हम एक ऐसे देश में रहते हैं, जहाँ का हर कोना खान-पान की एक संपन्न विरासत लिए हुए है। एक ऐसा देश, जहाँ कहीं आपको मसालों की सुगंध मिलेगी, तो कही हवाओं में मिठास घुली होगी। अलग-अलग कोने में अलग-अलग जायका मिलेगा। यह खान-पान तो हमारी पहचान है, लेकिन खाने के शौकीन इस देश की एक सच्चाई और है, जहाँ हर रात न जाने कितने ही बच्चे भूखे पेट सोते हैं। मौन पीड़ा से भरे ये नन्हें मासूम चेहरे देश की आर्थिक वृद्धि की सच्चाई बताते हैं। उनकी भूख एक अनदेखे संकट को बुलावा देती है, जिसे शायद आज हम नहीं देख पा रहे हैं, लेकिन अगर इसका समाधान जल्द ही नहीं किया गया, तो यह न केवल उनके नाजुक जीवन को, बल्कि देश के भविष्य को भी खतरे में डाल देगी। विकास के मुखौटे के नीचे, यह महामारी धीरे-धीरे हमारे समाज के मूल को कुतर रही है, जो हमें करीब से देखने, समझने और जल्द ही इसे रोकने की चेतावनी दे रही है।
कुपोषण भारत में अनगिनत बच्चों के जीवन पर एक काली छाया है। उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गाँव की सात साल की आरती के लिए भूख, उसकी कभी साथ न छोड़ने वाली साथी है। उसका कमजोर शरीर और खोखली आँखें दैनिक संघर्षों और अधूरी जरूरतों की कहानी कहती है। उसके माता-पिता के सभी प्रयासों के बावजूद, उनके पास खाने के लिए पर्याप्त भोजन नहीं है। वे मिलकर जो थोड़ा बहुत खाना जुटा पाते हैं, वह आरती के बढ़ते शरीर को पोषण देने के लिए काफी नहीं है।
बच्चों के स्वास्थ्य पर कुपोषण का प्रभाव विनाशकारी होता है। यह उनके शारीरिक विकास को रोकता है, उनकी प्रतिरक्षा प्रणाली को कमजोर करता है और उन्हें बीमारियों के प्रति संवेदनशील बनाता है। आरती के लिए बार-बार बीमार होना जीवन का हिस्सा है। साधारण संक्रमण, जिससे एक सुपोषित बच्चे को कोई फर्क नहीं पड़ता, वह आरती के जीवन के लिए खतरा बन जाता है। आवश्यक पोषक तत्वों की कमी का मतलब है कि उसका शरीर किसी छोटी-सी बीमारी से नहीं लड़ सकता है, और बीमारी का प्रत्येक दौर उसे कमजोर कर देता है। बच्चों पर भूख का प्रभाव शारीरिक हानि से कहीं अधिक होता है। कुपोषण सोचने समझने की क्षमता पर भी असर डालता है, जिससे आरती जैसे बच्चों को ध्यान केंद्रित करने और सीखने में कठिनाई होती है।
इसका असर इस वाकये से समझ सकते हैं, जब एक रोज एक छोटी, मंद रोशनी वाली कक्षा में, आरती पीछे बैठी थी, उसकी आँखों से थकान और भूख साफ झलक रही थी। ब्लैकबोर्ड पर लिखा हर शब्द उसके लिए धुँधला हो रहा था, सो अक्षरों को पढ़ने में दिमाग लगाने पर कक्षा में चल रहे पाठ के साथ तालमेल बैठाने में उसे परेशानी होने लगी। और यही आरती के लिए रोज की कहानी है। जब भूख और कमजोरी नहीं-सी बच्ची को अंदर ही अंदर खा रही हो, तो पढ़ाई लिखाई करे भी तो कैसे..
