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शिक्षा व्यवस्थाओं के किए-कराए पर पानी फेरने का काम कर रहीं परीक्षाएँ

परीक्षा के दबाव में उलझे भारतीय छात्र और खोती हुई शिक्षा की आत्मा

भारत में शिक्षा व्यवस्था को लेकर हमेशा से उठते पेंचीदे सवाल शायद ही कभी खत्म हो सकेंगे। निरंतर आगे बढ़ते देश में शिक्षा का स्तर ऊपर जा रहा है या नीचे? क्या वास्तव में हमारे देश की शिक्षा व्यवस्थाएँ छात्रों के भविष्य को समृद्ध बनाने के काबिल हैं? ऐसे तमाम सवालों का एक बड़ा हिस्सा परीक्षा व्यवस्था की पोटली में...

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“ओल्ड इज़ गोल्ड” कहावत एकदम खरी

भारतीय संस्कृति में बड़ों के पैर छूते बच्चे और आधुनिक मोबाइल संस्कृति का विरोधाभास

आज के समय में देखा जाए तो संस्कार और शिक्षा दोनों ही बदल चुके हैं। प्राचीन समय में लोग अपने बच्चों को गुरुकुल में शिक्षा ग्रहण करने के लिए भेजा करते थे, जहाँ वे शिक्षा के साथ-साथ सामाजिक और धार्मिक ज्ञान भी अर्जित करते थे। फिर धीरे-धीरे समय बदला और अंग्रेजी सभ्यता ने भारतीय संस्कृति और परम्पराओं को जकड़ लिया।...

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शिक्षक तो पढ़ा रहे हैं, लेकिन क्या बच्चे सीख भी रहे हैं?

भारतीय कक्षा में पढ़ाते शिक्षक और समझने में संघर्ष करते बच्चे

शिक्षा का मतलब कभी-भी किसी खाली पात्र में जल भरने तक ही सीमित नहीं रहा है। महान अर्थशास्त्री तथा नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन एवं अभिजीत बनर्जी भी इस बात की पुष्टि कर चुके हैं कि किसी भी अन्य की तुलना में शिक्षा एकमात्र ऐसा साधन है, जो जीवन के अवसरों में वृद्धि करने का सबसे कारगर जरिया है। हमारे...

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एक निवाले की कीमत……

भारत में भूख और गरीबी की मार्मिक तस्वीर

बर्गर खाने की इच्छा हुई.. पास के मैक डोनाल्ड पर पहुँच जाओ। चाट खाने का मन हुआ.. चाट का ठेला बिल्कुल सड़क के किनारे ही है। घर के खाने से ऊब गए.. फटाफट तैयार हुए और बाहर किसी बढ़िया से होटल में खाना खा आए। हम लोगों के लिए, खाना एक रोजमर्रा का आनंद है, हमारी उँगलियों पर एक से...

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नहीं दरिद्र सम दुःख जग माहीं

भारत में गरीबी और भोजन की बर्बादी का मार्मिक दृश्य

तुलसीदास जी द्वारा रचित रामचरित मानस की यह चौपाई आज के समय को देखते हुए बिल्कुल सटीक बैठती है, जहाँ गरीबी से बड़ा कोई दुःख ही नहीं है। आज अमीर और अमीर होता जा रहा, जबकि गरीब और गरीब होता जा रहा है। पहले के समय में लोग कहते थे, दाल-रोटी खाओ, प्रभु के गुण गाओ। लेकिन आज के समय...

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जानवरों के लिए भोजन निकालने की प्रथा भी अब विलुप्ति की कगार पर

भारतीय संस्कृति में गाय, कुत्ते और पक्षियों को भोजन कराते बच्चे

भारत की संस्कृति बहुत विराट है। यह हर उस जीव के बारे में सोचती है, जो पृथ्वी पर रहता है। संस्कृति हमारे बारे में ही सोचती है, अफसोस हम संस्कृति के बारे में कभी नहीं सोच सके और शायद कभी सोच भी नहीं सकेंगे। सबसे बड़ी सीखों में से एक हमारी संस्कृति ने हमें यह दी है कि हर दिन...

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क्या हम ‘अतिथि देवो भवः’ और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का असली अर्थ जान पाए हैं?

भारत में इंसान और मूक जानवरों के बीच करुणा और अतिथि भाव का दृश्य

क्या ‘अतिथि देवो भवः’ वाक्यांश में इंसानों की ही बात कही गई है, जानवरों की नहीं? समय के पहिए के घूमने के साथ संस्कृति और परम्पराओं में कई बदलाव देखने को मिले हैं। पहले के समय में घर के दरवाज़े पर कोई याचक आया करता था, तो उसे कभी-भी खाली हाथ नहीं लौटाया जाता था। अतिथि आया करता था, तो...

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दुनियादारी की होड़ में अब दया भी बिकाऊ

भारत में मासूम बच्चों की गरीबी और बिकती संवेदनाओं का विरोधाभास दर्शाता दृश्य

दो मासूम.. एक की उम्र लगभग 5 या 6 वर्ष.. और एक की मुश्किल से 1 वर्ष.. शरीर पर आधे-अधूरे कपड़े.. चेहरे पर बेबसी.. आँसूओं से लबालब भीगी हुईं आँखें.. एक नहीं, दोनों की.. कौड़ियों के दाम बिकता बचपन.. भूख की असहनीय पीड़ा.. तड़प रोटी की.. अपनी उम्र से लगभग 50 वर्ष अधिक जी लेने वाला वह 5 वर्षीय बच्चा...

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थाली से नाली तक का सफर

भारत में भोजन की बर्बादी और किसानों के श्रम के बीच का विरोधाभास दर्शाता दृश्य

शान दिखाना नहीं, बल्कि पेट भरना है भोजन का असली मतलब भारत, एक कृषि प्रधान देश है, जहाँ किसानों के श्रम और समर्पण से लाखों-करोड़ों लोगों को भर पेट भोजन मिलता है। सही मायने में किसान हमारे देश की रीढ़ हैं, जो अपने खून-पसीने से अपने जीवन के दिन-रात एक करके अन्न उगाते हैं। सिर्फ इसलिए, ताकि हम भूखे न...

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एक भूखी भूख..

भारत में भूख से जूझते मासूम बच्चों और इंसानी बेबसी को दर्शाता भावनात्मक दृश्य

जब भी जोरों की भूख लगती है और खाना बनने में तनिक भी देरी होती है, तो थाली-चम्मच पीटने की आवाज़ से पूरा घर गूँज उठता है, “मम्मी-मम्मी खाना दो..” और फिर क्या, कुछ ही देर में उस थाली में माँ रूपी फरिश्ता गर्म-गर्म खाना परोस देता है और इतना ही नहीं, बड़े ही प्रेम से अपने बच्चों और पूरे...

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