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आधुनिकता की दौड़ में खोता अपनापन……

आधुनिक जीवनशैली में बिखरता भारतीय परिवार और अकेलेपन का दृश्य

भारत हमेशा से ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ के सिद्धांत पर विश्वास करने वाला देश रहा है। एक समय भारत ऐसा देश था, जहाँ संयुक्त परिवार जीवन का अभिन्न हिस्सा हुआ करते थे। यह वही देश है, जहाँ तीन-चार पीढ़ियाँ एक ही छत के नीचे रहा करती थीं। हर उम्र के लोग एक-दूसरे के साथ हँसी-खुशी के पलों को साझा किया करते थे।...

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मंदिरों में बढ़ती भीड़: आस्था या दिखावा?

मंदिर में दर्शन के दौरान मोबाइल से सेल्फी लेते श्रद्धालु

कई सालों पहले जब हम मंदिर जाया करते थे, तो वहाँ का दृश्य अलग ही हुआ करता था। शांतिपूर्ण माहौल, घंटियों की मधुर ध्वनि और श्रद्धालुओं की आँखों में भक्ति की चमक। लोग भगवान के दर्शन के लिए आते थे, उनकी आराधना करते थे और मन की शांति पाते थे। लेकिन, आजकल का नजारा कुछ बदला हुआ-सा दिखाई देता है।...

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अश्लीलता की बाढ़ में बर्बाद होती युवा पीढ़ी

मोबाइल और ओटीटी कंटेंट से प्रभावित युवा पीढ़ी

सोशल मीडिया और ओटीटी प्लेटफॉर्म पर बढ़ती अश्लीलता, देश के लिए नई चुनौती खड़ी कर रही है… भारतीय संस्कृति में सदाचार, चरित्र निर्माण, विनम्रता, प्रेम, दया, त्याग और आदर-सम्मान जैसे सद्गुणों को हमेशा से ही प्रमुखता दी गई है। इसके बावजूद, समाज में बढ़ते अपराध और नैतिक पतन की खबरें हमें आए दिन देखने, सुनने और पढ़ने को मिलती रहती...

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उतना ही लें थाली में, व्यर्थ न जाए नाली में..

भारतीय शादी समारोह में थालियों में छोड़ा गया भोजन

कुछ दिन पहले एक शादी समारोह में जाना हुआ, वहाँ की चकाचौंध देखते ही बनती थी। समारोह की रौनक देखकर ही पता चल रहा था कि काफी खर्च किया गया है। जब खाने की तरफ बढ़ा, तो देखा वहाँ खाने की कई वैरायटीज़ थी। मेन कोर्स अलग और बाकी स्टॉल्स अलग। वहाँ देखता क्या हूँ कि लोग हर व्यंजन को...

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धर्म का व्यवसाय…..  

भारतीय धार्मिक स्थलों पर दान और वीआईपी दर्शन की भीड़

धर्म, एक ऐसा शब्द है, जिसे सुनते ही मन में पवित्रता और शांति का अनुभव होने लगता है। यह एक ऐसी प्राचीन धारणा है, जो मनुष्य को नैतिकता, आध्यात्मिकता और सन्मार्ग की ओर प्रेरित करती है। धर्म का उद्देश्य सदा से व्यक्ति को ईश्वर और आत्म-साक्षात्कार की ओर ले जाना रहा है, ताकि वह छल, कपट और लालच जैसे विकारों...

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रसोई का पलायन

दादी की पारंपरिक रसोई और आधुनिक मॉड्यूलर किचन का अंतर

आज जब रसोई में स्टील के डब्बों से लेकर माइक्रोवेव की बीप तक सब कुछ शोर करता है, तब अनायास ही स्मृति में गूँज उठती है वह धीमी-धीमी आवाज़ चूल्हे के नीचे जलती लकड़ी की चिट-चिट की.. और वह कभी न भूली जा सकने वाली याद.. आँच पर सौंधी-सी रोटी पकने की, पीतल की कढ़ाही में सरसों के तेल की...

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ज़िंदगी दिखावे से ज्यादा, जीने की चीज़ है.. भूल बैठी है नई पीढ़ी

मोबाइल में उलझी नई पीढ़ी और रिश्तों की दूरी

एक समय था जब घरों में खामोशी इबादत की तरह होती थी, लेकिन अब तो खामोशी भी बेहद डरावना रूप ले चुकी है। एक समय वह भी था जब रिश्ते धीरे-धीरे परिपक्व होते थे, अब तो इंस्टेंट कॉफी की तरह बनने और टूटने लगे हैं। यह एक ऐसा कड़वा सच है, जिसके दलदल में नई पीढ़ी धीरे-धीरे फँसती चली जा...

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दादी माँ 

गाँव में पशु-पक्षियों को दाना देती दादी माँ

अब दादी माँ हमारे साथ नहीं हैं.. उनके साथ बिताए दिन यादों के पुराने संदूक में छिपे बैठे हैं। जो कभी हमारी पहचान थीं, वो यादें अब धुँधला-सी गई हैं। दादी माँ तो किसी पुराने संदूक की तरह गाँव में ही छूट गईं, और हम अपने खास-खास सामान के साथ बड़े-बड़े शहरों में आकर बस गए। क्या सोच रहे हैं??...

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पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं…….

पिंजरे में कैद पक्षी और पराधीनता का दर्द

रामचरित मानस की यह चौपाई बताती है कि किसी के अधीन रहना कितना बड़ा अभिशाप होता है। हमारे धर्मिक ग्रन्थ हमें बहुत सी ऐसी बातें बताते हैं, जिन्हें स्वयं अनुभव करना कोई नहीं चाहेगा। उन्हीं में से एक है, पराधीनता…. हर कोई स्वतंत्रता चाहता है फिर चाहे वह इंसान हो या पशु-पक्षी। बात जब पशु-पक्षी की चली है, तो मैं...

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दान-पुण्य के झूठे ढकोसलें

जीते जी उपेक्षित माता-पिता, मरने के बाद दान-पुण्य

संसार का यह नियम है, जो इस धरती पर आया है उसे एक न एक दिन अपना जीवन काल पूरा करके मृत्यु को प्राप्त करना ही है। लगभग सभी धर्मों की यह मान्यता है कि किसी के मरने के बाद उसके लिए कुछ किया जाना चाहिए। उस व्यक्ति के मरने के बाद न जाने कितनी ही वस्तुओं का दान किया...

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