भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है और इसकी सफलता इसके नेताओं या राजनीतिज्ञों की शैक्षणिक योग्यता पर निर्भर है। इस मुद्दे पर बहस लाज़मी है कि क्या राजनेताओं के लिए शैक्षणिक योग्यता को अनिवार्य किया जाना चाहिए?
वर्ष 2015 में हरियाणा सरकार ने स्थानीय निकाय चुनाव लड़ने के लिए न्यूनतम शैक्षिक मानदंड निर्धारित करते हुए हरियाणा पंचायती राज संशोधन अधिनियम 2015 लागू किया। उसी समय राजस्थान सरकार ने भी स्थानीय निकाय चुनाव में न्यूनतम योग्यता के लिए एक कानून पारित किया। अधिनियम में सामान्य उम्मीदवारों, महिलाओं और दलितों के लिए न्यूनतम शैक्षिक मानदंडों के विभिन्न स्तरों की रूपरेखा दी गई है।
ऐसे कानून की वैधता को चुनौती देते हुए सर्वोच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर की गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद कहा, ”यह एकमात्र शिक्षा ही है, जो इंसान को सही या गलत और अच्छे या बुरे के बीच अंतर करने की शक्ति देती है।” सरकार को लोगों के अधिकारों पर उचित प्रतिबंध लगाने का भी अधिकार है। इसलिए, उनकी राय थी कि चुनाव लड़ने का अधिकार न तो देश के कानून के तहत मौलिक अधिकार है और न ही सामान्य कानूनी अधिकार, बल्कि यह एक वैधानिक अधिकार है। इसलिए न्यूनतम योग्यता मानदंड लागू करना किसी भी सरकार के विशेषाधिकार के अंतर्गत आता है।
हमारे देश में आजादी के समय से ही उच्च शिक्षित नेताओं का इतिहास रहा है, लेकिन निर्णय लेने वाले नेतृत्व में और देश को चलाने के लिए ईंधन रुपी शिक्षा का महत्व और निर्णायक भूमिका गायब ही हो गई है। आप में से कई लोग अभी-भी इस लेख को विरोधाभासी मानेंगे, लेकिन सोचना शुरू कर दें कि क्या हमें कोई ऐसा नेता मिलेगा, जो समान रूप से बुद्धिमान और पढ़ा-लिखा हो..
यहाँ मैं कुछ उदाहरण प्रस्तुत करना चाहूँगा, जहाँ भारत के सबसे कम पढ़े-लिखे राजनेता भी देश का नेतृत्व कर चुके या कर रहे हैं:
1. राबड़ी देवी: लालू प्रसाद यादव की पत्नी, उन्होंने अपनी औपचारिक शिक्षा भी पूरी नहीं की थी। उनकी हमेशा ही घरेलू गतिविधियों में रुचि रही, लेकिन 1997 में उनके पति उन्हें राजनीति की चौखट पर ले आए। राजनीति में चंद ज्ञान के साथ ही वे बिहार की मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने के काबिल हो गईं।
2. गुलजार सिंह रणिके: एक समय पंजाब में पशुपालन, डेयरी और मत्स्य पालन के कैबिनेट मंत्री रहे गुलज़ार स्नातक भी नहीं हैं। सीमा क्षेत्र विकास घोटाले में कथित संलिप्तता के बाद उन्होंने मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया था, लेकिन बाद में उन्हें फिर से मंत्रिमंडल में शामिल कर लिया गया था।
3. विजयकांत: तमिल अभिनेता से राजनेता बने विजयकांत, जिन्हें कैप्टन प्रभाकरण की भूमिका निभाने के बाद कैप्टन के नाम से जाना जाता है, ने वर्ष 2011 में तमिलनाडु विधानसभा चुनाव जीता। उन्होंने 12वीं कक्षा के बाद अपनी शिक्षा बंद कर दी।
