इंसानियत की समझ से परे टीस भूख की

भूख की टीस – इंसान, जानवर और पक्षी

भूख और भुखमरी ये ऐसे मुद्दे हैं, जो हमें हमारी इंसानियत की गहराइयों में झाँकने पर मजबूर करते हैं। जब हमारा अपना बच्चा भूखा सोता है, तो हमारी आत्मा भीतर तक कचोट जाती है। दया बेशक हमें सिर्फ अपने लोगों पर ही आती है। कुछ स्थितियों में बाहर किसी व्यक्ति को देखकर भी आ ही जाती है, लेकिन हम में से बहुत कम लोग इस इस बात का एहसास गहराई से कर पाते हैं कि दुनिया में लाखों-करोड़ों लोग हैं, जो हर दिन बिना भोजन के जीते हैं, और उनके खाली पेट हमें हमारे सफलतम समाज की विफलता का आइना हमें दिखाते हैं। यह सिर्फ एक शारीरिक कष्ट नहीं है, बल्कि एक मानसिक और भावनात्मक पीड़ा भी है, जो भूख के प्रति उनकी उम्मीदों को धीरे-धीरे निगलती चली जाती है। लेकिन मैं यहाँ एक सवाल आपसे पूछना चाहता हूँ कि क्या भूख की वेदना से सिर्फ और सिर्फ इंसान ही गुजरता है?

इंसान की सोच सिर्फ और सिर्फ इंसानों तक ही सिमट कर रह गई है। कोई भी विषय हो, विशेष रूप से भूखमरी का मुद्दा भी इसकी लम्बी-चौड़ी सूची में शामिल है, जो अक्सर इंसानों तक ही सीमित रह जाता है। न जाने क्यों सोचने-समझने की सबसे बेहतर शक्ति मिलने के बावजूद इंसान कभी इस बात पर विचार नहीं करता है कि बेज़ुबान जानवर और पक्षी भी इसी पीड़ा से गुजरते हैं? उनकी रचना भी ईश्वर ने उतने ही प्रेम और अनुराग से की है, जितनी कि इंसानों की। लेकिन भूख की यह टीस इंसान और इंसानियत दोनों की सीमाओं से परे है।

वह कहते हैं न जब तक आप स्वयं किसी पीड़ा से न गुजरें, तब तक किसी अन्य की पीड़ा समझ में नहीं आती है। भोजन पाने या प्यास बुझाने के लिए दर-दर हमें जानवरों और पक्षियों की तरह भटकना नहीं पड़ता है न!

समझेंगे भी तो कैसे? यदि सच में इस बात की गंभीरता को समझने की कोशिश करेंगे न, तो भूख से तड़पते जानवरों और पक्षियों की कहानियाँ भी हमें उतनी ही भावुक कर सकती हैं, जितनी कि इंसानों की। कभी राजसी दुनिया का पर्दा हटाकर देखना कि कैसे सड़क किनारे बैठे भूख की टीस सहते कुत्ते और गाय रोटी के एक टुकड़े के लिए तड़पते हैं।

कभी देखना कि कैसे पेड़ पर बैठी नन्हीं चिड़िया या आपके घर की गैलरी पर फुदकती छोटी-सी गिलहरी एक दाने के लिए तरसती है। उनकी भूख भी उतनी ही असहनीय होती है, जितनी किसी इंसान की। इस सत्य की हम अपने जीवन में न जाने कितनी ही बार अनदेखी करते चले जाते हैं कि जब भी कोई जानवर भूखा होता है, और अपना पेट भरने के लिए हर तरह के जतन कर बैठता है, फिर भी कोई साधन उसे नहीं मिलता, तब जाकर थक-हारकर वह इंसानों के पास मदद की आस में आता है। लेकिन, बदले में उसे हम इंसानों से मिलता क्या है? बहुत सारी मार और धुत्कार।

हम इंसान हैं न! हमें कहाँ इस बात का एहसास है कि मजबूर हैं, तो क्या हुआ, वे भी हमारी तरह जीने का अधिकार रखते हैं। हम इस कारण तक पहुँच ही नहीं पाते कि आखिर वे हमारे पास क्यों आए हैं और न ही कभी हमें उनके आँसू ही दिखते हैं। अपनी जान सबको प्यारी होती है, लेकिन हम तो उन्हें, उतना हक भी नहीं देते हैं। अपने आप को बचाने के लिए कभी यदि वे गलती से भी हम पर हावी हो जाएँ, तो हम उन्हें आक्रामक करार कर देते हैं और कर देते हैं नगर निगम आदि के हवाले। हम इंसान यह भी नहीं समझते कि अपना बचाव करने का जानवरों को भी उतना ही हक हैं, जितना कि हम इंसानों को।

