हमारी वर्तमान शिक्षा प्रणाली द्वारा कलंक और रूढ़िवादिता के कारण होने वाली सामाजिक प्रतिक्रिया से बचने के लिए सेक्स एजुकेशन को बहुत आसानी से समाप्त कर दिया गया है, लेकिन इसकी कीमत तो छात्र ही चुकाते हैं। यह गंभीर समस्या आज उचित समाधान की माँग कर रही है। इससे जुड़ी शर्म की उत्पत्ति का पता लगाने और सेक्स एजुकेशन को...
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क्या हम सेक्स एजुकेशन का सच्चा विज्ञान जान पाए हैं?
यूँ तो हमारा देश संस्कृति और सभ्यता के लिए जाना ही जाता है, लेकिन इसका यह मतलब कतई नहीं है कि हम संस्कृति और सभ्यता के आड़े सत्य को न जानें। जैसा कि पिछले आर्टिकल में मैंने बात की थी कि हमारे एजुकेशन सिस्टम में सेक्स एजुकेशन का क्या स्थान है? उसी को आगे बढ़ाते हुए, अतीत में सेक्स एजुकेशन...
Continue reading...हमारी शिक्षा प्रणाली में सेक्स एजुकेशन का क्या स्थान है?
मैं उस पीढ़ी से हूँ, जहाँ “सेक्स” शब्द को अत्यधिक आपत्तिजनक शब्द माना जाता है। सच कहूँ तो, मैं उस पीढ़ी से हूँ, जहाँ यदि कोई “सेक्स” शब्द का इस्तेमाल करता है, तो हम अपने कान बंद कर लेते हैं, क्योंकि आपत्तिजनक शब्द का तमगा लग जाने से इस विषय पर कहाँ कोई बात करेगा या शिक्षा देगा? परिणामस्वरूप, हमें...
Continue reading...कलम की टीस..
मैं कलम हूँ। लोग मुझे अक्सर एक निर्जीव वस्तु मानते हैं, जो न हिल सकती है, न साँस ले सकती है। वे मुझे सिर्फ एक प्लास्टिक की बनी वस्तु समझते हैं, लेकिन हकीकत उनकी सोच से कहीं परे है। मैं क्या कर सकती हूँ, यह वही व्यक्ति समझ सकता है, जिसके विचारों में शक्ति हो और उँगलियों में उन विचारों...
Continue reading...शिक्षा प्रणाली में परिवर्तन केवल एक सैद्धांतिक प्रस्ताव नहीं, बल्कि एक व्यावहारिक आवश्यकता है
दुनिया की शिक्षा प्रणाली लगातार बदल रही है, ऐसे में पढ़ाने के तरीके और पाठ्यक्रम में बड़ा बदलाव लाना बहुत जरूरी हो गया है। रटने और सख्त नियमों में ऐसे बदलाव किए जाने चाहिए, जहाँ छात्रों को केंद्र में रखते हुए, उनकी रचनात्मकता, सोचने की क्षमता और जिंदगी भर सीखने की ललक को जगाया जाए। और यह तो सच ही...
Continue reading...अच्छी लाइफ सेट करने में कौन-सा सिलेबस बड़ा: स्कूल का या फिर जिंदगी का?
आपको 3 इडियट्स का यह गाना तो याद ही होगा “गिव मी सम सनशाइन गिव मी सम रेन गिव मी अनदर चांस आई वॉना ग्रो उप वन्स अगेन” “99 परसेंट मार्क्स लाओगे, तो घड़ी वरना छड़ी” अक्सर आपने यह भी सुना होगा कि 10वीं कक्षा अच्छे अंकों से पास कर लो, फिर लाइफ सेट हो जाएगी। या 12वीं कक्षा अच्छे...
Continue reading...किताबी ज्ञान तक ही सीमित न हों शिक्षा के मायने
क्या असल जिंदगी के दोहे सिखा सकेगा किताबी ज्ञान? शिक्षा कैसी होना चाहिए? आखिर शिक्षा के मायने क्या होने चाहिए? क्या रट-रट कर हासिल किए गए श्रेष्ठ अंक ले आना बेहतर शिक्षा कहला सकती है? किताबी कीड़ा बनकर एक बेहतर शिक्षार्थी बना जा सकता है? क्या आप भी यही सोचते हैं कि शिक्षा महज़ किताबी ज्ञान हो? सिर्फ चंद किताबें...
Continue reading...मुद्दा नजरिए का है, गलत वो भी नहीं, गलत हम भी नहीं..
“यह छह है, अरे नहीं, नहीं यह नौ है.. अरे भई! साफ दिखाई दे रहा है यह छह है.. नहीं, यह नौ है, तुम मेरी जगह पर आकर देखो..” इस दुनिया में रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति के पास अपना मस्तिष्क है, तो स्वाभाविक-सी बात है कि हर एक व्यक्ति एक अलग सोच और स्वतंत्र विचार भी रखता है। इस बात...
Continue reading...शैक्षणिक संस्थानों में काउंसलर्स और साइकॉलजिस्ट्स की जरुरत समय की माँग
शिक्षा निरंतर रूप से चलने वाली यात्रा है, मंजिल नहीं। कारण कि जीवन में शिक्षा और ज्ञान जितना भी अर्जित किया जाए, इसका पिटारा कभी नहीं भरता। यह सतत रूप से चलने वाली प्रक्रिया है, जो इंसान को कक्षाओं और पाठ्यपुस्तकों की सीमा से परे वृद्धि और विकास की सुगम राह पर ले जाती है। जैसे-जैसे छात्र इस यात्रा में...
Continue reading...स्कूलों की रटंत शिक्षा नहीं, सीखने वाली शिक्षा है जीवन के लिए जरूरी
सिर्फ एक डिग्री नहीं, बल्कि रोजगार की ओर पहल का माध्यम भी हो शिक्षा जब बात आती है एक निहित शिक्षा प्रणाली की, मेरा ख्याल है कि इससे अधिकांश लोग प्रभावित होते हैं। कठिन पाठ्यक्रम संरचना से लेकर मैरिट स्कोरिंग प्रणाली तक, सब कुछ बहुत पुराना है। कुछ देशों को छोड़कर दुनिया भर में कहानी एक-सी है। मौजूदा शिक्षा प्रणाली...
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