धर्म, एक ऐसा शब्द है, जिसे सुनते ही मन में पवित्रता और शांति का अनुभव होने लगता है। यह एक ऐसी प्राचीन धारणा है, जो मनुष्य को नैतिकता, आध्यात्मिकता और सन्मार्ग की ओर प्रेरित करती है। धर्म का उद्देश्य सदा से व्यक्ति को ईश्वर और आत्म-साक्षात्कार की ओर ले जाना रहा है, ताकि वह छल, कपट और लालच जैसे विकारों से परे निकलकर अपना कल्याण कर सके। धर्म वह तत्व है, जो मनुष्य को पशुत्व से उठाकर देवत्व तक पहुँचाने की क्षमता रखता है। परंतु आधुनिक समय में, धर्म अपनी गरिमा खोते हुए, कमाई का एक साधन बन चुका है।
समाज में आज कई सामाजिक और सांस्कृतिक मुद्दे हैं, जो मन को अंदर तक झकझोर कर रख देते हैं। उनमें धर्म का व्यवसायीकरण भी एक अहम् मुद्दा है। आज धर्म एक ऐसी वस्तु बन गया है, जिसका उपयोग लाभ अर्जित करने के लिए किया जा रहा है। यह पैसे कमाने का आसान माध्यम बन गया है। धार्मिक स्थलों पर धन का बोलबाला साफ दिखाई देता है। आज आप चाहे किसी भी धार्मिक स्थल पर चले जाएँ, आपको इसके साक्ष्य साफ ही दिखाई पड़ जाएँगे। दर्शन, प्रसाद और दान-दक्षिणा हर जगह केवल पैसों को ही प्राथमिकता मिलती है। जो जितना पैसा देगा, भगवान को वह उतने ही करीब से देख सकता है और जो सक्षम नहीं, वह दूर से ही अपने ईश्वर की एक झलक पाकर मन को मना लेने को मजबूर है।
धर्म एक ऐसा साधन बन गया है, जिससे कमाई निश्चित है। इसलिए हर कोई अपने अनुसार इसका उपयोग कर रहा है। आजकल कथावाचक या धर्मगुरु बनना भी एक नया पेशा बन गया है, जिसमें सफलता की ग्यारंटी पढ़े-लिखे इंजीनियर और डॉक्टर से कहीं ज्यादा है। माया से दूर रहने का ज्ञान देने वाले ही आज सबसे ज्यादा विलासिता और एशो-आराम का जीवन जी रहे हैं। कथा और प्रवचन, जो पहले समाज कल्याण और आत्मशुद्धि के लिए हुआ करते थे, आज लाखों-करोड़ों रुपए की फीस पर आधारित हो गए हैं। हर कोई धर्म का झंडा उठाकर ज्ञान की गंगा बहा रहा है।
सोशल मीडिया के युग में यह व्यवसाय और भी फल-फूल रहा है, जहाँ लोग धर्म और आस्था जैसे संवेदनशील विषयों को लाइक और व्यूज़ के लिए उपयोग कर रहे हैं। मीडिया भी इस प्रवृत्ति से अछूता नहीं है। टीआरपी और चैनल की लोकप्रियता के लिए मीडिया अक्सर धर्मगुरुओं के बीच बहस आयोजित करता है। धार्मिक मतभेदों को उभारकर समाज में वैमनस्य पैदा करना और इससे लाभ कमाना, मीडिया की जैसे कार्यप्रणाली बन गई है। आध्यात्मिक कार्यक्रम, जो समाज कल्याण और आत्मा की शुद्धि के उद्देश्य से आयोजित होते थे, अब बड़े व्यवसाय बन गए हैं। इन कार्यक्रमों में भाग लेने के लिए महँगी टिकटें लगाई जाती हैं और आयोजकों का ध्यान समाज कल्याण से अधिक, आर्थिक लाभ पर होता है।
धर्म, जीवन जीने का एक तरीका है, जो व्यक्ति को सदाचार, नैतिकता और आत्मिक उन्नति का मार्ग दिखाता है। परंतु वर्तमान परिदृश्य में धर्म केवल कमाई का साधन बनकर रह गया है। यह आवश्यक है कि धर्म की गरिमा और उसके मूल उद्देश्यों को पुनर्स्थापित किया जाए। इसकी सबसे बड़ी जिम्मेदारी उन लोगों पर है, जो धर्म के रक्षक और प्रचारक होने का दावा करते हैं।
धर्म केवल आध्यात्मिकता का विषय नहीं, बल्कि समाज के लिए एक प्रेरणा और मार्गदर्शन का स्रोत भी है। इसे व्यवसाय के दायरे से बाहर निकालना हर जागरूक नागरिक का कर्तव्य है। धर्म को व्यापार बनने से बचाने के लिए हमें अपनी सोच बदलनी होगी। इसे आस्था और विश्वास का जरिया बनाए रखना होगा, न कि पैसा कमाने का साधन।