और जिसे लोग भागवत गुरु भी कहते हैं। उस बच्चे की इतनी प्रशंसा सुनकर मेरा भी मन उसे देखने का हुआ, घर जाकर जब मैंने उस बालक को टीवी पर देखा, तब उसके धर्मग्रथों के विशेष ज्ञान को देखकर मैं स्तब्ध रह गया। मुझे आश्चर्य हो रहा था कि इतने छोटे बालक को कैसे गीता, महाभारत, रामायण जैसे आदि कई ग्रन्थ कंठस्थ याद हैं, वहीं अगर मैं आज की युवा पीढ़ी की बात करूँ, तो उन्हें ठीक प्रकार से रामायण-महाभारत के किरदारों के नाम तक नहीं पता होंगे।
इस बालक को देखने और उसके विचारों को सुनने के बाद मेरे मन में यह विचार आया कि यदि भारत में जन्मा यह बच्चा इतने अच्छे संस्कार ले सकता हैं, तो बाकि बच्चे क्यों नहीं? दरअसल ऐसा माना जाता है कि गर्भधारण काल में माँ जैसा आचरण रखती है, बच्चे भी वहीं चीजें सीखते हैं। ‘भक्त भगवत’ की माँ ने गर्भधारण काल में धर्मग्रथों को पढ़ा था परिणामस्वरूप उनके बालक को सभी ग्रन्थ कंठस्थ हैं, लेकिन आज की ज्यादातर माताएँ अपना गर्भधारण समय बिस्तर पर लेटकर मोबाइल चलाने में बिताती हैं और नतीजा यह होता है कि उनके बच्चे मनबुद्धि, कमजोर दृस्टि आदि कई समस्याओं के साथ ही जन्म लेते हैं।
देश को अंग्रेजों से आज़ादी तो मिल गयी है, लेकिन मेरा ऐसा मानना हैं कि फिर भी देश पूरी तरह आज़ाद नहीं हुआ है। जिस दिन देश में रहने वाला हर व्यक्ति फिर से अपने पुराने रीति-रिवाजों और परम्पराओं को अपना लेगा, उस दिन देश सही मायने में आज़ाद होगा। मेरी सभी माताओं से यही गुज़ारिश हैं कि वे अपने बच्चों को भारतीय संस्कृति और परम्पराओं की शिक्षा अंग्रेजी शिक्षा से पहले दें, ताकि आगे आने वाली पीढ़ियाँ अपने धर्म और संस्कृति से जुड़े रहें।