एक भूखी भूख..

भारत में भूख से जूझते मासूम बच्चों और इंसानी बेबसी को दर्शाता भावनात्मक दृश्य

जब भी जोरों की भूख लगती है और खाना बनने में तनिक भी देरी होती है, तो थाली-चम्मच पीटने की आवाज़ से पूरा घर गूँज उठता है, “मम्मी-मम्मी खाना दो..” और फिर क्या, कुछ ही देर में उस थाली में माँ रूपी फरिश्ता गर्म-गर्म खाना परोस देता है और इतना ही नहीं, बड़े ही प्रेम से अपने बच्चों और पूरे परिवार को खिलाता भी है।

इस प्रेम की परिभाषा बुनते हुए लोग यह भी कहते हैं कि माँ को गिनती ही नहीं आती.. जब भी आधी रोटी माँगो, तो वे एक परोसती हैं। कुल मिलाकर, खुद भले ही भूखी रह जाएँ, लेकिन अपने बच्चों और परिवार को अच्छे से अच्छा और एक से बढ़कर एक पकवान खिलाने में माँ विश्वास रखती हैं, मानो या न मानो, उनका पेट इसी से भर जाता है।

कितना अच्छा लग रहा है न यह सब पढ़कर! लेकिन, एक सच यह भी है कि भर पेट खाना हर किसी के नसीब में नहीं होता.. कड़वा है, मगर सच है.. लोग कहते हैं कि भूख लगे, तो खाना खा लो.. भूख मर जाएगी, लेकिन मैं कहता हूँ कि कुछ भूख ऐसी भी होती है, जो खुद ही भूखी होती है और अपनी भूख मिटाने के लिए न जाने कितने ही मासूमों को खा जाती है। अभी कुछ ही दिनों पहले यह हत्यारिन एक बच्ची को खा गई, उस बेचारी का दोष यह था कि वह कुछ दिनों से भूखी थी।

मैं किसी काम से बाहर जा रहा था। थोड़ा जल्दी में था। आधी दूर भी नहीं पहुँच पाया था कि देखता हूँ लोगों से भरी खचाखच भीड़ बड़ा-सा गोला बनाए खड़ी है। पैदल चलने वाले तो दूर, अपनी गाड़ियों से उतरकर भी लोग एक-एक करके उस भीड़ के भीतर जाने की नाकाम कोशिश में लगे हुए हैं। यह सब देखकर मेरा भी मन नहीं माना, और भीड़ को चीरते हुए जैसे-तैसे भीतर तक पहुँचा। एक ओटले पर नन्हीं-सी मासूम गुड़िया एक 8-10 साल के दुबले-पतले से लड़के की गोद में कुछ ऐसे लेटी हुई थी, जैसे कोई खेलने वाली गुड़िया हो।

वह बच्चा उसका भाई था, जो बार-बार उससे कह रहा था, “छोटी उठ न! तुझे क्या हुआ? माँ गईं हैं न तेरे लिए खाना लाने। हाँ.. जानता हूँ, तूने चार दिन से कुछ नहीं खाया, लेकिन तू नाराज़ मत हो, आज माँ खाना लेकर ही आएँगी।” बिटिया का एक हाथ जमीन पर और गर्दन उसी हाथ की तरफ जाती हुई.. फिर वह कहता, “आँख खोल, मेरी तरफ देख, अच्छा एक काम कर तू उठकर बैठ, मैं तेरे खाने के लिए कुछ लेकर आता हूँ।” छोटी थी कि उठने का नाम ही नहीं ले रही थी।

एक पल को मुझे कुछ समझ ही नहीं आया कि इस स्थिति में किया क्या जाए। मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि पूरी भीड़ का यही हाल था। भूख के मायने हर कोई समझने की कोशिश कर ही रहा था कि फटे-पुराने से कपड़े पहनी एक महिला भी उस भीड़ में शामिल हो गई। अंतर सिर्फ इतना था कि भीड़ बच्चों से कुछ दूरी पर थी और वह महिला उनके एक दम पास.. एक हाथ में एक पूड़ी और दूसरे में दो रोटी लिए वह वहाँ खड़ी की खड़ी रह गई। वह उन बच्चों की माँ थी।

मायूस होता उस बच्चे का चेहरा माँ को देखकर एकाएक ही खिलखिला उठा और वह जोर-जोर से अपनी बहन को हिलाकर उठाने की कोशिश करने लगा। “देख छोटी! माँ तेरे लिए रोटी लाई है, अब तो उठ..” छोटी उठने के बजाए गोदी से नीचे आ गिरी.. छोटी के साथ में रोटी भी गिर गई.. माँ भी लाश की-सी खड़ी रह गई।

इस बार छोटी ने रोटी नहीं, रोटी ने छोटी को खा लिया था। मेरा मन भीतर तक कचोट गया कि काश मैं कुछ देर पहले आ गया होता, तो शायद इस मासूम का यह हाल न होता। यह मंजर देख कई अनकहे सवालों के जवाब तलाशतीं मेरी आँखें झर-झर बहने लगीं। ये सवाल न सिर्फ मुझे, बल्कि पूरी भीड़ को बता गए कि वास्तव में भूख क्या होती है। उस दिन मैंने जाना कि भूख को एक समय तक खाना न मिले, तो यह इंसान को ही खा जाती है।

यह सबक था भीड़ में खड़े हर उस व्यक्ति के लिए कि यदि हमें जितना लगे, उतना ही थाली में लें और कम से कम एक जरूरतमंद को भोजन कराने का प्रण ले लें, तो न जाने कितनी ही छोटियाँ बच जाएँगी और बदले में उन मासूमों की जो दुआ हमें लगेगी, वह किसी खजाने से कम नहीं होगी। कम से कम हम इतने सक्षम तो हैं कि किसी का सहारा बन सकें और किसी की इतनी दर्दनाक स्थिति से उसे बचा सकें।

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