छत पर कभी दाल या अन्य कोई भी अनाज धूप लगाने या फिर धोकर सुखाने के लिए रखते हैं, तो चिड़िया, कबूतर और अन्य कई पक्षी बड़ी संख्या में हमारी छतों पर आने लगते हैं। वे यह नहीं जानते कि हमने अपने काम से छत पर अनाज रखा है, वे मासूम तो यही समझते हैं कि यह इंसानों द्वारा उनके लिए की गई सेवा है और चले आते हैं हमारी छतों पर मेहमान बनकर। अगले दिन फिर इसी आस में फिर हमारी छत पर आते हैं कि पेट भरने को आज भी इंसान की कृपा हो जाएगी, लेकिन मायूस होकर वापस लौटने के सिवाए उनके पास हम कोई विकल्प नहीं छोड़ते।

एक बात बताइए, दया भाव से यदि हर दिन अपनी घर की छतों पर हम थोड़ा-सा अनाज रख भी देंगे, तो हमारा क्या घट जाएगा? क्या हमारे धन के भंडार खाली हो जाएँगे या फिर हमारा अनाज खत्म हो जाएगा? क्या हमें इंसानियत यही पाठ पढ़ाती है कि खुद की भलाई करते जाओ, खुद का सोचते जाओ और किसी का मत सोचो?

यह हमारे जैसे सक्षम लोगों के लिए कोई बहुत बड़ी बात नहीं है। यह एक छोटा-सा कदम है, लेकिन इसका असर बहुत बड़ा हो सकता है। सोचकर देखिए कि पक्षियों के लिए दाने का बंदोबस्त करके हम एक दिन में न जाने कितने ही भूखों को भर पेट भोजन कराने का पुण्य कमा लेंगे। हमें हर जीव की भूख को समझना और उसे मिटाने की कोशिश करना चाहिए। तब ही तो हमारे इंसान होने और हमारी इंसानियत का असली मतलब है।

अक्सर हम देखते हैं कि बड़े-बड़े शहरों में लोग अपनी जिंदगी में इतने व्यस्त हो जाते हैं कि उन्हें अपने आस-पास की दुनिया की खबर ही नहीं रहती। हम अपने जीवन की छोटी-छोटी समस्याओं में इतने उलझ जाते हैं कि हमें यह एहसास ही नहीं होता कि हमारे आस-पास कितने ही लोग और जीव भूख से तड़प रहे हैं। हमें अपनी जिंदगी की भागदौड़ से थोड़ा समय निकालकर उनके बारे में भी सोचना चाहिए। एक जिम्मेदार प्राणी होने के नाते यह समझना हम सभी के लिए जरुरी है कि हर उस जीव की जिम्मेदारी हमारी है, जो इस धरती पर हमारे साथ रहता है।

हमारे द्वारा किए गए छोटे-छोटे प्रयास, हमारी पृथ्वी पर बड़े-बड़े बदलाव लाने का माध्यम बन सकते हैं। आइए, हम सब मिलकर एक ऐसे समाजकी स्थापना करें, जहाँ हर जीव की भूख का समाधान हो। साथ मिलकर इस दुनिया को भुखमरी से मुक्त करें और हर जीव की भूख को मिटाने का संकल्प लें। हमें समझना होगा कि भुखमरी के खिलाफ यह लड़ाई सरकार या कुछ व्यक्तियों की नहीं है। यह हम सभी की जिम्मेदारी है। घर आदि के बाहर मिट्टी के बर्तनों में जानवरों की प्यास बुझाने के लिए पानी रखें, घर की छतों पर पक्षियों के लिए दाना रखें, हमारी संस्कृति को एक बार फिर से जीवित करते हुए हर दिन पहली रोटी गाय के लिए और आखिरी रोटी कुत्ते के लिए निकालें और जरूरतमंद लोगों की मदद करें। इससे न सिर्फ हमारा समाज खुशहाल होगा, बल्कि हमारी इंसानियत भी जीवित रहेगी।

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