4. फूलन देवी: मशहूर डकैत से राजनेता बनीं मशहूर अभिनेत्री कोई शिक्षा हासिल नहीं कर सकीं, क्योंकि उन्हें बचपन में अपने से काफी बड़े व्यक्ति से शादी करने के लिए मजबूर होना पड़ा था। आत्मसमर्पण करने और पैरोल पर रिहा होने के बाद, वे समाजवादी पार्टी में शामिल हो गईं और मिर्ज़ापुर से संसद सदस्य बन गईं।
5. एम करुणानिधि: तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री ने 10वीं कक्षा के बाद अपनी शिक्षा पूरी नहीं की और तमिल फिल्म उद्योग में एक पटकथा लेखक के रूप में अपना करियर शुरू किया।
6. गोलमा देवी: किरोड़ी लाल मीना (मीणा समुदाय के नेता) की पत्नी गोलमा देवी अपने पति की वजह से विधायक बनीं। शपथ ग्रहण समारोह में वे अपनी शपथ तक नहीं पढ़ पाईं। वे कभी स्कूल नहीं गईं और बमुश्किल साक्षर हैं।
7. जाफर शरीफ: पूर्व रेल मंत्री जाफर शरीफ ने सिर्फ मैट्रिक तक ही पढ़ाई की। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत कांग्रेस अध्यक्ष एस. निजलिंगप्पा के साथ ड्राइवर के रूप में की और बाद में राजनीति में शामिल हो गए।
8. उमा भारती: मौजूदा मोदी सरकार में सबसे कम पढ़ी-लिखी मंत्री जल संसाधन और गंगा संरक्षण मंत्री उमा भारती हैं। उन्होंने अपनी औपचारिक शिक्षा सिर्फ कक्षा छह तक ही पूरी की है।
बिहार को ही ले लीजिए, यह राज्य एक समय दुनिया का केंद्र था, जिसने नालंदा जैसे विश्वविद्यालयों, गौतम बुद्ध और महावीर जैसे ज्ञान के स्रोतों के माध्यम से दुनिया भर में ज्ञान का विस्तार किया। बिहार ने भारत के पहले राष्ट्रपति दिए। इतना ही नहीं, कौटिल्य, अशोक, पाणिनि और आर्यभट्ट जैसे महान व्यक्तित्व भी इसी राज्य की देन हैं। बिहार ने ही देश का नेतृत्व किया। लेकिन अशिक्षित नेताओं की विनाशकारी विचारधारा ने इस राज्य को अंधकार के गर्त में धकेल दिया। जिस बिहार को उत्कृष्टता की ओर बढ़ना था, वह हीनता की ओर बढ़ गया।
नेता आम लोगों के लिए आदर्श नागरिक होते हैं। इसलिए, यह जरूरी है कि उनके पास ऐसी शैक्षणिक योग्यता हो, जो आम जनता को उनका अनुसरण करने के लिए प्रेरित कर सके। यह भी स्पष्ट है कि अच्छा और सफल शासन, नेतृत्व की गुणवत्ता पर निर्भर करता है, जिसे बेहतर शिक्षा के माध्यम से निखारा जाता है। इसलिए, नेताओं के लिए न्यूनतम शिक्षा आवश्यक है। या फिर राजनेता कोई कम अवधि का कोर्स ही कर लें, क्योंकि एक सुशिक्षित व्यक्ति को देश के विकास के लिए संसाधन माना जाता है। और यदि नेता ही अशिक्षित होंगे, तो मानव संसाधन के लिए क्या ही उचित दिशानिर्देश दे सकेंगे।
एक अशिक्षित नेता के पास सोचने और समझने की कोई क्षमता नहीं होगी। उन्हें नागरिकों की समस्याओं की परवाह नहीं होगी। वे भ्रष्ट हो जाएँगे। मेरे हिसाब से, देश को इन सभी कमियों से बचाने के लिए यह नियम लागू किया जाना चाहिए कि एक सीमा तक शैक्षिक योग्यता रखने वाले लोग ही देश की राजनीतिक व्यवस्था में भाग ले सकें। अत: राजनेताओं के लिए न्यूनतम रूप से शिक्षित होना समय की माँग है।