भूख एक बच्चे की सामान्य रूप से चलने फिरने की क्षमता पर भी असर डालती है। जब आरती का परिवार पर्याप्त भोजन नहीं जुटा पाता, तो वह अक्सर इतनी कमज़ोर हो जाती है कि स्कूल तक का सफर भी तय नहीं कर पाती है। यहाँ तक कि जब वह स्कूल भी जाती है, तो उसका खाली पेट उसे कुछ सीखने नहीं देता है। कुपोषण और खराब शिक्षा का चक्र बच्चों को गरीबी के दुष्चक्र में फँसा रहा है, जिससे उनके लिए इससे मुक्त होना और बेहतर भविष्य बनाना लगभग असंभव हो रहा है।
भारत में बच्चों की भूख एक अदृश्य संकट है, जो शायद आज हमे दिखाई नहीं दे रहा है। आज जब पूरा देश अपनी उपलब्धियों का जश्न मना रहा है और प्रगति की ओर बढ़ रहा है, लेकिन इसी देश के किसी कोने में लाखों बच्चे चुपचाप भूख से तड़प रहे हैं। इस समस्या की गहराई आप इस बात से समझ सकते हैं कि यूनिसेफ के अनुसार, दुनिया में हर तीन कुपोषित बच्चों में से एक भारत में रहता है। कई सरकारी योजनाओं के बावजूद, यह समस्या जस की तस बनी हुई है, जो अक्सर नौकरशाही की अक्षमताओं और भ्रष्टाचार के कारण और भी गंभीर हो जाती है।
यह अनदेखा संकट केवल मानवीय चिंता का विषय नहीं है, बल्कि यह भारत के भविष्य के लिए भी एक बड़ा खतरा है। कुपोषित, अशिक्षित बच्चों की एक पीढ़ी राष्ट्र के विकास में योगदान नहीं दे सकती है। आगे चलकर यही बच्चे देश के भविष्य बनेंगे, और गरीबी और भूखमरी के चक्र में ऐसे ही फँसे रहेंगे। समृद्ध और संपन्न भारत का सपना इस कड़वी सच्चाई से धुंधला हो रहा हैं कि इसके सबसे कमजोर नागरिकों को पीछे छोड़ दिया जा रहा है जो कल देश का भविष्य बनेंगे। अगर आज इस समस्या से नहीं निपटा गया, तो इसका परिणाम आने वाली पीढ़ियों को भुगतना पड़ेगा। अगर आने वाली पीढ़ी स्वस्थ नहीं रही तो देश कि उत्पादकता तो कम होगी ही यह स्वास्थ्य देखभाल का खर्च भी बढ़ा देगी। इस तरह कुपोषण देश के लिए एक बहुत बड़ा आर्थिक संकट सामने लाएगा। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि लाखों बच्चों के कष्ट झेलने की कीमत आखिर हम कैसे चुका पाएँगे। आरती और उसके जैसे लाखों बच्चों के लिए तो यह जीवन और मृत्यु का सवाल है।
इस समस्या से निपटने का एक ही तरीका है कि हम भोजन की अहमियत को समझें। अगर आज हमारी थाली में पर्याप्त खाना है, तो कोशिश करें कि किसी जरूरतमंद बच्चे को भी उतना ही खाना मिल सके, जितनी उसकी जरुरत है। आज हम शादियों-पार्टियों में, होटलों में जो खाना बर्बाद करते है, वही खाना किसी जरूरतमंद का पेट भर सकता है। इसके साथ ही पोषण कार्यक्रमों के वितरण में सुधार करना और यह तय करना भी जरुरी है कि भोजन उन लोगों तक पहुँचे, जिन्हें इसकी सबसे अधिक जरुरत है। वहीं, गरीबी के मूल कारणों को समझना भी जरुरी है, जो कुपोषण को बढ़ाते हैं।
कुपोषण की समस्या को हल करके हम पूरी पीढ़ी को संवार सकते हैं, और देश के लिए एक उज्जवल भविष्य बना सकते हैं। आखिरकार किसी समाज का असली माप यह है कि वह अपने सबसे कमजोर सदस्यों के साथ कैसा व्यवहार करता है। आइए यह कोशिश करें कि देश में कोई बच्चा भूखा न सोए, क्योंकि उनकी भलाई में ही बेहतर कल की आशा छुपी हुई है।