दो मासूम.. एक की उम्र लगभग 5 या 6 वर्ष.. और एक की मुश्किल से 1 वर्ष.. शरीर पर आधे-अधूरे कपड़े.. चेहरे पर बेबसी.. आँसूओं से लबालब भीगी हुईं आँखें.. एक नहीं, दोनों की.. कौड़ियों के दाम बिकता बचपन.. भूख की असहनीय पीड़ा.. तड़प रोटी की.. अपनी उम्र से लगभग 50 वर्ष अधिक जी लेने वाला वह 5 वर्षीय बच्चा अपनी छोटी बहन को यूँ गले लगाए हुए था, मानो उसके सारे दुःख आज से उस भाई के और वो सारी खुशियाँ, जो असल में उसके हिस्से में थीं ही नहीं, जिस भी मोल में मिले, वह ले आएगा और वह सारी की सारी उसकी बहन की..
यह एक पेंटिंग थीं, जो मैंने अपने शहर के जाने-माने म्यूज़ियम में लगी देखी। पेंटिंग चीख-चीख कर इसकी ‘हकीकत वाली कहानी’ बयाँ कर रही थी। दरअसल, यह पेंटिंग असल जिंदगी में कहीं किसी सड़क किनारे बेबस मासूमों को देखकर बनाई हुई लग रही थी।
पेंटिंग को देखकर मेरे मन में यही प्रश्न उठा कि भूख से रोते-बिलखते उन नन्हें मासूम बच्चों का हकीकत में आखिर कौन पेट भरने गया होगा? गया भी होगा या नहीं? जो भी उस समय उनके आस-पास से गुजरा होगा, उनके मन में इन मासूमों को देखकर दया आई भी होगा या नहीं? वह पेंटिंग और उसमें गिरते आँसूओं को देखकर तो दया का दूर-दूर तक कोई नामों-निशान नहीं दिख रहा था..
मैं अपने शब्द वापस लेता हूँ.. दया थी.. बेशक बहुत दया थी, लेकिन हकीकत का नहीं पता, पेटिंग को देखकर म्यूज़ियम में उपस्थित लोगों के मन में जो दया थी, उसे शब्दों में बयाँ कर पाना मेरे लिए लगभग नामुमकिन ही है। इतनी दया कि गरीबी और लाचारी की पीड़ा सेहती वह पेंटिंग, चंद मिनटों में हजारों के दाम में बिक गई। म्यूज़ियम में प्रदर्शनी जो लगी थी।
एक से बढ़कर एक पेंटिंग.. कहीं प्रकृति की असीम सुंदरता को कैनवास पर उकेरती पेंटिंग, तो किसी पेंटिंग को देखकर लग रहा था, मानों ईश्वर धरती पर ही उतर आए हों। बात मैं इक्का-दुक्का पेंटिंग्स की ही बता रहा हूँ, लेकिन उस म्यूज़ियम में ऐसी सैकड़ों पेंटिंग्स थीं, जो कलाकारों की बेशकीमती कला का बखान कर रही थीं।
वापस आ जाता हूँ उन मासूमों पर.. सच कहूँ, तो उस पेंटिंग में इस्तेमाल की गई सामग्री, यानि कलर्स, कैनवास आदि और उसमें लगी मेहनत को आँकने के बाद उसकी कीमत 500 रुपए से अधिक न थी.. मैं उसकी कीमत तय करने वाला वास्तव में कोई नहीं, लेकिन फिर एक सामान्य देखने वाले के तौर पर कहूँगा कि उसकी कीमत हजार रुपए की तो न थी, फिर भी हजारों के दाम लगे उसके, बोली के बीच जो जा बैठी थी। कारण सिर्फ और सिर्फ दया..
ऐसे फोटोज़ इंटरनेट और सोशल मीडिया पर भरपल्ले मिल जाएँगे, जिन पर लोग कमैंट्स के माध्यम से दया के आँसू गिराते दिख जाएँगे.. एक सवाल पूछना चाहता हूँ.. क्या दया भी अब ऑनलाइन हो गई है?? वास्तविक जीवन से इसका कोई लेना-देना नहीं? असल जीवन में हमारा ध्यान अपने और अपने लोगों से हटकर मोहल्लों-नुक्कड़ों पर या आस-पास बैठे लोगों पर जाए न, तो सच मानों, ये चंद रंगीन पेंटिंग्स के पीछे छिपे उन लोगों के असल जिंदगियों के बेरंग भी हमें दिख जाएँगे। बिल्कुल उसी तरह, जिस तरह लाल रंग को टार्गेट करने पर हमें अपने आस-पास के वातावरण में कोई और रंग नहीं दिखता, दिखती हैं, तो सिर्फ लाल रंग की वस्तुएँ..
बात सिर्फ एक पेंटिंग की नहीं है। हम अपने जीवन में बहुत सारी चीजों पर पैसा खर्च करते हैं, जो शायद हमारे लिए बहुत जरूरी भी नहीं होतीं। लेकिन, यदि हम अपने खर्चे का एक छोटा-सा हिस्सा भी जरूरतमंदों की मदद में लगाएँ न, तो हम बहुत सारे लोगों और जीवों की जिंदगी में बदलाव ला सकते हैं।
महज़ एक रोटी की आस में भूख से तड़पते आपको ऐसे कई लोग मिल जाएँगे, जिन्हें इस बात से बिल्कुल भी फर्क नहीं पड़ता कि उन्हें रोटी ताजी मिले या गर्मागर्म, सुखी हुई और बासी रोटी भी उन्हें कोई दे जाए न, तो उनके लिए उस एक रोटी की कीमत पेट भरने के लिए ईश्वर के आशीर्वाद से कम नहीं और वहीं उसे रोटी देने वाला वह इंसान ईश्वर से कम नहीं..
कभी-कभी तो यह लगता है कि दुनियादारी की होड़ में अब दया भी बिकाऊ हो चली है। यह वहाँ नहीं, दिखती जहाँ वास्तव में इसकी जरुरत है, यह इच्छा के अनुरूप बाहर आती है। इंसानियत का मोल तो मर चुका है, लेकिन बस यही कहूँगा कि दया के मोल को कौड़ियों के दाम न बिकने दें.. दया वहाँ दिखाएँ, जहाँ वास्तव में इसकी जरुरत है, वहाँ नहीं, जहाँ इसके मोल से कोई मेल नहीं.. ज़रा सोचिए, यदि उस पेंटिंग पर हजारों रुपए खर्च करने के बजाए उन पैसों का इस्तेमाल किसी गरीब का पेट भरने के लिए किया जाता, तो इतने रुपयों से आप कितने जरूरतमंद लोगों का पेट भर चुके होते..
यकीन मानिए, वह पेंटिंग वाला देता या न देता, यह उसके अपने विचार हैं, लेकिन वो गरीब लोग और नन्हें मासूम आपको दिल से दुआएँ जरूर देते।
संभालकर रखने वाला बेशकीमती उपहार हैं दुआएँ, जो कभी खाली नहीं जातीं.. और उस समय काम आती हैं, जब आपको इनकी सबसे अधिक जरुरत होती है.. एक हाथ दे, और एक हाथ ले.. बिल्कुल उसी तरह, जिस तरह भूखे को आपने उस समय भोजन कराया, जब उसे इसकी सबसे अधिक जरुरत थी.. यदि हम सब मिलकर थोड़ी-थोड़ी भी मदद इन जरूरतमंदों की करें, तो हम इस दुनिया को रहने का सबसे बेहतर स्थान बना सकते हैं।