शुरुआत कहाँ से करें?

कमज़ोरी से ताकत की ओर बढ़ता भारतीय युवक, अंधेरी सुरंग से उजाले की ओर चलता हुआ

शुरुआत कहाँ से करें? शायद वहीं से जहाँ हम अक्सर ठिठक जाते हैं.. शायद वहीं से, जहाँ पहली बार किसी की बात ने भीतर तक चुभा दिया था, और हम चुपचाप मुस्कुरा दिए थे, ताकि किसी को महसूस न हो कि भीतर तक सब कुछ हिल चुका है। जहाँ हम पहली बार कमज़ोर कहे गए थे और हमने ऊपर से अनसुना कर दिया था, लेकिन भीतर एक दरार-सी बन गई थी। वह लम्हा याद है, जब लगा था कि सब भाग रहे हैं, और हम जैसे वहीं अटके-से रह गए हैं.. न तो आगे जा सकें, और न ही पीछे को लौट सकें। कमज़ोरी कोई ताज पहनकर नहीं आती, वह तो अक्सर खामोशी से हमारे भीतर उतरती है, जैसे किसी को बिना बताए कोई किराएदार घर में रहने लग जाए। धीरे-धीरे वो हमारी सोच में बस जाती है, हमारे फैसलों में दिखने लगती है और फिर एक दिन हमारी पहचान बन बैठती है।

लेकिन, यहाँ एक बहुत बड़ा सवाल उठता है कि क्या हमारी पहचान वाकई हमारी कमज़ोरी से तय होती है? नहीं। असल में, कमज़ोरी तो वह जगह है, जहाँ से हमारी असली यात्रा शुरू होती है। हाँ, शुरुआत में वो जगह अंधेरी लगती है, डरावनी लगती है, लेकिन यदि आप यह बात समझ गए, तो मानो बहुत कुछ मिल गया, क्योंकि यहीं पर खुद से मिलने की गुँजाइश सबसे ज्यादा होती है। हम अक्सर सोचते हैं कि ताकत वही होती है, जो दिखती है, जो ऊँची आवाज़ में बोले, जो मंच पर खड़ा हो जाए, जो तेज़ दौड़ सके। लेकिन, कभी किसी को बिना बोले भी ताकतवर होते देखा है? किसी की चुप्पी में कभी गरज सुनी है? कई बार जो टूटा होता है, वही सबसे मजबूत हो जाता है, क्योंकि उसे दोबारा खुद को जोड़ना आता है।

फ्रिदा काहलो की ज़िंदगी ऐसी ही थी.. पीड़ा से भरी, लेकिन रंगों से लिपटी हुई। पोलियो से झुका शरीर, सड़क दुर्घटना में टूटे अंग और महीनों उसे बेबस पड़े रखने के लिए तैयार बिस्तर.. लेकिन बिस्तर पर लेटी उस लड़की ने जो चित्र रचे, वो आज भी अपने पैरों पर खड़े लोगों की सोच से कहीं आगे हैं। उसकी तस्वीरें कोई खूबसूरती नहीं बयाँ करतीं, वे दर्द की भी सुंदरता दिखाती हैं.. ऐसी सुंदरता, जो सतह से नहीं, आत्मा से उपजती है। उसने न ही अपनी कमज़ोरी को छिपाया और न ही अपनी किस्मत या बेबसी पर वह रोई, उस लड़की ने तो चित्रों में रंग भरकर अपनी बेरंग ज़िंदगी को भी रंग लिया और उसे ही अपनी पहचान बना लिया।

फ्रिदा काहलो और कोई नहीं, बल्कि मेक्सिको की एक महान चित्रकार थीं, जिनकी पहचान उनकी रंगों से भरी लेकिन दर्द से उपजी पेंटिंग्स हैं। बचपन में पोलियो और फिर एक भयानक बस एक्सीडेंट के बाद उनका शरीर तमाम तकलीफों से गुज़रा, लेकिन उन्होंने अपने दर्द को ही अपनी कला की सबसे बड़ी प्रेरणा बना लिया। उनकी पेंटिंग्स आज भी आत्म-स्वीकृति, संघर्ष और स्त्री-स्वर की सबसे बुलंद आवाज़ मानी जाती हैं।

