किसने बनाए हैं ‘जूठन’ और ‘उतरन’ जैसे शब्द?

झुग्गी बस्ती के बाहर बैठा भूखा बच्चा कूड़े के पास रखा बचा हुआ खाना देखता हुआ

लम्बे समय की सेविंग के बाद पिछले महीने ही अपने लिए इतना महँगा शर्ट खरीदा था, इतनी जल्दी यह मुझे छोटा होने लगा है, एक काम करता हूँ किसी को दे देता हूँ.. आज फिर माँ ने टिफिन में दो रोटी ज्यादा रख दी, यह फिर फेंकने में जाएगी, किसी को दे देता हूँ..

यह जो हमारे द्वारा अपने कपड़ों आदि को किनारा किया जाता है न! वो कपड़े, जो अब हमारे पहनने योग्य नहीं रहे, जब हम किसी जरूरतमंद को देते हैं, तो दुनिया बड़े ही प्यार से इसका नामकरण करके ‘उतरन’ रख देती है। बचा हुआ खाना, जो गले-गले तक पेट भरने के बाद भी अब खाया नहीं जा रहा, दुनिया उसे ‘जूठन’ नाम से पुकारती है।

ये नामकरण किए किसने हैं? स्थिति के अनुसार पलटी खाना मेरे मायने में इंसान का काम है, भोजन या फिर कपड़ों का नहीं.. बेशक ये नाम भी तो इंसान ने ही रखे हैं। खाना कभी नहीं कहता कि महाशय! आपका पेट भरके के बाद अब में किसी काम का नहीं रहा, मैं जूठन हूँ। और न ही कपड़ा कहता है कि महोदय! मैं आपके पहनने के काबिल नहीं रहा, अब मैं सिर्फ उतरन कहलाने के ही लायक हूँ।

कल मैं अपने एक मित्र के साथ होटल में लंच के लिए गया था। वहाँ भी मैंने यह शब्द सुना। अपनी मेज पर बैठे-बैठे मैं कुछ ही दूरी पर बैठे लोगों के एक समूह को देख रहा था। वे 6 लोग थे, जो उसी होटल में लंच के लिए आए थे। लेकिन, दिखावे की चादर में उनमें से किसी एक को भी यह बात समझ में नहीं आई कि उन्होंने जो खाना ऑर्डर किया है, वो कम से कम 12 लोगों का पेट भरने के लिए पर्याप्त है। बनी बात है, एक व्यक्ति दो पेट खाना तो खाएगा नहीं, हँसी-ठिठौली करते हुए उन सभी ने भर पेट खाना खाया और लम्बे-चौड़े बिल का पेमेंट करके बड़ी ही आसानी से यह कहते हुए चले गए कि यार! बहुत जूठन बच गई। वो तो इतना खाना छोड़कर वहाँ से चले गए, लेकिन मैं वहीं बैठा का बैठा रह गया।

दुनिया इस बचे हुए भोजन का नाम बदलकर इसे जूठन कहती है, सो मैं भी फिलहाल इसी शब्द का प्रयोग कर रहा हूँ..

वो सभी आधे से अधिक जूठन छोड़कर चले गए। उनके द्वारा किए गए ऑर्डर में से कई व्यंजन ऐसे थे, जिन्हें उन्होंने चखा तक नहीं था। मैं कुछ समझ या बोल पाता, इससे पहले ही क्या देखता हूँ कि वेटर उस टेबल के पास आया और बिना कुछ सोचे-समझे उसने सारा का सारा खाना कूड़े में फेंक दिया। सच कहूँ, मेरे साथ-साथ मेरा दिल भी वहीं बैठ गया। यह सरासर फिजूलखर्ची थी, न सिर्फ भोजन की, बल्कि पैसों की भी, जो दिल को कचोटकर रख देने वाली थी। सच-मुच इतने सारे भोजन की बर्बादी मेरे सीने में गहरी पीड़ा छोड़ गई।

न जाने क्यों भोजन की बर्बादी करने वाले इन लोगों को उन मजबूर इंसानों और अन्य जीवों का ख्याल नहीं आता, जिन्हें भोजन नसीब नहीं होता? न जाने क्यों उन्हें यह दिखाई नहीं देता कि वो लोग किस तरह हर दिन तिल-तिल मरते हैं, हर दिन जीने के लिए? न जाने क्यों इन लोगों को ट्रैफिक सिग्नल और सड़क के किनारे बैठे मासूम बच्चे नहीं दिखते, जिनकी एक-एक हड्डी उनके शरीर में से झाँककर भोजन की गुहार लगाती फिरती है? न जाने क्यों जो पीड़ा मेरे मन को भीतर तक झंझोड़कर रख देती है, वह भोजन को कूड़े में झोंकने वाले लोगों के मन में नहीं उठती?

