पहले के ज़माने में लोग ‘पहला सुख निरोगी काया’ को मानते थे। पूरे दिन मेहनत-मजदूरी करने के बाद शाम को चौपाल पर बैठकर किस्से-कहानियाँ सुनाया करते थे। उस समय मोबाइल और टीवी नाम के दानव नहीं हुआ करते थे। इसलिए लोग अपना समय बातों-बातों में बड़ी-बड़ी सीख देने वालीं ज्ञान की बातें एक-दूसरे से साझा किया करते थे। वह भी एक समय था, जब मेहनत-मजदूरी करने से शरीर स्वस्थ और निरोगी रहता था, और कोई भी बीमारी आस-पास नहीं भटकती थी।
आजकल लोग जिम में ट्रेडमिल पर तो घंटों दौड़ सकते हैं, लेकिन सुबह जल्दी जागकर खुली हवा में सैर पर जाना उन्हें पहाड़ तोड़ने जैसा प्रतीत होता है। क्या आपने कभी सुना है कि आपके दादा या परदादा को हार्ट अटैक आया हो, या किसी को उस ज़माने में कैंसर हुआ हो? मैंने तो मेरे जीवन के इतने वर्षों में कभी ऐसा नहीं सुना कि पहले के ज़माने में कैंसर, हार्टअटैक या डायबिटीज़ जैसी बीमारी किसी को हुई हो, यदि होती भी होगी, तो सिर्फ कुछ एक लोगों को, लेकिन आज तो आलम यह है कि हर दूसरा व्यक्ति इन बीमारियों से पीड़ित है।
ये सब बीमारियाँ तो आधुनिक ज़माने की ही देन हैं। आज-कल लोगों का खाना-पीना, दिनचर्या आदि सभी चीजें बदल चुकी हैं। लोग देर रात तक मोबाइल पर वेब सीरीज़ देखते हैं और सुबह देर से जागते हैं। फिर ऑफिस जाने की जल्दी, वहाँ से वापस घर आने की भागदौड़, जल्दी-जल्दी खाना खाने और दोस्तों के साथ देर रात तक पार्टी करने में लोग खुद पर और अपने स्वास्थ्य पर ध्यान ही नहीं दे पाते हैं, जिसका परिणाम हम सब देख ही रहे हैं।
फिर आजकल खाने में भी अलग-अलग वैराइटीज़ की जैसे रेल ही चल पड़ी है, जैसे-चायनीज, साउथ इंडियन, पिज़्ज़ा, बर्गर आदि। फिर बीमारियाँ भी इस दौड़ में पीछे कहाँ हैं? अब तो बीमारियों की भी एक से बढ़कर एक वैराइटी देखने को मिलने लगी है।
डिप्रेशन, अनिद्रा, बीपी, थायराइड आदि कितने ही तरीके की बीमारियाँ लोगों में होना आम बात हो गई है। आज-कल युवाओं का डिप्रेशन में जाना, तो जैसे फैशन-सा बन गया है।
अपनी-अपनी पसंद की बीमारी के अनुसार लोग काम करते हैं। जिसकी पसंदीदा बीमारी हाइपरटेंशन है, वह बेफिजूल में दुनियाभर की टेंशन का पुलिंदा अपने सिर पर ढोए फिरता है। जिसे अनिद्रा पसंद है, वह जबरदस्ती देर रात तक घंटों मोबाइल के साथ समय बिताता है।
फिर इल्ज़ाम के कटघरे में भोजन की गुणवत्ता को खड़ा कर देते हैं। इन सब हालातों को देखकर मुझे मेरी दादी के शब्द याद आते हैं, “अपना दाम खोटा, परखैया का क्या दोष”। जब गलती अपनी ही हो, तो दूसरे को क्या दोष देना। पहले लोग समय के अनुसार चलते थे, सुबह जल्दी जागते थे और रात को समय से जल्दी सो जाते थे। लेकिन, आज के समय में लोग समय को ही अपने अनुसार बदलना चाहते हैं। उनकी दिनचर्या पूरी तरह समय के प्रतिकूल हो चुकी है।
लोग खुद रात तक जागकर, सुबह देर से उठकर, व्यायाम न करके खुद पीले चावल लेकर ज़माने भर की बीमारियों को न्योता देने चल पड़ते हैं। और फिर जब ये बीमारियाँ बढ़ने लगती हैं, तो जैसा कि मैंने ऊपर बताया, लोग खाने-पीने में मिलावट, अशुद्धता जैसे इल्ज़ाम लगाकर या यूँ कह लें अपना दोष भोजन पर मढ़कर खुद को सही साबित करने की कोशिश में लग जाते हैं। लेकिन अपनी गलती मानने के लिए कोई भी राजी नहीं होता कि उनकी अव्यवस्थित दिनचर्या और खान-पान में लापरवाही के चलते ही ये कथित बीमारियाँ जन्म ले रही हैं।
अभी कुछ दिनों पहले की ही बात है, मैं सुबह पार्क में टहल रहा था, तो एक मित्र के साथ एक 70-72 वर्ष के बुजुर्ग से मुलाकात हुई। पूछने पर पता चला, वे उनके चाचाजी हैं और यहाँ घूमने आए हैं। आगे बातचीत से पता चला कि चाचाजी बहुत ही खुशमिज़ाज और ज़िंदादिल व्यक्ति हैं। उन्हें देखकर उनकी उम्र का ज़रा भी अंदाजा नहीं लगाया जा सकता था। उस दिन से चाचाजी जितने दिन यहाँ रहे, उतने दिन उनसे रोज ही मुलाकात होती रही। मुझे उनसे मिलकर बड़ी खुशी हुई और कुछ नया अनुभव भी मिला। चाचाजी ने बताया कि उन्होंने आज तक पिज़्ज़ा, बर्गर जैसी चीजों को हाथ भी नहीं लगाया, उनका मानना है कि जब हमारे घर ताज़ा खाना बनता है, तो क्यों ये बासी हुए आटे से बनी विदेशी चीजें खाई जाएँ। चाचाजी हमेशा सुबह 5 बजे जाग जाते हैं, चाहें कोई भी मौसम क्यों न हो और एक घंटे घूमना और इसके बाद एक घंटे व्यायाम करके ही उनकी दिनचर्या शुरू करते हैं।
चाचाजी की दिनचर्या को सुनकर मन में ख्याल आया कि एक बुजुर्ग व्यक्ति नियमित दिनचर्या का पालन करके इतना फिट रह सकते हैं, तो आज की युवा पीढ़ी इनसे कुछ क्यों नहीं सीखती? मैं यह मानता हूँ कि आपके आस-पास जो भी पार्क होगा, वहाँ कम से कम एक या दो बुजुर्ग तो जरूर आते होंगे। यदि आप उन बुजुर्गों से राय लेने में दिलचस्पी दिखाएँगे न, तो वे आपको अपने जीवन के अनुभवों से बहुत कुछ सिखाएँगे, जो ज्ञान आपको आपका जिम ट्रेनर मोटा पैसा लेकर भी नहीं दे पाएगा।
केवल नियमित दिनचर्या और व्यायाम से ही स्वस्थ रहा जा सकता है, और स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क का वास होता है। जब आज का युवा स्वस्थ रहेगा, तभी तो देश की तरक्की में अपना योगदान दे सकेगा। इसलिए हमें मिलकर यह संकल्प लेना चाहिए कि अब से नियमित रूप से व्यायाम करेंगे, खान-पान पर ध्यान देंगे और एक अच्छी दिनचर्या को अपनाएँगे।