हर बार जब हम सोचते हैं कि काश हम थोड़े और अच्छे होते, थोड़े और मजबूत, तो हमें याद रखना चाहिए कि दुनिया की सबसे बड़ी मिसालें उन्हीं दरारों से निकली हैं, जिन्हें हम कमजोरी कहते हैं। थॉमस एडीसन को पूरी दुनिया बल्ब के आविष्कारक के रूप में जानती है। लेकिन, कभी एक दौर ऐसा भी था, जब स्कूल ने उन्हें निकाल दिया था, क्योंकि शिक्षकों को लगता था कि वो कुछ समझ ही नहीं सकते। ‘कमअक्ल’ कहा जाने वाला वही बच्चा, आगे चलकर अंधेरे में उजाला लाने वाला महान वैज्ञानिक बना। आज उन्हें न सिर्फ बल्ब के लिए, बल्कि फोनोग्राफ और मोशन पिक्चर कैमरा जैसे कई आविष्कारों के रूप में भी याद किया जाता है, और उनके 1,000 से भी ज्यादा पेटेंट्स विज्ञान की दुनिया की नींव हैं।

हेलेन केलर न देख सकती थीं, न सुन सकती थीं, लेकिन उनकी आवाज़ आज भी पूरी दुनिया में गूँजती है। उन्होंने न सिर्फ शिक्षा प्राप्त की, बल्कि विकलांगों के अधिकारों के लिए ज़िंदगी भर काम किया। वे एक सामाजिक कार्यकर्ता, लेखिका और वक्ता बनीं। उन्होंने साबित किया कि जब इरादे मजबूत हों, तो हर दीवार के पार रास्ता निकल ही आता है। 

निक वुयचिच जो एक ऑस्ट्रेलियाई-अमेरिकी ईसाई प्रचारक और प्रेरक वक्ता हैं, उनके पास न हाथ हैं, न पैर, लेकिन जब वे मंच पर खड़े होते हैं, तो लाखों लोग अपनी हिम्मत फिर से तलाशने लगते हैं। और मिस्टर बीन.. यह एक ऐसा किरदार है, जिसने पूरी दुनिया को बिना बोले बेबाक हँसी की सौगात दी। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस किरदार को निभाने वाले रोवन एटकिंसन को बचपन से ही बोलने में दिक्कत थी? उन्हें स्टैमर था, वे अपने जीवन में कई बार हँसी के पात्र बने। लेकिन उन्होंने अपनी इसी कमजोरी को अपनी सबसे बड़ी ताकत बना लिया और बन गए कॉमेडी की दुनिया का बेताज बादशाह।

इन उदाहरणों में से किसी की भी कहानी परफेक्ट नहीं थीं। लेकिन, शायद परफेक्शन की जरूरत ही नहीं होती। जरूरत होती है, तो सिर्फ और सिर्फ उस हिम्मत की, जो अधूरी शुरुआत को भी एक मुकम्मल मिसाल बना दे।

असल बात यह है कि कमज़ोरी हमें तोड़ती नहीं है, वह तो हमारे पास सिर्फ और सिर्फ यह सवाल करने आती है कि ‘अब क्या?’ और जब हम उस सवाल का जवाब ढूँढने निकलते हैं, तब एक नया रूप बनता है.. वह रूप, जो बाहरी आवाज़ों का मोहताज नहीं होता.. जो किसी की मंज़ूरी पर नहीं टिकता। वह तो आत्मबल है, जो हमारे भीतर से ही आता है।

इसलिए जब अगली बार भीतर से आवाज़ आए कि ‘मैं कमज़ोर हूँ’, तो उस आवाज़ को चुप न कराइए। उसे सुनिए, समझिए और फिर उसी जगह से अपने जीवन की नई शुरुआत कीजिए.. क्योंकि ज़िंदगी में सबसे बड़ा परिवर्तन वहीं से आता है, जहाँ हमारी सबसे सच्ची आवाज़ दबाई गई थी.. जहाँ पहली बार आँसू रोकने के लिए हमें मुस्कुराना पड़ा था.. जहाँ ‘कमज़ोर’ शब्द पहली बार चुभा था.. क्योंकि शायद वहीं से आपको आपकी सबसे बड़ी ताकत मिलने वाली है।

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