दादी माँ 

गाँव में पशु-पक्षियों को दाना देती दादी माँ

अब दादी माँ हमारे साथ नहीं हैं.. उनके साथ बिताए दिन यादों के पुराने संदूक में छिपे बैठे हैं। जो कभी हमारी पहचान थीं, वो यादें अब धुँधला-सी गई हैं। दादी माँ तो किसी पुराने संदूक की तरह गाँव में ही छूट गईं, और हम अपने खास-खास सामान के साथ बड़े-बड़े शहरों में आकर बस गए। क्या सोच रहे हैं?? मैंने कुछ गलत कहा क्या?? आप खुद ही बताइए, इससे अधिक कीमत हमने छोड़ी ही क्या है दादी की? आज हम बहुत काबिल हैं, लेकिन हमारे पास देखने को दादी माँ की मिलियन डॉलर मुस्कान नहीं है.. सिर रखकर सोने को दादी की गोद नहीं है, बालों में उँगलियाँ फेरते हुए सरसों का तेल लगाने वाले दादी के मुलायम-मुलायम हाथ नहीं हैं, बतियाने को हमारे पास अब कहाँ हमारी सबसे प्यारी दोस्त हैं, जो हाँ में हाँ मिलाकर हमारी सारी शिकायतें सुन लिया करती थीं और दुनिया भर की हमारी समस्याओं का समाधान चुटकियों में हमें दे दिया करती थीं।

दादी माँ की रसोई की खुशबू भी अब सिर्फ यादों में है। वह सुबह-सुबह चूल्हे की लकड़ियों से उठती सौंधी-सी महक, ताजी रोटियाँ और गुड़ की मिठास, सब कुछ जैसे बीते समय की कहानी बनकर रह गए हैं। दादी माँ हर दिन सबसे पहली रोटी गाय के लिए निकाला करती थीं और आखिरी कुत्ते के लिए। और इसमें भी वही स्नेह झलकता था, जो दादी माँ का हमारे लिए होता था। ये उनकी सिखाई हुई परंपराएँ थीं, जो हमें प्रकृति और प्राणियों से जोड़ती थीं। उस एक रोटी में पूरा संसार बसता था, जो हमें सिखाता था कि हर जीव का हमारे जीवन में कितना महत्व है।

हर सुबह दरवाजे पर नंदी बैल का इंतजार होता था। दादी गुड़ की डली हाथ में लेकर दरवाजे पर जातीं और नंदी बड़े प्रेम से उसे खा जाता। यह सिर्फ एक आदत नहीं, बल्कि हमारे जीवन में पशुओं के प्रति दया और प्रेम का प्रतीक था। कबूतरों के लिए दाना और चींटियों के लिए आटा निकालना भी उनकी दिनचर्या का अनमोल हिस्सा हुआ करता था। 

दादी माँ हर शनिवार, अमावस्या और पूर्णिमा के दिनों में सीदा देने मंदिर जाया करती थीं। गली में किसी कुतिया के ब्याने पर चने और गुड़ का प्रसाद बाँटना भी तो दादी माँ ने ही सिखाया था, जो हमारे समाज की किसी समय शोभा हुआ करता था, जिसमें एकता और सहयोग का भाव बखूबी झलकता था। थोड़ा-थोड़ा करके ढेर सारा सामान उस घर से निकल जाया करता था, जहाँ सुविधाएँ बहुत सीमित हुआ करती थीं। एक साधारण-सा टेबल फैन का भी घर में होना बहुत बड़ी बात हुआ करती थी, लेकिन मन का अपनापन और दया का भाव हर कोने में बसा होता था।

दादी माँ ने हमें जीने का जो तरीका सिखाया, उसमें सिर्फ खुद के लिए जीना शामिल नहीं था। उन्होंने हमें सिखाया कि हमारी जिम्मेदारी सिर्फ हमारे परिवार तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि उन सभी के प्रति होनी चाहिए, जो इस धरती पर हमारे साथ रहते हैं। वो पक्षी जो हमारी छत पर दाना चुगने आते थे, वो कुत्ते जो दरवाजे पर बैठकर हमें एक रोटी की आस में बड़े प्रेम से देखा करते थे, वह गाय जो रोज़ सुबह-सुबह आकर घर के बाहर खड़ी हो जाती थी.. ये सभी हमारी ज़िंदगी का हिस्सा थे और दादी माँ ने हमें सिखाया कि इनका भी उतना ही ध्यान रखना चाहिए, जितना कि हम अपनों का रखते हैं।

