बर्गर खाने की इच्छा हुई.. पास के मैक डोनाल्ड पर पहुँच जाओ। चाट खाने का मन हुआ.. चाट का ठेला बिल्कुल सड़क के किनारे ही है। घर के खाने से ऊब गए.. फटाफट तैयार हुए और बाहर किसी बढ़िया से होटल में खाना खा आए। हम लोगों के लिए, खाना एक रोजमर्रा का आनंद है, हमारी उँगलियों पर एक से बढ़कर एक खाने के विकल्प मौजूद हैं। फिर भी, हम कितनी बार इस बात की अहमियत को समझते हैं? हम कितनी बार उन लोगों को याद करते हैं, जो हर दिन खाने के एक-एक निवाले के लिए भी लिए संघर्ष करते हैं?
कल्पना कीजिए कि हर सुबह आपकी नींद, खाली पेट के कारण दर्द से खुलती है और आप यह भी नहीं जानते कि आपको खाना कब, कहाँ और कैसे मिले पाएगा। यह कल्पना करना ही कितना डरावना है न! लेकिन यह भारत के लाखों लोगों के लिए कड़वी सच्चाई है। उनके लिए खाने के एक निवाले की कीमत पैसे से नहीं, बल्कि अस्तित्व के लिए अथक संघर्ष से मापी जाती है।
शहरों की हलचल के बीच, ऐसे कितने ही चेहरे होते हैं, जिन पर कभी किसी का ध्यान नहीं जाता। यह चेहरे उस दुर्बल बूढ़े आदमी की तरह हैं, जिसमें कभी बैल जैसी ताकत थी, लेकिन बूढ़ा होने के बाद अब सड़कों पर भीख माँग रहा है। उसकी आँखें भूखे बिताए अनगिनत दिनों की कहानी कहती हैं, उसके हाथ चार पैसों की भीख के लिए बेबाकी से आगे बढ़ जाते हैं, जो शायद उसके लिए रोटी का एक टुकड़ा खरीद सकें। या तीन बच्चों की उस माँ के बारे में सोचिए, जो रोज भूखी रह जाती है, ताकि उसके बच्चे भर पेट खाना खा सकें। वह घर-घर जा कर झाड़ू-पोछे का काम करती है, लेकिन फिर भी मुश्किल से ही गुजारा कर पाती है। उसके बच्चे, हालाँकि छोटे हैं, लेकिन उन्होंने इस छोटी उम्र में ही अभाव का कठोर सबक सीख लिया है, वे अक्सर रात को अपने पेट के गुर्राने के साथ बिस्तर पर जाते हैं।
एक बच्चे की दुर्दशा पर विचार कीजिए, जो कुछ खाने लायक चीज़ पाने की उम्मीद में कूड़े के ढेर को टटोला करता है।
उस पेंटिंग को बनाने वाले ने उन बच्चों के दर्द को बिल्कुल जीवंत करते हुए अपनी कला का प्रदर्शन किया था, जो लोगों का ध्यान बर्बस ही अपनी और खींच रही थी। लोग उस पेंटिंग को देखकर बड़े भावुक हो रहे थे। उनका कहना था कि कितना दर्द है दोनों बच्चों की आँखों में.. सबने उस पेंटिंग की सराहना की, लेकिन किसी ने भी उस पेंटिंग के पीछे की कहानी को जानने की कोशिश नहीं की।
दरअसल, इस पेंटिंग को कलाकार ने फुटपाथ पर रहने वाले दो गरीब बच्चों को देखकर बनाया था, जो अपनी माँ के काम से वापस आने के इंतजार में भूख से बिलख रहे थे। उस एक-डेढ़ वर्ष के बच्चे को नहीं पता मजबूरी क्या होती है, लेकिन उसके 5-6 वर्ष के भाई को बखूबी पता था। इसलिए खुद भी भूख से तड़पने के बावजूद वह अपने छोटे भाई को गोद में लिए यह दिलासा दे रहा था कि माँ जल्द ही खाने को कुछ लेकर आएँगी।
