हमारे शहरों की हलचल भरी सड़कों पर, हॉर्न बजाती कारों के शोर और भागदौड़ के बीच, हम अक्सर ऐसे लोगों की खामोश चीखें सुनते हैं, जो हर दिन जीवन के लिए संघर्ष करते हैं। कभी रास्तों पर हमें बुजुर्ग पुरुष और महिलाएँ, कमजोर और समय से थके हुए, हाथ फैलाकर बैठे मिलते हैं। कभी खोखली आँखों वाले बच्चे, अपने छोटे-छोटे कंधों पर दुनिया भर का भार लेकर, एक सिक्के या रोटी के टुकड़े की उम्मीद में हमारे पास मंडराते हैं। इन लोगों को देखकर एक पल को तो हमारा मन करुणा से भर जाता है, उनकी स्थिति को देखकर मन में एक दर्द-सा उठता है, हम उनकी इस हालत पर तरस खाते हैं, लेकिन फिर उन्हें उनकी इस स्थिति में ही छोड़कर अपने रास्ते निकल जाते हैं और अपने जीवन में तल्लीन होकर उस पल को भूल जाते हैं।
हर दिन, हमारे न्यूज़फीड्स और टेलीविज़न चमक-दमक और दिखावे की कहानियों से भरे रहते हैं। हम अमीरों की असाधारण जीवनशैली, उनके कार्यक्रमों की भव्यता, लक्ज़री कारों, डिज़ाइनर कपड़ों और छुट्टियों के बारे में पढ़ते-देखते हैं और उनसे आकर्षित होते हैं। जबकि इसके बिल्कुल विपरीत, हम उन लोगों की कहानियों को नज़रअंदाज कर देते हैं, जो भूखे पेट सोते हैं, जो बच्चे कुपोषण से मर जाते हैं, और जो परिवार जीवित रहने के लिए संघर्ष करते हैं। इस नज़रअंदाजी के चलते हमारा समाज तेजी से दो भागों में बंटता जा रहा है, अमीर और अमीर होता जा रहा है और गरीब और गरीब होता जा रहा है। आज अमीर और गरीब की दुनिया में जमीन आसमान का अंतर आ गया है।
यह हालत ऐसे देश में है, जिसने वर्ष 2030 तक भूख से मुक्ति पाने का संकल्प लिया है, जबकि वास्तव में हम इस लक्ष्य को पाने के लिए काम क्या कर रहे हैं, इसका कुछ भी अता-पता नहीं है? असल हालात तो ये हैं कि अमीर और गरीब के बीच की खाई चौड़ी होती जा रही है और हमारी सड़कों पर गरीबी का नज़ारा अब भी आम है। यह असमानता सिर्फ एक आर्थिक मुद्दा नहीं है; यह एक मानवीय संकट है, जो हमारे ध्यान और कार्रवाई की माँग करता है। लेकिन, यह भी सच है कि हम इसे नज़रअंदाज कर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ रहे हैं।
अक्सर हम सड़क किनारे सब्जी बेचते उस बूढ़े व्यक्ति को नज़रअंदाज कर उसके पास से गुजरते हैं और चमचमाते मॉल की ओर चले जाते हैं। तब हम यह भूल जाते हैं कि उनसे खरीदारी का एक छोटा-सा कदम उनके जीवन में कितना बड़ा बदलाव ला सकता है। ये छोटे लेकिन रोजमर्रा के बदलाव उनके जीवन में परिवर्तन की लहर पैदा करने की ताकत रखते हैं। स्थानीय विक्रेताओं और छोटे व्यवसायों का समर्थन करके, हम उनकी आजीविका में योगदान दे सकते हैं और अमीर तथा गरीब के बीच के अंतर को पाटने में मदद कर सकते हैं। उनकी एक वक्त की रोटी का कारण बनकर हम उन्हें भूख की पीड़ा से बचा सकते हैं।
इसके अलावा, शादियों, पार्टियों और अन्य आयोजनों में जो फिजूलखर्ची हम देखते हैं वह भी निराशाजनक है। प्लेटों में भोजन का ढेर लगा हुआ होता है, जिसका अधिकांश भाग कूड़े में चला जाता है, जबकि बाहर ऐसे लोग हैं, जो एक निवाले के लिए कुछ भी कुर्बान कर सकते हैं। भोजन को बर्बाद करने के बजाए, हम इसे जरूरतमंदों तक पहुँचाने में मदद कर सकते हैं। भूखों को खाना खिलाने के लिए समर्पित कई संगठन और पहलें हैं, जिनमें हमारी भागीदारी जरूरतमंदों के जीवन में वास्तविक प्रभाव डाल सकती है।
भूख-मुक्त राष्ट्र बनने की यात्रा ऐसी नहीं है, जिसे अकेले सरकार पूरा कर सकती है। इसके लिए हम सभी को सामूहिक प्रयास करने होंगे। इसके लिए हमें सहानुभूति और जिम्मेदारी की संस्कृति विकसित करने की जरूरत है, जहाँ हम अपने आस-पास के दुःखी और असहाय लोगों को भूलकर भी नज़रअंदाज न करें, बल्कि उनके दुःख को समझें, तथा गरीबी और भूख की लड़ाई में उनका साथ दें। अब समय आ गया है कि हम खुद से पूछें कि हमारा देश कहाँ जा रहा है? क्या हम एक ऐसे समाज की ओर आगे बढ़ रहे हैं, जहाँ हर किसी को सम्मानजनक जीवन जीने का मौका मिले, या क्या हम अपने चारों ओर फैली असमानताओं से संतुष्ट हैं?
अमीरों का और अमीर होना तथा गरीबों का और अधिक गरीब होना मात्र एक आँकड़ा नहीं है; यह हमारे समाज के मूल्यों और प्राथमिकताओं का प्रतिबिंब है। कोशिश करें कि जाने-अनजाने हम इस खाई को और भी अधिक गहरी करने का कारण न बनें। इसके बजाए, इस खाई को भरने के लिए आगे आएँ, मदद के लिए हाथ बढ़ाएँ और उन लोगों के लिए अवसर पैदा करें, जिन्हें उनकी सबसे ज्यादा जरूरत है। ऐसा करके, हम एक ऐसा भविष्य रचने की दिशा में काम कर सकते हैं, जहाँ एक भी व्यक्ति भूखा नहीं सोएगा, और जहाँ हर किसी को बेहतर जीवन जीने का उचित मौका मिलेगा।
इसके साथ ही अगली बार जब हम अपने पसंदीदा पकवानों का आनंद लें, तो हमारे पास मौजूद इस विलासिता की सराहना करें और उन लोगों को याद करें, जो शायद आज तक इसका स्वाद नहीं ले पाए होंगे। अपनी कृतज्ञता के भाव को कार्य में बदलें, उन लोगों की मदद करने के लिए आगे बढ़ें जिनके लिए भोजन का एक निवाला एक कठिन संघर्ष से प्राप्त जीत है।
भूख सिर्फ भोजन की कमी नहीं है; यह एक अन्याय है जिससे साथ मिलकर निपटा जा सकता है। इसके लिए हम सभी को हर एक निवाले की कीमत समझना होगी। उन लोगों को भी भोजन उपलब्ध करने का प्रयास करना होगा, जो हर दिन इसके लिए संघर्ष करते हैं। क्यों ना अपने छोटे-छोटे प्रयासों से एक ऐसी दुनिया बनाएँ, जहाँ किसी को भी अपने अगले भोजन के लिए संघर्ष न करना पड़े।