आज जब बड़े शहरों की ज़िंदगी में इंसान अपने कामों में व्यस्त हो गया है, तब दादी माँ की दी हुई सीखें और भी महत्वपूर्ण हो जाती हैं। छतों पर बैठे कबूतर और अन्य पक्षी इस इंतज़ार में बैठे रहते हैं कि किसी को तो उन पर दया आएगी.. किसी को तो ख्याल आएगा कि बेज़ुबानों को भी भूख और प्यास लगती है.. इस आस में वे बेचारे भूखे-प्यासे ही उड़ जाते हैं और किसी और दर पर भटकने को मजबूर हो जाते हैं। गाय और कुत्ते भी अब शहरों की भीड़ में कहीं खो गए हैं। अब न कोई आँगन में बैठे कबूतरों के लिए दाना डालता है, न ही कोई बेज़ुबान जानवरों को रोटी खिलाने की परवाह करता है। बड़े ही शर्म की बात है कि हमने एक सभ्यता खो दी है। हम अब सिर्फ अपने घरों, कामों और मोबाइल की स्क्रीन में सिमटकर रह गए हैं। दादी माँ ने हमें यह सिखाया था कि जीवन का असली आनंद देना है, न कि सिर्फ लेना। हम तो यह भी भूल गए.. देने की चाह और देकर खुशी के मायने देखने की तलब भी अब हम में कहाँ बची है? खुद में हम इतने मगन हो गए हैं कि हर जीव का हमारे जीवन में महत्व है, यह भी भूल चले हैं।

दादी माँ ने हमें ये अनमोल विचारधारा सीख के रूप में दी, क्योंकि उनके पुरखों से उन्हें ये बातें और आचरण सौगात में मिले थे। हमें यह सब सिखाने का उनका उद्देश्य हम में अच्छे संस्कारों के बीज बोना था, ताकि फलदार पेड़ के रूप में हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को भी यह विरासत सौंप सकें। लेकिन, आज हम क्या कर रहे हैं? हम इस बात को ठीक से समझ भी नहीं पा रहे हैं कि हमने इन संस्कारों को विलुप्त होने की कगार पर खड़ा कर दिया है। मुझे तो लगता है कि जिस दिन हमारी आने वाली पीढ़ियाँ हमारे संस्कारों के बारे में जानेंगी, तो वे सिर्फ किताबों में ही पढ़ पाएँगी कि कभी हमारे समाज में पशु-पक्षियों के लिए भी स्थान हुआ करता था।

ज़रा सोचिए, हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को क्या देंगे? क्या वे यह जान पाएँगे कि कभी इंसान अपने घर के आँगन में बैठकर परिंदों को दाना खिलाता था? क्या वे समझ पाएँगे कि किसी ज़माने में इंसान सिर्फ इंसानों से नहीं, बल्कि हर जीव से प्रेम करता था? यदि आज हम अपनी आदतों और व्यवहार में बदलाव नहीं ला पाए न, तो हमारी आने वाली पीढ़ियाँ सिर्फ इतिहास के पन्नों में ही यह पढ़ेंगी कि हमारे समाज में खुद के साथ ही अन्य प्राणियों के लिए भी स्थान था।

यदि हम अपनी दादी माँ को हमेशा-हमेशा के लिए अमर रखना चाहते हैं, तो उनकी दी हुई सीखों को बचाने के लिए अभी से कदम उठाने होंगे। हमें यह समझना होगा कि इस धरती पर सिर्फ इंसानों का हक नहीं है, हर जीव का समान अधिकार है। हमें फिर से वही स्नेह, वही अपनापन और वही दया का भाव अपनाना होगा, जो दादी माँ ने हमें सिखाए। अब भी समय है कि हम अपने जीवन में बदलाव और फिर से दादी माँ की सीखों को अमल में लाएँ, ताकि हम न सिर्फ अपने जीवन में सुधार कर सकें, बल्कि हमारी आने वाली पीढ़ियाँ भी इस धरोहर को संजोकर रख सकें। 

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