मैंने जब उस पेंटिंग को अखबार में देखा तब मुझे समझ आया कि क्यों पुराने लोग कहा करते थे, “भूख में जहरीली रोटी भी मीठी लगती है”। भूख से तड़पते बच्चों को कहाँ खबर रहती है जहर और अमृत की, उन्हें तो बस अपनी भूख की आग बुझाने के लिए रोटी चाहिए होती है।
इन्हीं सब बातों के जंजाल में उलझे हुए मुझे ख्याल आया कि जब से हम भारतीय लोगों ने पाश्चात्य सभ्यता को अपनाया है, तब से देश में यह भुखमरी नाम के राक्षस का जन्म हुआ है। जो लोग गाँव से जुड़े होंगे, उन्होंने देखा होगा कि आज से कुछ समय पहले गाँव-देहात में शादी-ब्याह जैसे बड़े कार्यक्रमों में खाना खाने के लिए जमीन पर टाट-पट्टी बिछाकर पत्तों से बनी थाली (पत्तल) में लोगों को भोजन कराया जाता था। इसे सम्मान का भोजन कहा जाता था, क्योंकि लोग इत्मीनान से बैठकर भरपेट भोजन करते थे और थाली में जूठा न छोड़ने की परंपरा को निभाते थे। उस समय ये बड़े-बड़े होटलों और मैरिज हॉल का चलन कहाँ था?
धीरे-धीरे समय बदलता गया और लोग पाश्चत्य संस्कृति को अपनाने लगे। आज आलम यह है कि भारतीय लोगों के तौर-तरीके, पहनावा-ओढावा, खाना-पीना सब विदेशी हो चुके हैं। अब शादी-ब्याह में लोग साजो-सज्जा में लाखों-करोड़ों रुपए खर्च कर देते हैं। इन आलीशान शादी-समारोहों में पचासों तहर की मिठाइयाँ और अनगिनत व्यंजनों की प्रदर्शनी लगी होती है, जहाँ लोग थाली भर-भर कर व्यंजन परोस तो लेते है, लेकिन पसंद न आने पर उसे कूड़ेदान में डालने में तनिक भी देर नहीं करते हैं। मुझे नहीं लगता इन समारोहों में आने वाला एक भी व्यक्ति इन सभी व्यंजनों का स्वाद ले पाता होगा।
हमारे देश में विडंबना यही है कि यहाँ लोग दिखावा करने में लगे हैं। किसने कितनी महँगी शादी की, किसकी शादी में ज्यादा व्यंजन थे? दिखावे की इस दौड़ में लोग यह भूल जाते हैं कि अधिकता हर चीज की बुरी होती है और जरुरत से ज्यादा बनवाया गया भोजन भी व्यर्थ ही जाता है।
मुझे लगता है जितना पैसा लोग दिखावे के लिए साजो-सज्जा में खर्च करते हैं, उतने पैसों का भोजन बनवाकर यदि गरीबों को खिलाया जाए तो देश से शायद भुखमरी जैसे राक्षस का सर्वनाश किया जा सकता है। उनकी दुआएँ लगेंगी, सो अलग। और हम सभी जानते हैं कि जहाँ दवा काम नहीं करती, वहाँ दुआ काम करती है। हम सभी को पाश्चात्य सभ्यता को भूलकर भारतीय सभ्यता के तौर-तरीके फिर से अपनाने चाहिए। व्यंजनों की प्रदर्शनी वाले भोजन के तरीके की जगह टेबल-कुर्सी पर बैठकर कराए जाने वाले तरीके को अपनाना चाहिए, ताकि लोग भर-पेट भोजन भी कर सकें और खाना व्यर्थ भी न हो। लोग इस विधि को अपनाकर ‘एक पंथ दो काज’ जैसी कहावतों को सार्थक बना सकते हैं।