क्या हम ‘अतिथि देवो भवः’ और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का असली अर्थ जान पाए हैं?

भारत में इंसान और मूक जानवरों के बीच करुणा और अतिथि भाव का दृश्य

क्या ‘अतिथि देवो भवः’ वाक्यांश में इंसानों की ही बात कही गई है, जानवरों की नहीं?

समय के पहिए के घूमने के साथ संस्कृति और परम्पराओं में कई बदलाव देखने को मिले हैं। पहले के समय में घर के दरवाज़े पर कोई याचक आया करता था, तो उसे कभी-भी खाली हाथ नहीं लौटाया जाता था। अतिथि आया करता था, तो उसका आदर-सत्कार किया जाता था, इतना ही नहीं, उसे किसी तरह की असुविधा न हो, इस बात का भी बखूबी ख्याल रखा जाता था। क्योंकि, पहले के समय में लोग वेदों और उपनिषदों को स्वयं से भी अधिक महत्व दिया करते थे।

वेदों में कहा गया है ‘अतिथि देवो भव:’ अर्थात् अतिथि देवतास्वरूप होता है। सूतजी ने कहा है, “अतिथि की सेवा-सत्कार से बढ़कर कोई अन्य महान कार्य नहीं है।” तैत्तिरीय उपनिषद के शिक्षावल्ली में भी इसका बखान किया गया है। अक्सर कक्षा में भी छात्रों को सिखाया जाता है:

मातृदेवो भव:, पितृदेवो भव:, आचार्यदेवो भव:, अतिथिदेवो भव:।

इसका अर्थ है “माता को देवता समझो, पिता को देवता समझो, आचार्य को देवता समझो, अतिथि को देवता समझो।”

महर्षि शातातप (लघुशाता 55) भी अतिथि के लक्षणों का वर्णन करते हुए कह चुके हैं कि जो सज्जन बिना किसी प्रयोजन, बिना बुलाए, किसी भी समय और किसी भी स्थान से घर में उपस्थित हो जाए, उसे देव ही समझना चाहिए। ऐसा माना जाता है कि अतिथि किसी भी रूप में आ सकते हैं और अतिथि अपनी चरण रज के साथ जब घर में प्रवेश करते हैं और उन्हें आतिथ्य मिलता है, तो वे अपना समस्त पुण्य घर में छोड़ जाते हैं। इसलिए कहा जाता है कि अतिथि का सदैव यशाशक्ति सम्मान करना चाहिए।

एक ग्लास पानी भी यदि आप मुस्कुराकर उन्हें परोसते हैं, तो राहुजनित समस्त दोष दूर हो जाते हैं। अगर आप अतिथि को मीठा देते हैं तो मंगल संबंधी समस्याओं से मुक्ति मिल जाती है। जब आप अतिथि को वस्त्र आदि भेंट में देते हैं तो गुरु एवं शुक्र संबंधी दोष समाप्त हो जाते हैं। जब आप अतिथि को सुंदर स्वच्छ शैया सोने के लिए देते हैं तो आपके शनि संबंधी दोष दूर हो जाते हैं।

हमारी संस्कृति इतनी विराट है कि इसमें सिर्फ इंसानों के ही नहीं, बल्कि पूरी सृष्टि के प्राणियों के हित की बात की गई है। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ सनातन धर्म का मूल संस्कार तथा विचारधारा है, जिसका बखान महा उपनिषद सहित कई ग्रन्थों में मिलता है। इसका अर्थ है कि पूरी की पूरी धरती एक परिवार है, और सभी प्राणी इसके सदस्य हैं, फिर वह इंसान हो या जानवर, सब इसमें शामिल हैं। लेकिन, न जाने क्यों सारी की सारी बातें और शिक्षा के मायनों को हम इंसानों तक ही सीमित रखकर छोड़ देते हैं। अन्य प्राणियों की तरफ हमारा ध्यान ही नहीं जाता। मुझे तो यह समझ नहीं आता कि ‘अतिथि देवो भव’ के सही मायने में मायने क्या हैं आखिर?

जैसा कि मैंने कुछ देर पहले कहा कि अतिथि किसी भी रूप में आ सकते हैं। इस रूप को हम क्या समझते हैं? रूप का मतलब क्या सिर्फ इंसान से है? क्या सिर्फ इंसान के घर आने को ही अतिथि के तराजू में तौला जाना चाहिए, मूक जानवर आपके घर या छतों पर नन्हें पक्षी जो आपका प्यार पाने आते हैं, क्या वो अतिथि नहीं हैं? आपके दरवाज़े हर सुबह गाय आती है, क्या वह अतिथि नहीं है? छत पर आई नन्हीं-सी चिड़िया और गिलहरी भी तो हमारी अतिथि ही हुईं न?