हमारे उतरे हुए कपड़े और बचा हुआ खाना ही क्यों किसी को देना है हमें? क्या हम सिर्फ चीजों और भोजन को बर्बाद करने के लिए ही सक्षम हुए हैं? इसे यदि सक्षम कहा जाता है, तो फिर मुझे तो इन शब्दों की डिक्शनरी पर ही शंका है। सक्षम हमें तब कहा जाएगा, जब हमें जितनी जरुरत हो हम उतना ही खरीदें, उतना न खरीदें कि इसे बर्बाद करने की नौबत का हमें सामना करना पड़े। इन पैसों से हम जरूरतमंदों के लिए उपयुक्त सामान खरीदें, उन्हें भर पेट भोजन कराएँ, उतरन या जूझन से नहीं..

कभी सोचकर देखिएगा कि कैसा लगता होगा उन्हें, जब अपना पेट भरने के लिए वे आपका जूठा खाना खाने से पहले कुछ सोचते भी नहीं हैं.. आप खा सकते हैं ऐसे किसी भी राह चलते व्यक्ति का जूठा खाना? अपने परिवार के लोगों और दोस्तों तक के साथ या उनका जूठा खाना कोई बड़ी बात नहीं है, लेकिन वह व्यक्ति, जिसे आप जानते तक नहीं हैं, और न ही यह जानते हैं कि वह आपके लिए खाना लाया कहाँ से है, किस उद्देश्य से आपको दे रहा है, ऐसे हजारों सवाल आपके दिमाग में दौड़ने लगेंगे, यदि गलती से भी आपने इस स्थिति का सामना करने के बारे में सोच भी लिया तो.. फिर सोचिए, वे हर दिन इस स्थिति का सामना करते हैं, बिना आपसे यह सवाल किए कि आप यह खाना लाए कहाँ से हैं? एक बात बताइए, कभी कोई गरीब आपसे किसी दिन पूछ बैठे कि भाई साहब! आप जो खाना मुझे दे रहे हैं, मैं खा तो लूँगा, लेकिन यह बताइए कि ये जूठा तो नहीं है न? महसूस करके देखना, यदि ऐसा कभी हुआ तो.. भीतर तक रूह काँप जाएगी..

लेकिन, अफसोस वे लोग आपसे ऐसा कोई सवाल नहीं पूछते, जिससे आपके मन को ठेस पहुँचे, क्योंकि वे लोग अच्छे से जानते हैं कि मन को ठेस पहुँचने पर कैसा महसूस होता है। वे जानते हैं कि वे मजबूर हैं, आप नहीं देंगे, तो शायद उसके बाद उन्हें भोजन मिलेगा भी या नहीं, वे यह भी नहीं जानते। वे सिर्फ इतना जानते हैं कि पेट भरने के लिए भोजन की जरुरत होती है। और जो भी माध्यम पेट भरने का उन्हें मिल जाए, उनके लिए वह सिर्फ और सिर्फ भोजन है। वे आपकी भाषा नहीं समझते, उनके लिए यह भोजन और कपड़े ही होते हैं, जूठन या उतरन नहीं.. ये शब्द अमीरों के चोचले मात्र से कुछ भी अधिक नहीं है, गरीबों की डिक्शनरी में ये शब्द नहीं होते हैं। उनकी डिक्शनरी में कोई शब्द होते हैं, तो बस जरुरत, मजबूरी, दया और दुआ.. शायद इसलिए कि वे चीजों की कदर करना जानते हैं..

कहने का मतलब यही है कि अधिक मात्रा में लेकर उसे बर्बाद करने से अच्छा है, जरुरत के अनुसार ही वस्तुएँ और भोजन लिया जाए। यह न सिर्फ भोजन और वस्तुओं, बल्कि पैसों की भी बचत होगी। और यही बचत तब सदुपयोग कहलाएगी, जब इन पैसों से आप जरूरतमंद लोगों को उनकी जरुरत की वस्तुएँ, कपड़े और भोजन आदि उपलब्ध कराएँ। यदि उपरोक्त बातों से आपके विचार में थोड़े भी बदलाव आ जाएँ, तो मेरे विचार सफल हो जाएँ।

Share