एक बात कहूँ, एक घड़ी को इंसान के मन में आपके घर आने को लेकर कोई लालच हो सकता है, लेकिन अन्य किसी प्राणी को कभी नहीं होता। वे बेज़ुबान हमसे चाहते ही क्या हैं? उन्हें हमारी शान-ओ-शौकत, हमारी संपत्ति, हमारी गाड़ी-घोड़ों से कोई लेना-देना नहीं है। वे हमारे दरवाज़े आते हैं, तो सिर्फ इसलिए कि शायद हम उन्हें थोड़ा दुलार ही कर देंगे और कुछ तरस आया, तो उन्हें खाने के लिए कुछ दे देंगे। हमारी तरह उन्हें अच्छे-अच्छे पकवानों की कोई इच्छा नहीं होती। उन्हें तो पेट भरने के लिए दो रोटी की आस होती है, सूखी हो या बासी, जो भी मिल जाए, उससे अपना पेट भरकर चुप-चाप पुनः लौट जाते हैं।

लेकिन मुझे शर्म आती है यह कहते हुए कि उस समय हमारे वेद और उपनिषद भी शर्मसार हो जाते होंगे, जब वे यह पाते होंगे कि हमें उन पर तरस भी नहीं आता, हम बेदर्दी इंसान उल्टा उन पर डंडे बरसाने लगते हैं और उल्टे पाँव उन्हें अपने घर के बाहर से मार कर भगा देते हैं।

ज़रा आप ही सोचिए, हमारे घर में कोई इंसान आए, और उसका अतिथि के रूप में आदर-सत्कार करने के बजाए, हम उन्हें डंडे मारकर उल्टे पाँव भगा दें.. यह शोभा देता है क्या? क्या हमारी संस्कृति हमें यही सिखाती है? फिर मूक जानवरों के साथ ऐसा बर्ताव क्यों?

मैं यहाँ पूछना चाहता हूँ कि क्या हम अपने ही परिवार के सदस्यों को भूख से तड़पते हुए देख सकते हैं? क्या उन्हें डंडे मारकर ऐसे भगा सकते हैं, जैसे जानवरों को भगा देते हैं? फिर जानवरों के साथ ऐसा क्यों?

यदि उनके पास भी आपकी तरह सुख-सुविधाएँ होतीं, आपकी तरह पैसा कमाते, वे खुद भोजन पकाकर अपना और अपने परिवार का पेट भर सकते, तो आपके दरवाज़े झाँकने कभी न आते.. शायद उनकी इसी कमी से इंसान खुद को सबसे ऊपर और सबसे श्रेष्ठ समझने की गलती कर बैठा है। इंसान जितना अत्याचारी है, धरती पर उतना अत्याचारी कोई और प्राणी नहीं।

शहरीकरण के चक्कर में हम उनके खाने-पीने के साधन भी छीन बैठे हैं। तालाबों को सुखा-सुखा कर उन पर रहने के लिए दिन-ब-दिन प्लाट काटे जाने लगे हैं, वे अपनी प्यास कहाँ जाकर बुझाएँ? मुँह से भी नहीं कह सकते हैं कि हमें प्यास लगी है.. रही बात पत्तों की, तो पेड़ काटने की होड़ वह भी उनसे छीन बैठी.. खाएँ तो आखिर क्या खाएँ.. खाने की आस में किसी के घर के दरवाज़े पर जाएँ, तो वहाँ डंडे.. वहाँ से निकलकर सब्जी मंडी चले जाएँ, तो वहाँ डंडे.. थोड़ा डोर जाकर खेत में अपना पेट भरने चले जाएँ, तो वहाँ डंडे.. क्या हमारे देश में अतिथियों का ऐसा स्वागत-सत्कार किया जाता है? आप किसी के घर अच्छे स्वागत की अपेक्षा में अतिथि बनकर जाएँगे और बदले में आपको डंडे पड़ेंगे, तो क्या बीतेगी आप पर, एक बार महसूस जरूर करना..

आपको बता दूँ कि उन्हें भूख आपके डंडों की नहीं है, उन्हें भूख भोजन की है। बेज़ुबान हैं तो क्या हुआ, भूख और प्यास उन्हें भी लगती है। न जाने क्यों दुनिया का सबसे समझदार, सक्षम, समर्थ और समृद्ध कहा जाने वाला इंसान यह बात क्यों नहीं समझता..

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